भारत में 3,682 जंगली बाघ मौजूद हैं, जो वैश्विक बाघ आबादी का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा माना जाता है।
देश में 58 बाघ अभयारण्य स्थापित हैं, जो 18 राज्यों में लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं।
भारत में दुनिया के करीब 70 प्रतिशत जंगली बाघ पाए जाते हैं, जिससे देश वैश्विक संरक्षण में अग्रणी बना है।
2022 बाघ गणना में 20 राज्यों का सर्वेक्षण हुआ, जिसमें 6.41 लाख किलोमीटर क्षेत्र का अध्ययन किया गया।
प्रोजेक्ट टाइगर वर्ष 1973 में शुरू हुआ, जिसने पांच दशकों में बाघ संरक्षण में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है।
हर साल 29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में बाघों की सुरक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना और उनके प्राकृतिक आवासों को बचाने के प्रयासों को बढ़ावा देना है। बाघ हमारी प्रकृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह जंगलों के संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
भारत ने बाघ संरक्षण के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है। आज भारत में दुनिया की सबसे अधिक जंगली बाघ आबादी पाई जाती है। दुनिया के करीब 70 प्रतिशत बाघ भारत के जंगलों में रहते हैं। यह उपलब्धि नीतियों, वैज्ञानिक प्रयासों और आम लोगों की भागीदारी का परिणाम है।
बाघ भारत की पहचान का हिस्सा
बाघ का भारत से रिश्ता बहुत पुराना है। प्राचीन समय से ही बाघ को शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता रहा है। पुराने सिक्कों, राजसी मुहरों और मंदिरों की कलाकृतियों में बाघ की छवि देखने को मिलती है।
भारत सरकार ने साल 1972 में रॉयल बंगाल टाइगर को देश का राष्ट्रीय पशु घोषित किया। आज बाघ भारत की समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है। देश के अलग-अलग हिस्सों में फैले जंगलों में बाघ प्रकृति की सुंदरता और शक्ति को दर्शाता है।
जंगलों की रक्षा में बाघ की अहम भूमिका
बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं है, बल्कि जंगलों के स्वास्थ्य का संकेत भी है। यह जंगल का शीर्ष शिकारी होता है और अन्य जीवों की संख्या को संतुलित रखने में मदद करता है।
जहां बाघ सुरक्षित रहते हैं, वहां जंगल भी सुरक्षित रहते हैं। बाघों के संरक्षण से पेड़-पौधों, नदियों और कई अन्य जीव-जंतुओं की रक्षा होती है। जंगल पानी को बचाने, मिट्टी को सुरक्षित रखने और जलवायु को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को भी लाभ मिलता है।
प्रोजेक्ट टाइगर से बदली तस्वीर
भारत ने बाघों को बचाने के लिए वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया था। उस समय देश में बाघों की संख्या तेजी से घट रही थी और उनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा था।
पिछले पांच दशकों में इस अभियान ने बड़ी सफलता हासिल की है। साल 2022 की बाघ गणना के अनुसार भारत में करीब 3,682 जंगली बाघ हैं। यह संख्या दुनिया में सबसे अधिक है।
बाघों की गणना के लिए देश के 20 राज्यों में बड़े स्तर पर सर्वे किया गया। इस दौरान लाखों किलोमीटर क्षेत्र का अध्ययन किया गया। यह दुनिया के सबसे बड़े वन्यजीव सर्वेक्षणों में से एक है।
बढ़ती संख्या के साथ नई चुनौतियां
बाघों की बढ़ती संख्या भारत के लिए खुशी की बात है, लेकिन अब एक नई चुनौती भी सामने आ रही है। कई बाघ अभयारण्य अपनी क्षमता के करीब पहुंच चुके हैं। ऐसे में कई युवा बाघ नए इलाकों की तलाश में जंगलों से बाहर निकल रहे हैं।
कई बार बाघों का रास्ता सड़क, रेलवे लाइन, खेत और गांवों से होकर गुजरता है। इससे इंसानों और बाघों के बीच संघर्ष की स्थिति बन सकती है। इस समस्या से निपटने के लिए बाघों के सुरक्षित आवागमन के रास्तों यानी वन्यजीव गलियारों को बचाना जरूरी है।
बाघों के लिए जरूरी हैं कॉरिडोर
युवा बाघ अपने नए क्षेत्र की तलाश में लंबी दूरी तय करते हैं। इससे बाघों की आबादी स्वस्थ बनी रहती है और उनकी प्रजाति मजबूत होती है। लेकिन इसके लिए उन्हें सुरक्षित रास्तों की जरूरत होती है।
वन्यजीव गलियारे बाघों को एक जंगल से दूसरे जंगल तक पहुंचने में मदद करते हैं। इनकी सुरक्षा से बाघों को सुरक्षित स्थान मिलते हैं और मानव-बाघ संघर्ष को कम किया जा सकता है।
भारत बना दुनिया के लिए उदाहरण
भारत ने बाघ संरक्षण में दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश किया है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की साल 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्ट टाइगर के तहत भारत में 18 बाघ वाले राज्यों में 58 बाघ अभयारण्यों का नेटवर्क स्थापित किया गया है।
ये अभयारण्य लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं, जो भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 2.56 प्रतिशत है। प्रोजेक्ट टाइगर आज भी भारत के वन्यजीव संरक्षण अभियानों की प्रमुख आधारशिला है और बाघों तथा उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
भारत कई देशों के साथ मिलकर भी वन्यजीव संरक्षण के लिए काम कर रहा है। नेपाल, भूटान, रूस, म्यांमार और अन्य देशों के साथ सहयोग से बाघों और उनके आवासों की सुरक्षा को मजबूत किया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस हमें यह संदेश देता है कि बाघों की रक्षा करना केवल एक जानवर को बचाना नहीं है, बल्कि पूरी प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है।