भारत मौसम विभाग के दीर्घावधि पूर्वानुमान के अनुसार 2026 का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से कम रह सकता है
इससे खरीफ फसल पर निर्भर लगभग 60 फीसदी किसानों के लिए संकट गहराने की आशंका है।
अल नीनो जैसी स्थितियां, अधिकांश क्षेत्रों में संभावित वर्षा कमी और पहले से ओलावृष्टि-बाढ़ से प्रभावित इलाकों के कारण कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दोहरा दबाव बन सकता है।
भारत के मौसम विज्ञान विभाग ने 13 अप्रैल 2026 को जारी पहले दीर्घावधि पूर्वानुमान के में कहा है कि साल 2026 का मॉनसून सामान्य से कम या कमजोर रह सकता है।
इस अनुमान का प्रमुख कारण भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में मॉनसून के दूसरे हिस्से तक अल-नीनो जैसी परिस्थितियों के बनने की आशंका है।
यह स्थिति देश के लगभग 60 प्रतिशत किसानों के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकती है, जो खरीफ फसल के लिए पूरी तरह मॉनसूनी वर्षा पर निर्भर रहते हैं। कई क्षेत्रों के लिए यह दोहरी मार जैसी स्थिति है, क्योंकि वे पहले ही 2026 के प्री-मानसून मौसम में ओलावृष्टि और बाढ़ के कारण नुकसान झेल चुके हैं।
मॉनसून जिसे दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कहा जाता है, तब “सामान्य से कम” माना जाता है, जब पूरे मौसम के लिए अनुमानित वर्षा देश के दीर्घावधि औसत के 90 से 95 प्रतिशत के बीच होती है। मॉनसून का यह औसत 1971 से 2020 के बीच की औसत वर्षा को दर्शाता है, जो लगभग 868.6 मिलीमीटर है।
मौसम विभाग ने अपने प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “मात्रात्मक रूप से पूरे देश में मौसमी वर्षा दीर्घकालिक औसत का लगभग 92 प्रतिशत रहने की संभावना है, जो करीब 800 मिमी होती है, जिसमें मॉडल त्रुटि ±5 प्रतिशत हो सकती है।”
दरअसल, 90 प्रतिशत से कम वर्षा (अर्थात ‘कमजोर’ या ‘डिफिशिएंट’ मॉनसून) होने की संभावना सबसे अधिक 35 प्रतिशत आंकी गई है, जबकि दीर्घकालिक (जलवायु संबंधी) औसत संभावना केवल 16 प्रतिशत होती है।
साल 2026 में दक्षिण-पश्चिम मानसून के “सामान्य से कम” (औसमत का 90-95 प्रतिशत) रहने की संभावना 31 प्रतिशत है, जबकि “सामान्य” (औसत का 96-104 प्रतिशत) वर्षा होने की संभावना 27 प्रतिशत आंकी गई है। इसके मुकाबले दीर्घकालिक औसत में सामान्य से कम वर्षा की संभावना 17 प्रतिशत और सामान्य वर्षा की संभावना 33 प्रतिशत रहती है।
वहीं, सामान्य से अधिक या अत्यधिक वर्षा होने की संभावना बहुत कम है, जो क्रमशः केवल 6 प्रतिशत और 1 प्रतिशत है।
मॉनसून के दौरान वर्षा को प्रभावित करने वाले प्रमुख जलवायु कारकों में अल नीनो दक्षिणी दोलन, भारतीय महासागर द्विध्रुव और यूरेशियाई क्षेत्र में हिमावरण शामिल हैं।
फिलहाल भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में कमजोर अल नीनो स्थितियां बनी हुई हैं। मौसम विभाग का अनुमान है कि यह स्थिति जल्द ही इनसो-न्यूट्रल अवस्था में बदल सकती है और अप्रैल से जून के बीच बनी रह सकती है।
मौसम विभाग को यह भी उम्मीद है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से अधिक गर्म अल-नीनो परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं। आम तौर पर अल नीनो के दौरान मानसूनी वर्षा में कमी देखी जाती है, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ एल नीनो वर्षों में सामान्य या उससे अधिक वर्षा भी दर्ज की गई है।
मौसम विभाग द्वारा जारी दक्षिण-पश्चिम मानसून के वर्षा पूर्वानुमान मानचित्र आगामी फसल सीजन के लिए चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। इसमें दिखाया गया है कि देश के अत्यंत उत्तर, अत्यंत पश्चिम, पूर्वोत्तर और दक्षिणी प्रायद्वीप के उत्तरी हिस्सों को छोड़कर बाकी अधिकांश क्षेत्रों में कम वर्षा (डिफिसिट) होने की आशंका है।
भारतीय महासागर द्विध्रुव एक जलवायु घटना है, जो हिंद महासागर में होती है और मॉनसून वर्षा को प्रभावित करती है। इसके सकारात्मक (पॉजिटिव) चरण में हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से सामान्य से अधिक गर्म और पूर्वी हिस्से सामान्य से ठंडे होते हैं, जबकि नकारात्मक (नेगेटिव) चरण में स्थिति इसके विपरीत होती है।
सामान्यतः आईओडी का सकारात्मक चरण अच्छे मॉनसून का समर्थन करता है, जबकि नकारात्मक चरण मानसूनी वर्षा को कम करता है। मौसम विभाग के अनुसार, वर्तमान में हिंद महासागर में आईओडी की न्यूट्रल स्थिति बनी हुई है और दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के अंत तक इसके सकारात्मक चरण में विकसित होने की संभावना है।
दक्षिण-पश्चिम मॉनसून का तीसरा प्रमुख कारक उत्तरी गोलार्ध, विशेषकर यूरेशियाई क्षेत्र में बर्फ का आवरण है। मौसम विभाग के अनुसार, जनवरी से मार्च 2026 के बीच उत्तरी गोलार्ध में बर्फ का विस्तार सामान्य से थोड़ा कम रहा है। विभाग के मुताबिक, जब यूरेशिया सहित उत्तरी गोलार्ध में बर्फ का आवरण सामान्य से कम होता है, तो दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अच्छी वर्षा की संभावना बढ़ जाती है।
मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र और केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम रविचंद्रन ने मौसम भवन में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों से कहा कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के अंतिम चरण में भारतीय महासागर द्विध्रुव के सकारात्मक चरण के विकसित होने और उत्तरी गोलार्ध में सामान्य से कम बर्फ आवरण की स्थिति, अल नीनो के कुछ प्रभावों को कम कर सकती है।
वहीं, जलवायु वैज्ञानिक और मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व महानिदेशक केजे रमेश ने डाउन टू अर्थ से बातचीत में कहा, “हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि मॉनसून वर्षा को प्रभावित करने वाला एक और बड़ा कारक ग्लोबल वार्मिंग भी है। वर्ष 2000 के बाद से हम मॉनसून में अतिरिक्त नमी जुड़ते हुए देख रहे हैं और यह संचित नमी कहीं न कहीं वर्षा के रूप में सामने आती है, जैसा कि पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में देखा गया है।”