वन्य जीव एवं जैव विविधता

मधुमक्खियों का हमला: क्या वास्तव में वे आक्रामक हो रही हैं या हम उनका घर छीन रहे हैं?

मधुमक्खियां स्वभाव से आक्रामक नहीं होतीं। वे केवल आत्मरक्षा में डंक मारती हैं

Dr Rifat Hussain Raina, Preeti Choudhary, Dr. Ishfaq Majeed Shah

आज के समय में शहरों और गाँवों में मधुमक्खियों के हमले की घटनाएँ बढ़ती दिखाई दे रही हैं। समाचारों में अक्सर सुनने को मिलता है कि किसी पार्क, विद्यालय, मंदिर या सड़क पर मधुमक्खियों ने लोगों पर हमला कर दिया। अधिकांश लोग इसे मधुमक्खियों की “आक्रामक प्रवृत्ति” मानते हैं, लेकिन यदि इस समस्या की गहराई में जाएँ तो पता चलता है कि असली कारण मानव गतिविधियाँ, बढ़ता शहरीकरण और प्राकृतिक आवासों का विनाश है।

मधुमक्खियां प्रकृति की सबसे महत्वपूर्ण परागणकर्ता (पॉलिनेटर्स) हैं। विश्व की लगभग 75 प्रतिशत खाद्य फसलें किसी न किसी रूप में परागण पर निर्भर करती हैं और इसमें मधुमक्खियों की भूमिका सबसे अधिक है। फल, सब्जियां, तिलहन, मसाले तथा अनेक वनस्पतियां इनके माध्यम से ही सफलतापूर्वक फलन करती हैं। यदि मधुमक्खियां न रहें, तो जैव विविधता और खाद्य सुरक्षा दोनों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

पिछले कुछ दशकों में तीव्र शहरीकरण ने जंगलों, घासभूमियों और प्राकृतिक वनस्पतियों को तेजी से नष्ट किया है। बहुमंजिला इमारतें, सड़क निर्माण, औद्योगिक विस्तार और पेड़ों की कटाई ने मधुमक्खियों के प्राकृतिक आवासों को सीमित कर दिया है। पहले जहां मधुमक्खियां बड़े वृक्षों, चट्टानों और शांत प्राकृतिक क्षेत्रों में छत्ते बनाती थीं, वहीं अब उन्हें शहरों, मकानों और सार्वजनिक स्थानों के आसपास आश्रय लेना पड़ रहा है।

इसके अतिरिक्त कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग भी मधुमक्खियों के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। रासायनिक दवाएँ न केवल मधुमक्खियों को मारती हैं, बल्कि उनके दिशा-ज्ञान और भोजन खोजने की क्षमता को भी प्रभावित करती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण फूलों के खिलने का समय बदल रहा है, जिससे मधुमक्खियों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता। इन सभी परिस्थितियों में जब कोई व्यक्ति अनजाने में उनके छत्ते के पास पहुँचता है, तेज आवाज करता है या पत्थर मारता है, तो वे अपनी रक्षा के लिए हमला कर देती हैं।

यह समझना आवश्यक है कि मधुमक्खियां स्वभाव से आक्रामक नहीं होतीं। वे केवल आत्मरक्षा में डंक मारती हैं, क्योंकि उनका पूरा समुदाय और रानी मधुमक्खी उसी छत्ते पर निर्भर करती है। मनुष्य द्वारा उनके आवासों में लगातार हस्तक्षेप उन्हें असुरक्षित बना रहा है।

मधुमक्खियों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं। शहरों में अधिक से अधिक स्थानीय प्रजातियों के पेड़-पौधे लगाए जाने चाहिए ताकि उन्हें भोजन और आश्रय मिल सके। कीटनाशकों के उपयोग को नियंत्रित करना होगा तथा जैविक खेती को बढ़ावा देना चाहिए। विद्यालयों और समाज में मधुमक्खियों के महत्व के प्रति जागरूकता फैलाना भी आवश्यक है। यदि किसी स्थान पर मधुमक्खियों का छत्ता हो, तो उसे नष्ट करने के बजाय विशेषज्ञों की सहायता से सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

मधुमक्खियाँ केवल शहद बनाने वाली जीव नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन की आधारशिला हैं। यदि हम उनके आवासों को नष्ट करते रहेंगे, तो मानव और प्रकृति के बीच संघर्ष बढ़ता जाएगा। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम मधुमक्खियों को “खतरा” नहीं, बल्कि “प्रकृति के रक्षक” के रूप में देखें और उनके संरक्षण के लिए संवेदनशील बनें।

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आभार

(लेखिका नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज (एनएमएचएस ) तथा अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करती हैं, जिनके वित्तीय सहयोग एवं समर्थन के बिना यह अध्ययन संभव नहीं हो पाता। वह संस्थागत सहयोग एवं आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने के लिए जूलोजिकल सर्वे आफ इंडिया का भी आभार व्यक्त करती हैं)