झारखंड के एक सुदूर कोने में सप्तमी की सुबह कोतोगड़ा के देवी मंडप में एक अलग चहल पहल है, नवपत्रिका पूजा की तैयारी चल रही है। बंगाल से सटे इस गांव में, सैकड़ों साल पुरानी पारिवारिक परंपरा की स्मृतियां समेटे गुरु परिवार के घर के सामने दुर्गापूजा की हलचल है। पूजा के लिए छठी यानी षष्ठी से ही परिवार के सदस्य देश के कोने कोने से जुटने लगते हैं। सुबह और शाम मंत्रोच्चार की ध्वनि खास कर लयबद्ध नमंत्रम का सामूहिक पाठ वातावरण में श्रद्धा और आस्था की संगीत से गुंजायमान रहती है। पूजा के अनुशासन के बीच एक ऐसी सामूहिकता बनती है, जिसमें परिवार की कई पीढ़ियां एक साथ दिखाई देती हैं। यहां उत्सव का अर्थ केवल देवी की प्रतिमा के सामने जुटना नहीं है; प्रकृति की स्थानीय नौ वनस्पतियों को देवी का स्वरूप देने वाली नवपत्रिका की आराधना पूजा के केंद्र में रहती है।
इस पूजा की जड़ें परिवार की स्मृति में कई सौ वर्ष पीछे तक जाती हैं, हालांकि कोतोगड़ा में इसका आयोजन वर्ष 1916 से होता आ रहा है। परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य वैकुंठ दास गुरु जो अपने कुनबे के चाको बाबा हैं, के मुताबिक, उनके पूर्वज ‘दाड़ित’ से यहां आए थे और कुछ वर्षों बाद उनके बाबा नारायण दास गुरू के समय गांव में पूजा शुरू हुई। इस तरह यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक स्थान से दूसरे स्थान तक यात्रा करती पारिवारिक स्मृति भी है।
लेकिन इस पूजा में एक ऐसा पक्ष भी है जो गांव, परिवार और इतिहास की सीमाओं से आगे जाता है। वह है नवपत्रिका, नौ विशेष पत्तियों को एक साथ बांधकर देवी का मानवीय स्वरूप देने और उनकी स्थापना करने की विधि। षष्ठी को माता का आह्वान होता है। सप्तमी को सभी स्थानीय नौ किस्म के पत्तो और पटुआ की रस्सी से देवी का प्रतीकात्मक स्वरुप तैयार किया जाता है और बाँस से बनी पालकी से देवी को पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता हैं। यह केवल कोतोगड़ा की परंपरा नहीं, बल्कि बंगाल और उससे जुड़े सांस्कृतिक भूगोल में प्रचलित दुर्गापूजा की व्यापक परंपरा का हिस्सा है।
इस दृश्य में एक सवाल छिपा है: जब दुर्गा की भव्य प्रतिमा सामने स्थापित होती है, तब नौ पौधों से देवी का अलग से रूप देने की जरूरत क्यों पड़ती है?
दुर्गापूजा की सार्वजनिक छवि में अक्सर विशाल प्रतिमाएं, कलात्मक पंडाल, रोशनी और भीड़ दिखाई देती है। लेकिन पूजा के भीतर ऐसे अनुष्ठान भी हैं जिनमें देवी को मिट्टी, जल, पेड़-पौधों और कृषि से जोड़कर देखा जाता है। नवपत्रिका उन्हीं में से एक है। बंगाल में इसे कई जगह ‘कलाबऊ’ भी कहा जाता है, क्योंकि केले का पौधा इस समूह का प्रमुख हिस्सा होता है वही नेपाल में इसे फूलपाती कहते हैं।
नवपत्रिका का शाब्दिक अर्थ ‘नौ पत्ते’ समझा जाता है, लेकिन व्यवहार में यह केवल नौ अलग-अलग पत्तों का गुच्छा नहीं है। इसमें नौ तरह की वनस्पतियां या पौधों के हिस्से शामिल होते हैं, जिन्हें एक साथ बांधकर देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं में पौधों की पहचान या विधि में कुछ अंतर मिल सकते हैं। प्रचलित बंगाली में केले, कचू, हल्दी, जयंती, बेल, अनार, अशोक, मानकचू और धान को इसमें शामिल किया जाता है, जिसमे हरेक का नवरात्री में देवी के सभी नौ रूपों से सम्बंधित हैं।
यहां प्रकृति किसी दूर खड़े, सुंदर दृश्य का नाम नहीं है। वह भोजन है, औषधि है, छाया है, खेत की उपज है और जीवन के बने रहने की शर्त है। पूजा में इन्हें एक साथ बांधना, मानो उस विविधता को एक ही जीवित रूप में पहचानना है, जिस पर मनुष्य का जीवन निर्भर करता है।
नवपत्रिका में शामिल पौधों को परंपरागत रूप से देवी के विभिन्न रूपों से जोड़ा जाता है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार केले को ब्रह्माणी, कचू को कालिका, हल्दी को उमा, जयंती को कार्तिकी, बेल को शिवा, अनार को रक्तदन्तिका, अशोक को शोकहरिता, मानकचू को चामुंडा और धान को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। इन संबंधों का विवरण क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग रूप में मिल सकता है। ये धार्मिक-सांस्कृतिक अर्थ हैं, वनस्पति-विज्ञान के वर्गीकरण नहीं।
इन संबंधों को केवल प्रतीकों की सूची मानकर छोड़ देना भी पर्याप्त नहीं होगा। केला फल देता है और उसके पत्ते भोजन परोसने से लेकर अनेक घरेलू कामों में उपयोग होते हैं। हल्दी भोजन, रंग और पारंपरिक उपचारों में अपनी जगह रखती है। बेल धार्मिक जीवन के साथ-साथ स्थानीय पारिस्थितिकी में भी जाना-पहचाना वृक्ष है। अनार फल देने वाला पौधा है, जबकि धान दक्षिण एशिया के विशाल कृषि जीवन का आधार है। अशोक और जयंती जैसे पौधों के नाम धार्मिक स्मृति में टिके हुए हैं, भले ही उनकी स्थानीय पहचान और उपयोग को समझने के लिए क्षेत्र-विशेष की जानकारी जरूरी हो
इन वनस्पतियों को देवी के अलग-अलग रूपों से जोड़ने का अर्थ यह नहीं कि उनका महत्व केवल पूजा तक सीमित है। इसके उलट, यह परंपरा मनुष्य को याद दिलाती है कि जीवन की अलग-अलग जरूरतें अलग-अलग जीवों और पौधों से पूरी होती हैं। भोजन, औषधि, मिट्टी की सेहत, परागण और स्थानीय जैव-विविधता, प्रकृति की ये प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। नवपत्रिका इन वैज्ञानिक अवधारणाओं को आधुनिक शब्दावली में नहीं समझाती, लेकिन वह सांस्कृतिक भाषा में विविधता और जीवन के परस्पर संबंध को सामने रखती है।
धान को लक्ष्मी से जोड़ना विशेष अर्थ रखता है। खेत में खड़ी फसल केवल अनाज नहीं, आने वाले महीनों की भोजन-सुरक्षा, किसान की मेहनत और परिवार की आर्थिक उम्मीद भी है। इसी तरह हल्दी, केला और अन्य पौधों की उपस्थिति बताती है कि देवी का संसार खेत और घर से अलग नहीं है। इस अर्थ में नवपत्रिका को कृषि-स्मृति का एक अनुष्ठानिक रूप भी पढ़ा जा सकता है।
नवपत्रिका के महत्त्व को समझते समय ऐसा लगता है कि शायद यह परंपरा आज की भव्य मूर्ति-पूजा के चलन में आने से पहले की आदिम प्रकृति-पूजा का अवशेष हो सकती है। बंगाल में देवी की प्रतिमा और दुर्गापूजा की परंपरा का इतिहास लंबा है, पर नृवंश विज्ञान के संदर्भ प्रकृति पूजा के प्राचीनता की तरफ रेखांकित करते है। जब तक मिट्टी की मूर्तियों में देवत्व की प्राण-प्रतिष्ठा की समझ लोकप्रिय नहीं हुई थी, तब तक ये नौ पौधे ही साक्षात देवीय चेतना के सबसे सुलभ और जीवंत माध्यम थे। मूर्ति पूजा का चलन प्रकृति के इस आदिम पूजा पद्धति से साथ ही विकसित हुई और मध्यकाल तक आते आते ये नौ पौधे माँ दुर्गा के नौ रूपों (नवदुर्गा) जैसे ब्राह्मणी, कालिका, लक्ष्मी आदि के जीवित और शास्त्र-सम्मत प्रतीक बन गए।
दुर्गा की प्रतिमा देवी को एक दृश्य, मानवीय और कथात्मक रूप देती है, महिषासुर पर विजय, शक्ति और न्याय का रूप। नवपत्रिका उसी पूजा में देवी की उपस्थिति को वनस्पतियों के समूह के माध्यम से व्यक्त करती है। एक रूप में देवी शिल्पकार के हाथों आकार लेती हैं; दूसरे में खेत, बगीचे और स्थानीय वनस्पति पूजा के केंद्र में आ जाती है। इस प्रकार मातृशक्ति को समर्पित दोनों विधिया एक दुसरे के पूरक है और इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय संस्कृति में निराकार प्रकृति (नवपत्रिका) और साकार ईश्वर (मूर्ति) दोनों एक ही परिकल्पना के दो अभिन्न स्वरुप हैं।
नवपत्रिका का महत्व इस बात में भी है कि यह प्रकृति को केवल उपयोगी संसाधन की तरह देखने से आगे बढ़ती है। आधुनिक जीवन में पौधों का मूल्य अक्सर बाजार, उत्पादन या सजावट से तय होता है। अनुष्ठान उन्हें सम्मान और पवित्रता के दायरे में रखता है। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि कोई धार्मिक रस्म अपने आप जंगलों, खेतों या जैव-विविधता की रक्षा सुनिश्चित कर देती है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि प्रकृति के प्रति आदर की सांस्कृतिक स्मृति पर्यावरण के बारे में सार्वजनिक समझ को गहरा करती है, जो हमें प्रक्रति के प्रति संवेदनशील बनाती है।
यूनेस्को ने दुर्गापूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है और इस उत्सव को प्रकृति और जीवन की सृजनात्मक शक्ति से जुड़े व्यापक सांस्कृतिक महत्त्व का माना है। ऐसे दृष्टिकोण से नवपत्रिका केवल पूजा-पद्धति का एक छोटा हिस्सा नहीं रह जाती; वह दिखाती है कि सांस्कृतिक परंपराएं मनुष्य और उसके प्राकृतिक परिवेश के बीच संबंध को किस तरह अर्थ देती हैं।
हालांकि, इस सांस्कृतिक अर्थ को वास्तविक पर्यावरणीय जिम्मेदारी में बदलने के लिए अगला कदम भी जरूरी है। जिन पौधों को पूजा में स्थान मिलता है, क्या वे आसपास के गांवों में अब भी आसानी से उपलब्ध हैं? क्या स्थानीय लोग उनके नाम, पहचान और उपयोग जानते हैं? क्या नई पीढ़ी धान की किस्मों, औषधीय पौधों और स्थानीय वृक्षों के बारे में अपने बुजुर्गों से सीख रही है? क्या इन पौधों के स्थानीय उपयोग की शब्दावली आज भी प्रचलन में है? ऐसे प्रश्न नवपत्रिका को केवल धार्मिक व्याख्या से आगे ले जाकर स्थानीय जैव-विविधता के दस्तावेजीकरण का अवसर बना सकते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण यह है कि परंपरा का सम्मान करने का अर्थ हर पुरानी प्रथा को बिना सवाल के पर्यावरण अनुकूल घोषित करना नहीं है। पौधों का संग्रह जिम्मेदारी से हो, स्थानीय प्रजातियों पर अनावश्यक दबाव न पड़े और पूजा के बाद सामग्री का निपटान जलस्रोतों को नुकसान पहुंचाए बिना किया जाए,ऐसे प्रयास धार्मिक आस्था और पर्यावरणीय विवेक के लिए जरुरी हैं।
कोतोगड़ा में गुरु परिवार की पूजा इस व्यापक विमर्श को एक ठोस मानवीय संदर्भ देती है। लगभग सभी परिवार जो अब प्रवासी हो चुके है पूजा के इसे सालाना उत्सव पर जुटते हैं। मंत्रोच्चार और पूजा का अनुशासन कई पीढ़ियों को एक साझा अनुभव में बांधता है। पूर्वजो द्वारा शरू की गई परिवार की यात्रा, दाड़ित से कोतोगड़ा तक और फिर 1916 से कोतोगड़ा में पूजा की निरंतरता, यह बताती है कि परंपराएं लोगो के साथ चलती हैं, नए स्थानों में जड़ें जमाती हैं और स्थानीय जीवन का हिस्सा बन जाती हैं।
नवपत्रिका की विधि इस यात्रा में प्रकृति को भी सहभागी बनाती है। पटुआ के रेशे की रस्सी से नौ वनस्पतियों को एक साथ बांधना अपने आप में एक सरल दृश्य है, लेकिन उसका अर्थ गहरा है: अलग-अलग पौधे अपनी अलग पहचान रखते हुए एक साझा रूप बनाते हैं। इसे आज की भाषा में जैव-विविधता और पारस्परिक निर्भरता समझा जा सकता है, बिना यह दावा किए कि अनुष्ठान का मूल उद्देश्य आधुनिक पर्यावरण-विज्ञान समझाना था।
कोटोगारा की पूजा का महत्व इसलिए केवल उसके पुराने होने में नहीं है। उसकी जीवंतता ना केवल इस बात में है कि लोग आज भी एक साथ आते हैं, विधि निभाते हैं, मंत्र पढ़ते हैं और पारिवारिक स्मृतियों को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि यह जीवन्तता इको कल्चरल हेरिटेज का स्वरुप लेती है जो अब शायद राज्य में बीरले ही बचे हो। यदि इस प्रक्रिया में पौधों की स्थानीय पहचान, उनके प्राकृतिक आवास और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को भी दर्ज किया जाए, तो पूजा पर्यावरणीय विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन सकती है।
दुर्गापूजा के दिनों में देवी को देखने के अनेक रास्ते हैं, प्रतिमा में, कथा में, संगीत में, सामूहिक उत्सव में और नवपत्रिका में। कोतोगड़ा की सुबह इन रास्तों को एक-दूसरे से जोड़ती है। वहां नौ वनस्पतियां देवी का स्वरूप बनती हैं, लेकिन वे खेत और बगीचे की दुनिया से अपना संबंध नहीं खोतीं। शायद इसी में नवपत्रिका की सबसे समकालीन सीख छिपी है: प्रकृति हमारे जीवन के बाहर रखी कोई वस्तु नहीं, बल्कि उस जीवन का हिस्सा है जिसे हम भोजन, श्रम, स्मृति और आस्था के जरिए रोज बनाते हैं और कोतोगड़ा की दुर्गा पूजा हमें इस एहसास को फिर से मूर्त रूप देती है।
(लेखक को कोतोगड़ा के दुर्गा पूजा में शामिल हो कर इस इको कल्चरल हेरिटेज को नजदीक से देखने समझने का मौका मिला है और ये आलेख उसी समझ का नतीजा है)