दुनिया में शेरों की संख्या अब 25 हजार से भी कम रह गई है, अब अपने पुराने प्राकृतिक क्षेत्र के करीब छह प्रतिशत हिस्से में ही रह गए हैं शेर।
विश्व शेर दिवस पर गुजरात में एशियाई शेर संरक्षण को बढ़ावा, संख्या 891 पहुंची, 2020 से 32 प्रतिशत वृद्धि दर्ज।
बारडा वन्यजीव अभयारण्य में एशियाई शेरों की संख्या 17 हुई, प्राकृतिक प्रवास के बाद संरक्षण और पर्यटन को दिशा मिली।
गुजरात में एशियाई शेरों का प्राकृतिक आवास लगभग 35 हजार वर्ग किलोमीटर तक फैला, संरक्षण प्रयासों से लगातार बढ़ी संख्या।
हर साल 10 अगस्त को विश्व शेर दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य दुनिया भर में शेरों के संरक्षण और उनकी सुरक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करना है। दुनिया में शेरों की संख्या अब 25 हजार से भी कम रह गई है। कभी बड़े इलाकों में पाए जाने वाले ये वन्यजीव अब अपने पुराने प्राकृतिक क्षेत्र के करीब छह प्रतिशत हिस्से में ही रह गए हैं।
शेरों के संरक्षण के मामले में गुजरात का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। एशियाई शेर यानी पैंथेरा लियो आज दुनिया में केवल गुजरात के सौराष्ट्र में पाए जाते हैं। यह गुजरात के लिए न केवल पर्यावरणीय, बल्कि सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत भी है।
गुजरात में बढ़ी शेरों की संख्या
गुजरात में शेरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। साल 2020 में हुई शेरों की गणना में इनकी संख्या 674 थी। मई 2025 में हुई 16वीं शेर आबादी गणना में यह संख्या बढ़कर 891 हो गई। यानी पांच साल में शेरों की संख्या में करीब 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
आज गुजरात के सौराष्ट्र के 11 जिलों में शेर करीब 35 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से विचरण कर रहे हैं। राज्य सरकार और केंद्र सरकार के लगातार प्रयासों, बेहतर संरक्षण व्यवस्था और स्थानीय लोगों के सहयोग से शेरों की संख्या में यह वृद्धि संभव हुई है।
सरकार की ओर से ‘प्रोजेक्ट लायन’ के तहत शेरों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक आवास को मजबूत करने पर लगातार काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य शेरों की संख्या बढ़ाने के साथ उनके लिए सुरक्षित और बेहतर प्राकृतिक वातावरण तैयार करना है।
बारडा बना शेरों का दूसरा घर
पोरबंदर और देवभूमि द्वारका जिलों में स्थित बारडा वन्यजीव अभयारण्य शेरों के लिए एक नए सुरक्षित क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। 192.31 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अभयारण्य में वर्ष 2023 में शेर प्राकृतिक रूप से पहुंचे थे।
इसके बाद यहां शेरों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है। इनमें छह वयस्क शेर और 11 शावक शामिल हैं। बारडा क्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है और एशियाई शेरों के संरक्षण में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।
द्वारका-पोरबंदर-सोमनाथ पर्यटन सर्किट के नजदीक होने के कारण बारडा में पर्यटन की भी बड़ी संभावनाएं हैं। यहां करीब 248 हेक्टेयर क्षेत्र में सफारी पार्क विकसित करने की योजना है। इसके लिए राज्य सरकार ने जमीन भी आवंटित कर दी है। कार्यक्रम के दौरान करीब 180 करोड़ रुपये के वन्यजीव संरक्षण कार्य भी शुरू किए जाएंगे।
कभी बहुत बड़े इलाके में थे शेर
भारत में शेर हजारों साल पहले पहुंचे थे। प्राचीन काल से लेकर मुगल काल तक भारतीय कला, संस्कृति और शिकार के इतिहास में शेरों का उल्लेख मिलता है। 19वीं सदी के मध्य तक भारत के कई हिस्सों में शेर बड़ी संख्या में पाए जाते थे। इनमें गंगा के मैदानी क्षेत्र, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और मध्य भारत के कुछ हिस्से शामिल थे।
समय के साथ शिकार और प्राकृतिक आवास में कमी के कारण शेरों की संख्या तेजी से घटने लगी। भारत के बाहर ईरान और इराक के कुछ क्षेत्रों में भी शेर पाए जाते थे, लेकिन वहां भी उनकी संख्या धीरे-धीरे समाप्त हो गई।
संरक्षण से बदली तस्वीर
आजादी के बाद भारत में शेरों के संरक्षण के लिए कड़े कदम उठाए गए। गिर क्षेत्र को 1965 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया और शेरों के शिकार पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। बेहतर प्रबंधन और संरक्षण के कारण शेरों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
1968 में गिर क्षेत्र में शेरों की संख्या केवल 177 थी। इसके बाद यह संख्या लगातार बढ़ी और साल 2025 में 891 तक पहुंच गई। यह वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों की बड़ी सफलता मानी जाती है।
इंसानों और शेरों का साथ जरूरी
शेरों की बढ़ती संख्या के साथ इंसानों और शेरों के बीच सह-अस्तित्व भी बड़ी चुनौती है। संरक्षित क्षेत्रों के बाहर शेर कभी-कभी पशुओं का शिकार करते हैं और बहुत कम मामलों में इंसानों पर भी हमला होता है। इसके जवाब में कई जगह शेरों को जहर देने, गोली मारने या भाले से हमला करने जैसी घटनाएं सामने आती हैं।
ऐसे में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बहुत जरूरी है। विश्व शेर दिवस इसी संदेश को मजबूत करता है कि शेरों को बचाने के साथ लोगों की सुरक्षा और उनकी आजीविका का भी ध्यान रखा जाए। गुजरात में बढ़ती शेरों की संख्या इस बात का उदाहरण है कि सरकार, वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर काम करें तो वन्यजीव संरक्षण में बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।
संदर्भ
संसदीय प्रश्न:- बाघों, हाथियों और शेरों की जनगणना
विश्व शेर दिवस, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय