केरल पहुंचा दक्षिण-पश्चिम मानसून, आईएमडी ने की घोषणा, तीन दिन की देरी के बाद देश में वर्षा ऋतु की शुरुआत।
मौसम विभाग के अनुसार इस साल मानसून के दौरान देश में औसत से कम, लगभग 90 प्रतिशत बारिश संभव।
मानसून केरल, लक्षद्वीप, तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ हिस्सों तक पहुंचा, आगे तेजी से बढ़ने की संभावना।
एल नीनो के प्रभाव से मानसून प्रभावित हो सकता है, सितंबर तक इसके मजबूत होने की आशंका जताई गई।
कृषि और जल संसाधनों के लिए अहम मानसून पर देशभर की नजर, अच्छी बारिश से किसानों को राहत मिलेगी।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून ने आज, चार जून, 2026 को केरल में दस्तक दे दी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग(आईएमडी) ने इसकी आधिकारिक घोषणा की। आमतौर पर मानसून हर साल एक जून के आसपास केरल पहुंच जाता है, लेकिन इस बार यह लगभग तीन दिन की देरी से आया है। मानसून के आगमन के साथ ही देश में चार महीने तक चलने वाले वर्षा ऋतु की शुरुआत हो गई है।
मौसम विभाग के मुताबिक, मानसून अब केरल और माहे के अलावा लक्षद्वीप, अरब सागर के कुछ हिस्सों, तमिलनाडु, कर्नाटक और बंगाल की खाड़ी के कई क्षेत्रों तक भी आगे बढ़ चुका है। आने वाले दिनों में इसके और आगे बढ़ने की संभावना है।
खेती और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण
भारत की खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। देश के कई हिस्सों में किसान मानसून की बारिश का इंतजार करते हैं ताकि वे खरीफ फसलों की बुवाई शुरू कर सकें। धान, मक्का, कपास और सोयाबीन जैसी फसलें मुख्य रूप से मानसून की बारिश पर निर्भर रहती हैं।
मानसून केवल खेती ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। अच्छी बारिश होने से जलाशयों में पानी भरता है, भूजल स्तर बढ़ता है और बिजली उत्पादन में भी मदद मिलती है। वहीं कम बारिश होने पर कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है और कई क्षेत्रों में पानी की कमी की समस्या पैदा हो सकती है।
सामान्य से कम रह सकती है बारिश
मौसम विभाग ने इस साल देश में कुल बारिश सामान्य से थोड़ी कम रहने का अनुमान जताया है। आईएमडी के अनुसार इस साल मानसून के दौरान पूरे देश में वर्षा दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का लगभग 90 प्रतिशत रहने की संभावना है।
एलपीए का मतलब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक दर्ज की गई औसत बारिश से होता है। भारत के लिए 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर मानसून की औसत वर्षा 87 सेंटीमीटर मानी जाती है। इसी को देश का दीर्घकालिक औसत कहा जाता है।
यदि किसी वर्ष मानसून के दौरान वर्षा एलपीए के 90 प्रतिशत से कम होती है, तो उसे "कम वर्षा" या "डिफिशिएंट" श्रेणी में रखा जाता है। इसलिए इस साल का अनुमान मौसम विशेषज्ञों की नजर में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एल नीनो बन सकता है चिंता का कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल बारिश सामान्य से कम रहने की एक बड़ी वजह एल नीनो की स्थिति हो सकती है। एल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जो प्रशांत महासागर के पानी के तापमान में बदलाव के कारण पैदा होती है।
जब एल नीनो सक्रिय होता है, तब भारत में मानसून की बारिश पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अतीत में भी कई बार एल नीनो के दौरान देश में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है।
मौसम विभाग के मुताबिक, जून महीने में एल नीनो की स्थिति कमजोर रह सकती है, लेकिन सितंबर तक इसके मध्यम या मजबूत होने की संभावना है। यदि ऐसा होता है तो मानसून के अंतिम चरण में वर्षा प्रभावित हो सकती है।
आगे क्या है उम्मीद
मौसम विभाग का कहना है कि मानसून धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों में भी आगे बढ़ेगा। अगले कुछ सप्ताह किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और आम लोगों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि मानसून पूरे मौसम में कितना सक्रिय रहता है और कितनी बारिश होती है।
फिलहाल केरल में मानसून के पहुंचने के साथ ही देश में वर्षा ऋतु का औपचारिक आगाज हो चुका है। आने वाले महीनों में मानसून का प्रदर्शन कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालेगा। इसलिए इस वर्ष के मानसून पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।