उत्तराखंड राज्य बनने से अब तक औसतन हर हफ्ते एक व्यक्ति ने मानव-वन्यजीव संघर्ष में अपनी जान गंवायी है। हर 1 से 2 दिन में एक व्यक्ति वन्यजीव हमले में घायल हुआ। मार्च में गैरसैंण विधानसभा सत्र में वन मंत्री सुबोध उनियाल द्वारा पेश किए गए आंकड़े यही तस्वीर बनाते हैं।
ये आंकड़े मुआवजे पर आधारित हैं। यानी जिनका मुआवजे का दावा ख़ारिज हो गया, या जिन्होंने कोई दावा किया ही नहीं, वे इन आंकड़ों में शामिल नहीं हैं। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में गुलदार, बाघ और हाथियों से संघर्ष की स्थिति से जूझ रहे लोगों के लिए भालू के बढ़ते हमले नई चुनौती बन गए हैं।
वर्ष 2023 में उत्तराखंड वन विभाग के प्रमुख पद से सेवानिवृत्त, 1986 बैच के भारतीय वन सेवा अधिकारी डॉ राजीव भरतरी अपने अनुभवों के साथ इस चुनौती के दीर्घकालीन समाधान पर बात कर रहे हैं।
कार्बेट टाइगर रिजर्व से लगे गांवों में स्वतंत्र तौर पर कार्य कर रहे भरतरी अमेरिकी जीव वैज्ञानिक सेथ एम. विल्सन के साथ मार्च में पहाड़ के गांवों की यात्रा कर लौटे हैं। विल्सन ब्लैकफुट चैलेंज नाम की संस्था के एग्जक्यूटिव डायरेक्टर हैं। जो अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका में समुदाय की भागीदारी से मानव-वन्यजीव संघर्ष से बचाव का बेहतरीन मॉडल तैयार करने के लिए पहचानी जाती है। राजीव भरतरी से डाउन टू अर्थ के लिए वर्षा सिंह से बातचीत की।
मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने में हम सफल क्यों नहीं हो रहे?
हमें अपना तरीका बदलने की जरूरत है। समाधान के तौर पर हम सबसे पहले मुआवजे की धनराशि, वन्यजीव को पकड़ने, पिंजड़े लगाने, ट्रैंकुलाइज़ करने और उसे उस जगह से हटाने की बात करते हैं। जबकि यह अंतिम समाधान होना चाहिए।
ज़रूरत ऐसे उपायों पर काम करने की है जिससे संघर्ष की परिस्थितियां कम बनें। कोई एक समाधान हमेशा कारगर नहीं होता, बदली परिस्थितियों के हिसाब से इनमें बदलाव की जरूरत होती है। क्योंकि वन्यजीव भी परिस्थितियों के साथ खुद को ढाल लेते हैं।
वन्यजीवों से सुरक्षा के लिए समुदाय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों की कितनी जरूरत है?
व्यवहार में बदलाव और जागरूकता से कई घटनाएं टाली जा सकती थीं। पिथौरागढ़ का एक उदाहरण है। शादी समारोह से लौट रहे एक दंपत्ति ने घर जल्दी पहुंचने के चक्कर में जंगल का शॉर्टकट लिया। वहां उनका सामना गुलदार से हुआ और उसने पत्नी को मार दिया। दुखी होकर पति ने वहीं पत्थर पर सिर पटककर अपनी जान दे दी। अगर वे गांव के परंपरागत रास्ते से लौटते तो ये दुर्घटना टाली जा सकती थी।
हर घटना के पीछे की कहानी हमें सीखने और समाधान समझने में मदद करती है। इसलिए समुदाय के साथ लगातार संवाद और कार्रवाई जरूरी है।
संघर्ष कम करने और संरक्षण के उद्देश्य से राज्य में कई संस्थाएं वर्षों से काम कर रही हैं, फिर भी बदलाव क्यों नहीं दिखता?
राज्य में लैंडस्केप लेवल यानी एक बड़े भू-भाग पर एक साथ और लगातार कार्य करना होगा। ब्लैकफुट चैलेंज के उदाहरण से समझें, अमेरिका के मोंटाना राज्य में वे 20 वर्ष से ज्यादा समय से संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में एक बड़े भू-भाग पर लगातार काम कर रहे हैं। समुदाय, संवाद, जागरूकता, तकनीक, कचरा प्रबंधन और मृत पशु के शव के निस्तारण जैसे कई स्तरों पर एक साथ कार्रवाई की जा रही है।
हमारे यहां कई बार काम छोटे-छोटे हिस्सों में और कम अवधि के लिए होता है। उदाहरण के लिए वन विभाग के साथ कार्य कर रही तितली ट्रस्ट ने गुलदार को लेकर कुछ समय टिहरी वन प्रभाग में काम किया, फिर अगले प्रोजेक्ट में पौड़ी वन प्रभाग में। अब वे नरेंद्र नगर और रुद्रप्रयाग वन प्रभाग में काम कर रहे हैं। ये सारे इलाके आपस में जुड़े हुए हैं और एक ही लैंडस्केप का हिस्सा हैं। इसलिए जिला या वन प्रभाग नहीं, बल्कि पूरे भू-भाग पर एक साथ कार्य करने की आवश्यकता है।
अगर किसी गांव में कचरा प्रबंधन या मृत पशु निपटान बेहतर हो जाए, तो वन्यजीव भोजन की तलाश में वहां कम आएगा। लेकिन जब आसपास के गांवों में ये व्यवस्था नहीं होगी, तो समस्या एक जगह से हटकर दूसरी जगह जा सकती है।
इसी वजह से कई परियोजनाओं का असर सीमित रह जाता है। उदाहरण के तौर पर राजाजी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर अलग-अलग समय पर संस्थागत प्रयास हुए। वर्ष 2021 महाकुंभ से पहले डब्ल्यूआईआई ने हाथियों की आवाजाही की निगरानी के लिए रेडियो कॉलर लगाने और चेतावनी व्यवस्था पर काम किया। वहीं, राजाजी टाइगर रिजर्व में वर्ष 2017 से 2023 के बीच जीआईज़ेड ने भी संघर्ष रोकथाम से जुड़े प्रयास किए। लेकिन परियोजनाओं की अवधि पूरी होने के बाद यह सवाल बना रहता है कि इन प्रयासों का प्रभाव लंबे समय तक कैसे टिके और जमीन पर किस रूप में दिखाई दे।
अलग-अलग प्रयास बिखर जाते हैं और इनका फायदा इकट्ठा होकर जुड़ नहीं पाता।
राज्य में अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग वन्यजीव सक्रिय हैं। इस स्थिति में रणनीति कैसी होनी चाहिए?
हमें वन्यजीव प्रजाति और भौगोलिक क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए योजना बनानी चाहिए। जैसे बाघ से संघर्ष की स्थिति नैनीताल, उधमसिंह नगर और पौड़ी में है। लेकिन चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, पौड़ी और टिहरी में गुलदार और भालू दोनों के हमले हो रहे हैं। इसलिए बड़े शिकारी वन्यजीवों को एक साथ देखकर रणनीति बनानी होगी।
राज्य में वन्यजीव संघर्ष प्राकृतिक आपदा के तौर पर अधिसूचित है। इसके क्या मायने हैं?
प्राकृतिक आपदा की स्थिति में एक अलग व्यवस्था काम करती है। ये सिर्फ वन विभाग से जुड़ा मसला नहीं रह जाता। कृषि, पशुपालन, पुलिस, राजस्व, जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन सभी इससे जुड़े हैं। हमारा सुझाव था कि राज्य में इस विषय पर सभी संबंधित विभागों की एक उच्चस्तरीय समिति होनी चाहिए, जो हर तीन महीने में बैठक करे। सभी विभाग अपने अनुभव और कार्य योजना साझा करें। इससे एक साझा नीति बनेगी जो ज्यादा प्रभावी होगी।
मृत पशु के शव और कचरा प्रबंधन को लेकर आप क्या कहना चाहेंगे?
मृत पशु के शव का व्यवस्थित निपटान बहुत जरूरी है। वन्यजीव जब मृत पशु को खाता है तो उस भोजन की आदत बनती चली जाती है।
भ्रमण के दौरान हम कार्बेट के नज़दीक सांकर गांव के ग्रामीणों से बात कर रहे थे। बाघ के हमले में घायल कमला देवी बताती हैं कि बाघ ने उनके एक पशु को मार दिया। पशु का वज़न इतना अधिक था कि पति और किशोर बेटा मिलकर शव नहीं हटा पा रहे थे। उन्होंने इंतजार किया कि बाघ उस मृत पशु को खा ले। फिर मौका देखकर शव को खींचा और सड़क किनारे छोड़कर आए।
गांवों में पशु शव निपटान की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं है। यही स्थिति कचरा प्रबंधन की है।
जंगल से सटे गांवों में संघर्ष से बचाव का क्या उपाय है?
हम अभी घटना के बाद त्वरित कार्रवाई पर काम कर रहे हैं। घटना के बाद हमारी गाड़ी कितनी तेज़ी से पहुंच रही है, हम कितनी जल्दी जानवर को ट्रैंकुलाइज़ कर रहे हैं। दूसरा तरीका है कि शांति के समय में लोगों से संभावित खतरे और उसके समाधान पर बात करें। पहला तरीका रिएक्टिव है और दूसरा प्रो-एक्टिव।
2019 की एक वर्कशॉप में लखपत सिंह रावत और जॉय हुकिल ने हिस्सा लिया था। वे नरभक्षी वन्यजीवों को लेकर वन विभाग की मदद करते हैं। उनके पास बेहद कीमती जानकारी है। वे एक गांव को देखकर बता सकते हैं कि किस घर पर वन्यजीव के हमले का खतरा होगा। जिस घर की छत जंगल की ढलान से लगी हुई हो, वन्यजीव के लिए उस घर में घुसना मामूली बात होगी।
अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, एआई कैमरा, रेडियो कॉलर, इलेक्ट्रिक फेंसिंग जैसी तकनीक कितनी कारगर है?
अलार्म, एआई कैमरे, रेडियो कॉलर, अध्ययन के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण हैं। प्रयोग के साथ-साथ इनकी व्यवहारिकता का आकलन करना होगा।
सोलर से चलने वाली इलेक्ट्रिक घेरबाड़ को लेकर गुणवत्ता और देखरेख की समस्या है। लेकिन संघर्ष के लिहाज से संवेदनशील हॉटस्पॉट में इन्हें लगाया जा सकता है। हालांकि मुख्य भूमिका संवाद और भागीदारी की ही है। इसके बिना सारे प्रयास अधूरे होंगे।
क्या आप इसे नीतिगत विफलता के तौर पर देखते हैं?
मुख्यमंत्री घस्यारी योजना का उदाहरण है। वर्ष 2021 में ये योजना लाई गई थी। सीमित पशु वाले परिवारों को रियायती दरों पर घास उपलब्ध करायी जाए, ताकि घास लेने जंगल गई महिला वन्यजीव का शिकार होने से बच सके।
हल्द्वानी में घास लेने जंगल गई एक महिला बाघ के हमले में मारी गई। ग्रामीणों से हमने घस्यारी योजना के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि गांव में सिर्फ एक बार चारा आया। वो भी पशु को खिलाने योग्य नहीं था।
अगर ये योजना सफल होती तो शायद ऐसा नहीं होता।
(उत्तराखंड सहकारिता विभाग की मुख्यमंत्री घस्यारी योजना के लिए वर्ष 2024-25 में शून्य बजट रखा गया। वर्ष 2025-26 के लिए 20 करोड़ का प्रावधान किया गया है।)
जंगल में बढ़ती लैंटाना जैसी प्रजातियां कितना बड़ा खतरा हैं?
लैंटाना समेत आक्रामक प्रजातियां एक बड़ी समस्या है। वर्ष 2009 में कार्बेट का एक सफल प्रयोग है। पर्यावरणविद् प्रोफेसर सीआर बाबू ने कट-रूट-स्टॉक मैथड के जरिये तकरीबन 60 हेक्टेअर में लैंटाना हटाकर घास की स्थानीय प्रजातियां उगाई। जल निकाय बनाया और सौर ऊर्जा आधारित बिजली की तारबाड़ लगाई। जिस जगह हमने कभी बाघ-हाथी नहीं देखे, वहां सालभर इनकी मौजूदगी दर्ज होने लगी।
जहां लैंटाना होगी वहां चरने योग्य घास नहीं होगी। शाकाहारी जीवों को भोजन की दिक्कत होगी और मांसाहारी वन्यजीव भी उन्हीं के पीछे जाएंगे।
हमें कैंपा के तहत पौधरोपण से ज्यादा ध्यान चरने योग्य घास उगाने पर देना होगा। स्थानीय घास प्रजातियों और फलीदार पौधों की नर्सरी तैयार करनी होगी। ये बचाव का एक तरीका है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम को लेकर आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
ब्लैकफुट चैलेंज के मॉडल को समझने और अमेरिकी जीव वैज्ञानिक सेथ एम. विल्सन के साथ उत्तराखंड भ्रमण का उद्देश्य यही था कि संवाद, भागीदारी और बचाव के उपाय ज्यादा जरूरी हैं। हम सिर्फ मुआवज़े की धनराशि बढ़ाने, रैपिड रिस्पॉन्स टीम गठित करने और पिंजड़े-ट्रैंकुलाइज़र जैसे उपकरणों की मांग कर रहे हैं। वन्यजीव को पकड़ना समाधान नहीं।
वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को बैठकों से ज्यादा लोगों के बीच मौजूद होना होगा। साथ ही एक ऐसी न्यूट्रल एजेंसी की जरूरत है जो इस विषय से जुड़े सभी साझेदारों को जोड़े, उनके अनुभव, सीख-समझ और योजनाओं को एक मंच पर लाए।