भारत में रामसर स्थलों की संख्या 100 हुई, चार नए आर्द्र क्षेत्रों के प्रस्ताव रामसर सचिवालय को भेजे गए।
हिमालयी इलाकों में पर्यटन 286 प्रतिशत बढ़ा, जबकि गंगा डॉल्फिन संरक्षण और दूसरे राष्ट्रीय सर्वेक्षण को नई गति मिली।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 लागू, पर्वतीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान और स्रोत पर चार-स्तरीय कचरा पृथक्करण अनिवार्य।
10 वर्षों में 1.88 लाख हेक्टेयर वन भूमि स्वीकृत, प्रतिपूरक वनीकरण अनिवार्य, वन एवं वृक्ष आवरण में भी वृद्धि दर्ज हुई।
भूजल दोहन पर चिंता बरकरार, जबकि सरकार ने ई20 पेट्रोल से वाहनों पर व्यापक प्रतिकूल प्रभाव से इनकार किया।
रामसर स्थलों की अधिसूचना
आज 20 जुलाई, 2026 को संसद के मानसून सत्र की शुरुआत हो गई है। इसी बीच सदन में पूछे गए एक सवाल के जवाब में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में मंत्री भूपेन्द्र यादव ने लोकसभा में कहा कि मंत्रालय देश के महत्वपूर्ण आर्द्र क्षेत्रों (वेटलैंड) के संरक्षण के लिए लगातार कार्य कर रहा है। भारत में अब तक 100 रामसर स्थल घोषित किए जा चुके हैं। साल 2023 से 2026 तक कुल 25 नए रामसर स्थल जोड़े गए हैं।
उन्होंने कहा मंत्रालय समय-समय पर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ऐसे आर्द्र क्षेत्रों की पहचान करने के लिए प्रोत्साहित करता है जिन्हें रामसर स्थल बनाया जा सके। राज्य सरकारों से प्रस्ताव प्राप्त होने के बाद उन्हें रामसर सचिवालय को भेजा जाता है।
वर्तमान में चार नए आर्द्र क्षेत्रों के प्रस्ताव भेजे गए हैं। इनमें अरुणाचल प्रदेश का ग्लॉ झील, चंडीगढ़ का सुखना वेटलैंड, गुजरात का गोसाबारा-मोकरसागर वेटलैंड कॉम्प्लेक्स और उत्तर प्रदेश का सऊज झील शामिल हैं। इन स्थलों के रामसर सूची में शामिल होने से उनके संरक्षण को और मजबूती मिलेगी।
पर्वतीय राज्यों के लिए विशेष कार्य योजना
संसद में उठाए गए एक प्रश्न के उत्तर में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया कि मंत्रालय ने पर्वतीय राज्यों में प्रदूषण कम करने, नदियों को स्वच्छ रखने और पर्यावरण संरक्षण को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं।
मंत्री ने कहा कि मंत्रालय ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 लागू किए हैं। इन नियमों में पहाड़ी और द्वीपीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। स्थानीय निकायों की जिम्मेदारियां भी स्पष्ट की गई हैं।
इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 22 जून 2026 को पहाड़ी क्षेत्रों में ठोस कचरा प्रबंधन के लिए एक सलाह जारी की। इसे सभी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, प्रदूषण नियंत्रण समितियों और राज्यों के संबंधित विभागों को भेजा गया है। इन उपायों का उद्देश्य स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित करना है।
हिमालयी इलाकों में पर्यटन का आर्थिक प्रभाव
संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में आज, पर्यटन मंत्रालय में मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने लोकसभा में कहा कि देश के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मंत्रालय लगातार प्रयास कर रहा है। शेखावत ने बताया गया कि साल 2014 से 2025 के बीच हिमालयी इलाकों में पर्यटकों की संख्या में बहुत तेज वृद्धि हुई है।
साल 2014 में हिमालयी इलाकों में 10.55 करोड़ पर्यटक आए थे। यह संख्या साल 2025 में बढ़कर 40.78 करोड़ हो गई। इस प्रकार लगभग 286 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। पर्यटन बढ़ने से स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है। होटल, परिवहन, भोजन, हस्तशिल्प और अन्य छोटे व्यवसायों को भी लाभ हुआ है। इससे पहाड़ी राज्यों की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है और लोगों की आय में वृद्धि हुई है।
गंगा डॉल्फिन का संरक्षण
गंगा डॉल्फिन के संरक्षण को लेकर सदन में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में जानकारी देते हुए कहा कि मंत्रालय देश की राष्ट्रीय जलीय जीव गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए कई योजनाएं चला रहा है।
राज्य मंत्री ने बताया कि भारत सरकार ने साल 2021 से 2023 के बीच गंगा, ब्रह्मपुत्र और ब्यास नदी में पहली बार देशव्यापी डॉल्फिन सर्वेक्षण कराया। इससे डॉल्फिन की संख्या का पहला व्यापक आधार तैयार हुआ।
इसके बाद जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर से दूसरा राष्ट्रीय सर्वेक्षण शुरू किया गया। सरकार ने उत्तर प्रदेश को 1.61 करोड़ रुपये, भारतीय वन्यजीव संस्थान को 46.03 करोड़ रुपये, दूसरे सर्वेक्षण के लिए 12.43 करोड़ रुपये तथा डॉल्फिन संरक्षण कार्य योजना के लिए 32.97 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। इन प्रयासों से डॉल्फिन और उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा।
वन भूमि पर विकास कार्य
सदन में सवालों का सिलसिला जारी रहा, इसी बीच एक और सवाल के जवाब में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया कि देश में विकास कार्यों के लिए कभी-कभी वन भूमि का उपयोग करना पड़ता है।
सिंह ने कहा कि एक अप्रैल 2016 से 31 मार्च 2026 तक 1,88,487.93 हेक्टेयर वन भूमि को विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए स्वीकृति दी गई है। यह प्रक्रिया वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 तथा वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के अनुसार की जाती है।
इन नियमों के तहत प्रतिपूरक वनीकरण अनिवार्य है। भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट 2023 के अनुसार, देश का कुल वन एवं वृक्ष आवरण 8,27,357.95 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत है। यह साल 2021 की तुलना में 1,445.81 वर्ग किलोमीटर अधिक है।
ई20 पेट्रोल का वाहनों पर प्रभाव
ई20 पेट्रोल का वाहनों पर प्रभाव को लेकर सदन में उठाए गए एक प्रश्न के उत्तर में आज, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने राज्यसभा में ई20 पेट्रोल के संबंध में स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि सरकार को ई20 पेट्रोल के कारण वाहनों में किसी बड़े या व्यापक खराबी की पुष्टि करने वाली शिकायतें प्राप्त नहीं हुई हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट और सोशल मीडिया पोस्ट सामने आए थे, जिनकी वैज्ञानिक जांच की गई।
प्रयोगशाला परीक्षण, फील्ड परीक्षण और लंबे समय के उपयोग के आधार पर यह पाया गया कि ई20 पेट्रोल से वाहन प्रदर्शन पर कोई व्यापक बुरा प्रभाव सिद्ध नहीं हुआ है। देश में तीन साल से अधिक समय से ई15 मिश्रित पेट्रोल तथा दो साल से अधिक समय से ई19-ई20 पेट्रोल का उपयोग हो रहा है। करोड़ों दोपहिया और पेट्रोल कारें इन ईंधनों का उपयोग कर रही हैं।
स्रोत पर कचरे का पृथक्करण
सदन में पूछे गए एक सवाल के जवाब में आज, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तोखन साहू ने राज्यसभा में कहा कि देश में स्वच्छ कचरा प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के अनुसार एक अप्रैल 2026 से प्रत्येक स्थान पर कचरे का चार भागों में पृथक्करण करना अनिवार्य है। केवल वही कचरा लैंडफिल में भेजा जाएगा जिसे पुनर्चक्रित या ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता।
बड़े कचरा उत्पादकों को अपने परिसर में कचरे का संग्रह, पृथक्करण, परिवहन और प्रसंस्करण करना होगा। शहरी स्थानीय निकाय नियमों का पालन सुनिश्चित करेंगे। स्थानीय निकाय अपने नियमों के अनुसार कचरा फैलाने पर जुर्माना भी लगा सकते हैं।
देश में भूजल का घटता स्तर
सदन में उठे एक सवाल के जवाब में आज, जल शक्ति मंत्रालय राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए कहा कि देश में भूजल की स्थिति की नियमित निगरानी की जा रही है।
साल 2025 के आकलन के अनुसार, देश में कुल 6,762 भूजल आकलन इकाइयों का अध्ययन किया गया। इनमें से 730 इकाइयों, अर्थात लगभग 10.80 प्रतिशत, को अतिदोहित श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ है कि इन क्षेत्रों में जितना भूजल हर वर्ष पुनर्भरित होता है, उससे अधिक पानी निकाला जा रहा है।
राज्य स्तर पर पंजाब (156.36 प्रतिशत), राजस्थान (147.11 प्रतिशत) और हरियाणा (136.75 प्रतिशत) में भूजल दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है। सरकार भूजल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और जल के बेहतर उपयोग पर विशेष ध्यान दे रही है ताकि भविष्य में जल संकट को कम किया जा सके।