यह तस्वीर कार्तिक सिंह ने मिर्जापुर में कैमूर हिल्स में खींची।  
वन्य जीव एवं जैव विविधता

क्या दुधवा के जंगलों में अब भी मौजूद है धारीदार लकड़बग्घा?

एक हालिया समीक्षा में दुधवा में लकड़बग्घे का अंतिम रिकॉर्ड 2010 बताया गया है, जबकि 2013–14 के सर्वेक्षण और 2014 की रिपोर्ट में इसकी मौजूदगी का उल्लेख मिलता है

Vipin Kapoor Sainy, Aqsa Jaseem, Rohit Ravi, Jagadeesh Ramasamy, Dr. H Raja Mohan

नवंबर 1905 में इलाहाबाद में बैठे आईसीएस अधिकारी एच. आर. नेविल खीरी का गजेटियर पूरा कर रहे थे। जिले के वन्यजीवों का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा कि 1856 में अवध के अंग्रेजी शासन में शामिल होने के बाद से अधिकांश बड़ी प्रजातियां घट चुकी थीं। हाथी जिले से गायब हो चुका था, जंगली भैंसा नहीं रहा था और खेती के विस्तार के साथ बाघ खैरीगढ़ और कुकरा के दुर्गम जंगलों तक सिमट गए थे।

तेंदुओं के बारे में लिखा गया कि वे अब भी काफी आम थे और मवेशियों को काफी नुकसान पहुंचाते थे। इसके बाद मांसाहारियों की सूची में एक छोटी-सी पंक्ति आती है—भेड़िया, जंगली कुत्ता, सियार, लकड़बग्घा और लोमड़ी।

लकड़बग्घे के लिए बस एक शब्द। आज, 120 साल से अधिक समय बाद, वही एक शब्द दुधवा के लिए एक बड़ा वैज्ञानिक सवाल बन चुका है।

क्या धारीदार लकड़बग्घा अभी भी दुधवा के जंगलों में मौजूद है?

धारीदार लकड़बग्घा भारत में पाई जाने वाली लकड़बग्घे की एकमात्र जीवित प्रजाति है। यह अफ्रीका के प्रसिद्ध चित्तीदार लकड़बग्घे से अलग है और उसका व्यवहार भी अलग है। यह मुख्यतः रात में सक्रिय रहने वाला, अवसरवादी मृतभक्षी और छोटे से मध्यम आकार के जीवों का शिकारी है। यह अक्सर अकेला या छोटे पारिवारिक समूहों में रहता है और अपने बेहद मजबूत जबड़ों से हड्डियों तक को तोड़कर खा सकता है।

भारत में इसकी उपस्थिति सामान्यतः शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों, खुले वनों, झाड़ीदार भूमि, कृषि परिदृश्य और मानव बस्तियों के आसपास के इलाकों से जुड़ी रही है। इसके विपरीत दुधवा की पहचान नम तराई, घने साल वनों, ऊंची घास और दलदली क्षेत्रों से होती है। पहली नजर में दुधवा धारीदार लकड़बग्घे का आदर्श आवास नहीं लगता।

लेकिन दुधवा की कहानी इसी विरोधाभास को सामने लाती है।

1905 के खीरी में जंगल केवल घने वन नहीं थे। जंगलों के बीच बड़े घास के मैदान, खुले क्षेत्र और चरागाह भी थे। खीरी एक बड़ा पशुपालक जिला था। 1904 की पशु-गणना में गाय, बैल, भैंस और बछड़ों की संख्या दस लाख से अधिक दर्ज की गई थी। जंगलों से लगे गांवों को चराई की सुविधाएं मिली हुई थीं और पशुधन का बड़ा हिस्सा जंगलों तथा आसपास के खुले क्षेत्रों पर निर्भर था।

ऐसे परिदृश्य में धारीदार लकड़बग्घे के लिए महत्वपूर्ण भोजन—मृत पशु, दूसरे शिकारी द्वारा छोड़े गए शिकार के अवशेष और छोटे वन्यजीव—प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहे होंगे। इसलिए 1905 में इसका सामान्य वन्यजीव के रूप में दर्ज होना असामान्य नहीं था।

लेकिन अगले सौ वर्षों में तराई का भू-दृश्य तेजी से बदल गया।

मलेरिया नियंत्रण, मानव बसावट, कृषि विस्तार और हरित क्रांति के बाद जंगलों के बाहर के खुले भू-भाग का बड़ा हिस्सा खेती में बदल गया। दुधवा और किशनपुर के बीच का परिदृश्य आज बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती से घिरा है। जिस मिश्रित भू-दृश्य में जंगल, चरागाह, गांव और खुले क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े थे, वह अब अधिक खंडित हो चुका है।

यह बदलाव धारीदार लकड़बग्घे के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

धारीदार लकड़बग्घा केवल जंगल के भीतर रहने वाला मांसाहारी नहीं है। उसके लिए जंगल के किनारे, खुले क्षेत्र, झाड़ियां और मानव-प्रभुत्व वाले क्षेत्र भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए दुधवा में इसकी स्थिति समझने के लिए केवल राष्ट्रीय उद्यान के घने कोर क्षेत्र को देखना पर्याप्त नहीं होगा।

दुधवा से उपलब्ध आधुनिक वैज्ञानिक रिकॉर्ड इस कहानी को और रोचक बनाते हैं। 2010 के राष्ट्रीय बाघ स्थिति आकलन में दुधवा और सोहागीबरवा में धारीदार लकड़बग्घे की मौजूदगी दर्ज की गई थी। लेकिन उसी आकलन में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई—दुधवा और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में लगाए गए कैमरा ट्रैप से लकड़बग्घे की कोई तस्वीर नहीं मिली।

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

इसका अर्थ यह नहीं कि लकड़बग्घा वहां मौजूद नहीं था। बल्कि यह संकेत देता है कि बाघों की निगरानी के लिए तैयार किया गया कैमरा ट्रैप तंत्र धारीदार लकड़बग्घे का पता लगाने के लिए पर्याप्त प्रभावी नहीं हो सकता था।

धारीदार लकड़बग्घा कम घनत्व में रहने वाला, मुख्यतः निशाचर और बड़े क्षेत्र में घूमने वाला जीव है। यदि कैमरे मुख्य रूप से बाघों के आवागमन वाले रास्तों, शिकार की गतिविधि वाले स्थानों और बड़े मांसाहारियों के उपयोग वाले क्षेत्रों में लगाए जाएं, तो लकड़बग्घे के कैमरे में आने की संभावना कम हो सकती है। खासकर तब, जब वह जंगल के अंदर के बजाय जंगल की सीमा, खेतों या गांवों के आसपास अधिक सक्रिय हो।

इसके बाद दुधवा से एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सामने आया।

2013–14 के सर्वेक्षण और 2014 में प्रकाशित रिपोर्टों में सठियाना और बनकटी रेंज में धारीदार लकड़बग्घों के समूह दर्ज होने की सूचना मिली। ये वही क्षेत्र हैं जिनका उल्लेख 1905 के गजेटियर में वन-बंगलों के रूप में मिलता है।

एक सदी के अंतराल के बाद वही भू-दृश्य फिर इस प्रजाति की मौजूदगी से जुड़ गया। लेकिन इसके बाद रिकॉर्ड फिर शांत हो गए।

2018 के राष्ट्रीय आकलन में शिवालिक और गंगा के मैदानों वाले परिदृश्य में धारीदार लकड़बग्घे का दर्ज क्षेत्र 2010 के 2,795 वर्ग किलोमीटर से घटकर 1,054 वर्ग किलोमीटर रह गया। दुधवा और सोहागीबरवा, जहां पहले इसकी मौजूदगी दर्ज थी, बाद के आकलन में सूची से बाहर थे। 2022 में दर्ज क्षेत्र और घटकर 885 वर्ग किलोमीटर रह गया। लेकिन यहां एक वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है।

दर्ज क्षेत्र का कम होना वास्तविक जनसंख्या में कमी का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता। स्वयं आकलन यह मानता है कि धारीदार लकड़बग्घे की वास्तविक वितरण-सीमा कम आंकी जा सकती है, क्योंकि यह संरक्षित क्षेत्रों के बाहर गांवों, खेतों और मानव-प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में भी पाया जाता है।

दुधवा के मामले में यही पहचान संबंधी समस्या और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। एक हालिया समीक्षा में दुधवा में लकड़बग्घे का अंतिम रिकॉर्ड 2010 बताया गया है, जबकि 2013–14 के सर्वेक्षण और 2014 की रिपोर्ट में इसकी मौजूदगी का उल्लेख मिलता है। यह रिकॉर्डों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर पैदा करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई एक रिकॉर्ड गलत है। बल्कि यह बताता है कि दुधवा में धारीदार लकड़बग्घे की निगरानी लंबे समय तक इस प्रजाति पर केंद्रित नहीं रही।

उत्तराखंड का अनुभव इस समस्या को समझने में मदद करता है।

रामनगर वन प्रभाग में धारीदार लकड़बग्घे का अंतिम लिखित प्रमाण 1977 के कार्ययोजना दस्तावेज में था। बाद के कई अखिल भारतीय बाघ आकलनों में लगाए गए कैमरा ट्रैप में यह दर्ज नहीं हुआ। लेकिन 2015 में विशेष रूप से धारीदार लकड़बग्घे की मौजूदगी तलाशने के लिए किए गए सर्वेक्षण में इसकी तस्वीर प्राप्त हुई, जिसे बाद में प्रकाशित किया गया।

अर्थात सामान्य निगरानी में लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के बावजूद एक विशेष रूप से तैयार सर्वेक्षण ने इसकी मौजूदगी सामने ला दी। दुधवा में भी ऐसी संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता।

नेपाल की तराई से मिलने वाले रिकॉर्ड इस संभावना को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। धारीदार लकड़बग्घा नेपाल में दुर्लभ है, फिर भी पर्सा, चितवन, बांके, बर्दिया और शुक्लाफांटा जैसे संरक्षित क्षेत्रों से इसके रिकॉर्ड मिल चुके हैं। भारत की सीमा से लगे तराई क्षेत्रों से भी इसकी मौजूदगी दर्ज हुई है।

शुक्लाफांटा में कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण के दौरान यह केवल एक बार कैमरे में आया। पर्सा में शुरुआती सर्वेक्षणों में यह नहीं मिला, लेकिन बाद के लक्षित सर्वेक्षण में इसकी तस्वीरें दर्ज हुईं।

इससे एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक बात सामने आती है—

कैमरा ट्रैप में धारीदार लकड़बग्घा नहीं मिला, इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि वह उस क्षेत्र में मौजूद नहीं है।

दुधवा में संभावित आवास को भी इसी दृष्टि से देखना होगा। यदि धारीदार लकड़बग्घा यहां मौजूद है, तो केवल कोर जंगल में उसकी तलाश पर्याप्त नहीं होगी। जंगल और गांव की सीमा, खुले घास क्षेत्र, पुराने चरागाह, झाड़ीदार भू-भाग, नदी के ऊंचे कगार, नालों के आसपास के क्षेत्र और पशुधन वाले गांवों के आसपास के भू-दृश्य को सर्वेक्षण में शामिल करना होगा।

इसके साथ भोजन की उपलब्धता का अध्ययन भी जरूरी है। मृत पशुओं की उपलब्धता, जंगली शाकाहारियों के शव, बाघ और तेंदुए जैसे शिकारियों द्वारा छोड़े गए शिकार के अवशेष तथा मानव-प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में उपलब्ध भोजन उसकी गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।

सड़कें भी एक संभावित खतरा हो सकती हैं। यदि धारीदार लकड़बग्घा जंगल और गांव के बीच आवाजाही करता है, तो सड़क पार करते समय होने वाली मृत्यु उसके लिए महत्वपूर्ण खतरा बन सकती है। नेपाल की तराई में सड़क दुर्घटना से धारीदार लकड़बग्घे की मृत्यु का रिकॉर्ड इस संभावित जोखिम की ओर संकेत करता है।

मृत पशु इसके लिए भोजन हैं, लेकिन यही संसाधन जोखिम भी बन सकते हैं। पशु-चिकित्सा दवाओं के अवशेष, जहरीले पदार्थ या जानबूझकर विष दिए गए शव मृतभक्षी प्रजातियों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। हालांकि दुधवा में इनके प्रभाव को लेकर अभी पर्याप्त प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि धारीदार लकड़बग्घा दुधवा से गायब हो गया है या उसके पतन का कोई एक कारण है।

सबसे पहले यह पता लगाना जरूरी है कि वह अभी दुधवा में मौजूद है या नहीं। इसके लिए एक विशेष और लक्षित सर्वेक्षण की जरूरत है। पुराने वन अभिलेखों की समीक्षा, 2010 और उसके बाद के सभी कैमरा ट्रैप आंकड़ों का दोबारा विश्लेषण, गश्ती दलों के रिकॉर्ड, जंगल से लगे गांवों के चरवाहों और बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी तथा प्रजाति-विशेष कैमरा ट्रैपिंग को एक साथ जोड़ा जाना चाहिए।

इसके साथ मल के नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण, पदचिह्नों और अन्य संकेतों का सर्वेक्षण तथा संभावित आवास का मानचित्रण किया जा सकता है। जहां संभव हो, आनुवंशिक विश्लेषण से प्रजाति की पुष्टि भी की जा सकती है।

ऐसा अध्ययन केवल यह जानने के लिए नहीं होगा कि दुधवा में एक दुर्लभ प्रजाति बची है या नहीं। धारीदार लकड़बग्घा पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण मृतभक्षी है। मृत जीवों और उनके अवशेषों को हटाकर यह पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में भूमिका निभाता है। इसलिए इसकी मौजूदगी या अनुपस्थिति दुधवा के बदलते भू-दृश्य को समझने का एक संकेत भी हो सकती है।

धारीदार लकड़बग्घा वर्तमान में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल है और इसे उच्चतम कानूनी संरक्षण प्राप्त है। 2026 में प्रवासी वन्य प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय के सम्मेलन में इसके अंतरराष्ट्रीय संरक्षण ढांचे को भी मजबूत किया गया। दुधवा और नेपाल के शुक्लाफांटा, बर्दिया तथा बांके जैसे क्षेत्र एक ही व्यापक तराई भू-दृश्य का हिस्सा हैं। इसलिए दोनों देशों के कैमरा ट्रैप और उपस्थिति संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान इस प्रजाति की वास्तविक स्थिति समझने में उपयोगी हो सकता है।

1905 में खीरी के वन्यजीवों की सूची में लकड़बग्घा सिर्फ एक शब्द था। 2014 में दुधवा से मिले रिकॉर्ड ने संकेत दिया कि वह इस भू-दृश्य का हिस्सा अब भी हो सकता है।

आज सवाल इससे बड़ा है—

क्या धारीदार लकड़बग्घा अभी भी दुधवा में है?

इस सवाल का उत्तर केवल बाघों की निगरानी के लिए लगाए गए कैमरों से नहीं मिलेगा। इसके लिए धारीदार लकड़बग्घे की अपनी पारिस्थितिकी, उसकी गतिविधियों और उसके संभावित आवास को ध्यान में रखकर अलग निगरानी व्यवस्था बनानी होगी। हो सकता है दुधवा ने इस धारीदार साये को खो दिया हो। और यह भी संभव है कि वह अभी यहीं हो—जंगल की किसी सीमा पर, किसी पुराने चरागाह में, किसी नदी के ऊंचे कगार के पास या किसी गांव के बाहर—बस हमारी निगरानी की रोशनी से अब तक दूर।

दुधवा में बाघ की दहाड़ सुनाई देती है, गैंडा फिर घासभूमियों में लौट आया है और बारहसिंगा दलदली मैदानों में झुंड बनाता है। लेकिन किसी जंगल की वास्तविक जैव-विविधता केवल उन प्रजातियों से नहीं समझी जा सकती जिन्हें हम नियमित रूप से कैमरे में देखते हैं।

कभी-कभी जंगल का सबसे महत्वपूर्ण सवाल उस जानवर से जुड़ा होता है जिसकी तस्वीर हमारे पास नहीं है।

और दुधवा के लिए वह सवाल आज धारीदार लकड़बग्घे का है।