1970 से लेकर 2017 के बीच इन विदेशी आक्रामक प्रजातियों ने करीब 94,58,956 करोड़ रुपए (128,800 करोड़ डॉलर) का नुकसान पहुंचाया है। हालांकि यह नुकसान बहुत बड़ा है, इसके बावजूद वैज्ञानिकों का मानना है कि पूरी जानकारी प्राप्त न होने के कारण यह आंकलन पूरा नहीं है और नुकसान इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। उनका अनुमान है कि यह नुकसान इससे करीब 10 गुना तक ज्यादा हो सकता है।
शोध के अनुसार यह विदेशी आक्रामक प्रजातियां न केवल पर्यवरण और जैवविविधता बल्कि कृषि, पर्यटन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन चुकी हैं। यदि इससे होने वाले वार्षिक नुकसान को देखें तो वो करीब 196,816 करोड़ रुपए (2,680 करोड़ डॉलर) है। इसमें कमी आने की जगह यह हर दशक तीन गुना हो जाता है।
अकेले 2017 में इसके कारण 11.95 लाख करोड़ रुपए (16,270 करोड़ डॉलर) का नुकसान हुआ था। जोकि उस वर्ष डब्ल्यूएचओ और संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के संयुक्त बजट से भी ज्यादा था। शोधकर्ताओं के अनुसार इन प्रजातियों से होने वाला नुकसान इनके आक्रमणों को रोकने या उनसे निपटने के लिए खर्च किए जा रहे धन की तुलना में 10 गुना से भी ज्यादा है। यह जानकारी हाल ही में जर्नल नेचर में प्रकाशित शोध में सामने आई है।
मच्छर है सबसे ज्यादा नुकसान की वजह
मच्छर, चूहे, रैगवीड और दीमक उन प्रजातियों में से हैं, जिन्होंने वैश्विक व्यापार मार्गों पर यात्रा की है। जिनसे फसलों और इमारतों को नुकसान पहुंचता है और बीमारी फैलती है। शोध के अनुसार मच्छरों से सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है। एडीज जीन वाले मच्छरों से जीका, डेंगू, पीला बुखार और अन्य वायरस फ़ैल सकते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं। काले चूहे, ग्रे गिलहरी, कॉयपु और घरों में मिलने वाले चूहे जैसी प्रजातियां भी मानव स्वास्थ्य, फसलों, खाद्य भंडार और देशी वन्यजीवों को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं।
दुनिया भर में इन विदेशी आक्रमण से अमेरिका, भारत, चीन और ब्राज़ील को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। साथ ही कई अन्य देशों में भी यह प्रजातियां नुकसान पहुंचा रही हैं। कई देशों में तो इससे जुड़े आंकड़ें भी उपलब्ध नहीं है यही वजह है कि वास्तविक नुकसान और स्थिति का ठीक-ठीक पता नहीं चल पाता है। भारत पर भी इन आक्रामक प्रजातियों ने व्यापक असर डाला है। उदाहरण के लिए 2016 में अफ्रीका से फैले आर्मी वार्म ने भारत सहित दुनिया के कई देशों पर कहर ढाया था। इसी तरह अफ्रीका से फैले टिड्डियों ने भारत पर व्यापक असर डाला है, जिसके चलते पिछले 2 वर्षों में करीब 2 लाख हेक्टेयर फसल नष्ट हो चुकी है। यही नहीं यह प्रजातियां, जैवविविधता के विलुप्त होने का भी दूसरा प्रमुख कारण है। इसके बावजूद नीति-निर्माता और आम जनता अभी भी इस मुद्दे से काफी हद तक अनजान हैं।
कौन है इस समस्या की असली जड़
हमारे पारिस्थितिक तंत्र में पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों की कई प्रजातियां विकसित हुई हैं जो प्राकृतिक बाधाओं से अलग होकर अलगाव में विकसित हुई हैं। हम मनुष्यों ने उन्हें जाने या अनजाने में नए ठिकानों पर जाने के लिए मजबूर कर दिया है। जिसका परिणाम यह विदेशी आक्रामक प्रजातियां हैं। जब यह नए वातावरण में आई तो इन्होने क्रूरता के साथ अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयास किया है। जिसने इन्हें खलनायक बना दिया है। बढ़ते व्यापार और परिवहन जैसे कि शिपिंग और हवाई यात्रा ने इन प्रजातियों को अपनी प्राकृतिक सीमाओं से परे नए क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की अनुमति दी है।
आज इन एलियन प्रजातियों को ऐसी पहचान मिल चुकी है कि वो सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरण के नुकसान का कारण बनती हैं। पर इन सबके बीच हमें यह बात समझनी होगी कि इन प्रजातियों को एलियन बनने में हमारी भूमिका भी है और ऐसे में हमारी जिम्मेवारी भी बढ़ जाती है। फिर यह सवाल उठ खड़ा होता है कि प्रकृति में वास्तविक खलनायक कौन है यह एलियन प्रजातियां या इनको एलियन बनाने वाले हम इंसान।
1 डॉलर = 73.44 रुपए