बरसात का मौसम है। झारखंड का एक किसान धान की रोपनी में जुटा है। कई दिनों की झुलसाती गर्मी के बाद सुबह हल्की बारिश की संभावना ने उसके चेहरे पर उम्मीद लौटा दी थी। खेत धान की रोपनी के लिए तैयार है, दोपहर तक देखते-ही-देखते बादल घिर आते हैं।
फिर एक तेज चमक, कानों को चीरती गड़गड़ाहट और अगले ही पल आकाशीय बिजली खेत में काम कर रहे किसान को अपनी चपेट में ले लेती है। शाम तक यह घटना एक छोटी-सी खबर बन जाती है- 'बिजली गिरने से किसान की मौत'।
परिवार शोक में डूब जाता है, गाँव कुछ दिन चर्चा करता है और फिर जीवन अपनी रफ्तार पकड़ लेता है। लेकिन एक सवाल लगभग हर बार छूट जाता है, ऐसी मौतें हर मानसून में बार-बार उन्हीं इलाकों में क्यों होती हैं? बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से ही बार-बार इस त्रासदी का सबसे बड़ा बोझ क्यों उठाते हैं?
भारत में प्राकृतिक आपदाओं की चर्चा होती है तो बाढ़, चक्रवात, सूखा और अब लू (हीटवेव) सबसे पहले याद आते हैं। लेकिन इन्हीं के बीच एक ऐसी आपदा है, जो हर साल हजारों परिवारों की दुनिया उजाड़ देती है और फिर भी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा नहीं बन पाती। वह है आकाशीय बिजली।
आकाशीय बिजली को अब भी हम प्रकृति का अचानक बरपा कहर मानकर आगे बढ़ जाते हैं। जबकि सच यह है कि यह केवल मौसम की घटना नहीं रह गई है। इसके पीछे बदलती जलवायु, खेती-किसानी का स्वरूप, ग्रामीण आजीविका, सामाजिक असमानता और हमारी आपदा-प्रबंधन व्यवस्था, सभी एक साथ काम कर रहे हैं। इसलिए आकाशीय बिजली को केवल प्राकृतिक दुर्घटना की तरह नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूलन और जलवायु न्याय की कसौटी पर भी समझने की ज़रूरत है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के पिछले दो दशक के आँकड़ों बताते हैं कि देश में मौसम संबंधी आपदाओं से होने वाली लगभग 46 प्रतिशत मौतें केवल आकाशीय बिजली से होती हैं। यह किसी भी अन्य मौसमीय आपदा की तुलना में कहीं अधिक गंभीर तस्वीर प्रस्तुत करता है। चिंता की बात केवल मौतों की संख्या नहीं है, बल्कि उनका भौगोलिक विस्तार भी है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, भारतीय मौसम विभाग और विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के कुछ राज्य इस त्रासदी का सबसे बड़ा बोझ उठा रहे हैं। यह संयोग नहीं है कि हर मानसून के दौरान इन्हीं राज्यों से किसानों, खेतिहर मजदूरों, मछुआरों और ग्रामीण समुदायों की बिजली गिरने से मौत की खबरें सबसे अधिक आती हैं।
विडम्बना यह है कि यह सब उस समय हो रहा है, जब भारत मौसम पूर्वानुमान की तकनीक में उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है। डॉप्लर वेदर रडार, उपग्रह आधारित निगरानी, बिजली पहचान नेटवर्क और 'दामिनी' जैसे मोबाइल एप ने पूर्वानुमान की क्षमता को पहले से कहीं अधिक मजबूत बनाया है। फिर भी मौतें कम नहीं हो रहीं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि समस्या अब केवल मौसम विज्ञान की नहीं, बल्कि विज्ञान को समाज तक पहुँचाने की विफलता है।
आज भी आकाशीय बिजली को अक्सर 'प्राकृतिक प्रकोप' या 'ईश्वर की मर्जी' मानकर भुला दिया जाता है। यही सोच इसे एक 'अदृश्य आपदा' बना देती है ऐसी आपदा जो मृत्यु तो बहुत देती है, लेकिन नीति, तैयारी और सार्वजनिक चर्चा में उसका स्थान बेहद सीमित है।
पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत को देश के प्रमुख 'लाइटनिंग हॉटस्पॉट' के रूप में चिन्हित किया है। एक अध्ययन के अनुसार, 2010–2019 के दौरान देश में आकाशीय बिजली से हुई कुल मौतों में लगभग 52 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत की रही। इसके पीछे केवल एक कारण नहीं, बल्कि कई प्रक्रियाएँ एक साथ काम करती हैं।
गर्मियों के अंत और मानसून से पहले पूर्वी भारत की धरती तेजी से गर्म होती है। दूसरी ओर, बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवाएँ वातावरण में भारी मात्रा में नमी भर देती हैं। जब गर्म हवा ऊपर उठती है और यह नमी उससे मिलती है, तो वातावरण में अस्थिरता बढ़ती है।
मौसम वैज्ञानिक इसे कन्वेक्टिव अवेलेबल पोटेंशियल एनर्जी के रूप में मापते हैं, जिसका स्तर पूर्वी भारत में प्री-मानसून के दौरान देश के अनेक हिस्सों की तुलना में अधिक पाया गया है, जिससे तीव्र संवहनीय/कन्वेक्टिव बादल और बार-बार बिजली गिरने की स्थितियाँ बनती हैं।
लेकिन विज्ञान कहानी का केवल आधा हिस्सा है। दूसरा आधा हिस्सा खेतों में लिखा जाता है। यही वह समय होता है जब धान की रोपनी शुरू होती है। लाखों किसान, खेतिहर मजदूर, पशुपालक और मछुआरे दिनभर खुले आसमान के नीचे काम कर रहे होते हैं।
उनके लिए काले बादल देखते ही खेत छोड़ देना हमेशा संभव नहीं होता, क्योंकि रोपनी का समय कुछ दिनों का ही होता है और उसी पर पूरे वर्ष की खेती निर्भर करती है। इस प्रकार सबसे अधिक बिजली गिरने का मौसम और सबसे अधिक खुले में काम करने का मौसम एक-दूसरे पर आकर टिक जाते हैं।
यहीं यह समस्या मौसम विज्ञान और आपदा से आगे बढ़कर जलवायु न्याय का सवाल बन जाती है। जिन समुदायों का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन में योगदान सबसे कम है, वही बदलती जलवायु के बढ़ते जोखिमों का सबसे अधिक सामना कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन आंधी-तूफानों की तीव्रता और आवृत्ति को बढ़ा रहा है, लेकिन यह सामाजिक और आर्थिक असमानता है जो तय करती है कि अंततः जान किसकी जाएगी। पूर्वी भारत की बिजली त्रासदी को समझने के लिए बादलों के साथ-साथ खेतों, आजीविका और गरीबी को भी पढ़ना होगा।
आकाशीय बिजली के मामले में भारत की सबसे बड़ी समस्या अब मौसम का अनुमान लगाना नहीं, बल्कि उस अनुमान को समय रहते लोगों तक पहुँचाना है। भारतीय मौसम विभाग ने विभिन्न प्लेटफॉर्म के माध्यम से चेतावनी व्यवस्था को काफी मजबूत किया है। फिर भी हर मानसून में बड़ी संख्या में किसान, मछुआरे और ग्रामीण मजदूर इसकी चपेट में आते हैं।
पूर्वी भारत के ग्रामीण समाज ने वर्षों से बादलों की चाल, हवा की दिशा, उमस और पक्षियों के व्यवहार से मौसम के छोटे-छोटे संकेतों को पढ़ते और आने वाले आपदा का अनुमान लगाते आये है।
बदलती जलवायु ने इन संकेतों की विश्वसनीयता भले घटाई हो, लेकिन समुदायों का भरोसा आज भी उन पर कायम है। यही कारण है कि वैज्ञानिक पूर्वानुमान और स्थानीय अनुभव को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि सहयोगी बनाया जाना चाहिए।
जब मौसम विज्ञान विभाग की चेतावनी पंचायतों, विद्यालयों, किसान उत्पादक संगठनों, कृषि मित्रों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय स्वयंसेवकों के माध्यम से लोगों तक पहुँचती है, तब उसके पालन की संभावना कहीं अधिक बढ़ जाती है।
पूर्वी राज्यों के कुछ जिलों में सामुदायिक जागरूकता अभियानों तथा 'लाइटनिंग रेजिलिएंट विलेज' जैसी पहलों ने यह दिखाया है कि समय पर सूचना, सुरक्षित आश्रय और नियमित जन-जागरूकता से अनेक जानें बचाई जा सकती हैं। समाधान किसी एक नई तकनीक में नहीं, बल्कि विज्ञान, स्थानीय शासन और समुदाय के बीच भरोसे का पुल बनाने में है।
आकाशीय बिजली की एक चमक कुछ क्षणों की होती है, लेकिन उसके परिणाम एक परिवार की पूरी दुनिया बदल देते हैं। जिस किसान से इस लेख की शुरुआत हुई थी, वह किसी आंकड़े का हिस्सा नहीं, बल्कि उस भारत का चेहरा है जिसकी आजीविका अब भी खुले आसमान पर निर्भर है।
यदि हमारी वैज्ञानिक प्रगति समय रहते उसके खेत तक नहीं पहुँचती, तो सबसे बड़ी विफलता मौसम की नहीं, हमारी नीतियों की होगी। बदलती जलवायु के इस दौर में आकाशीय बिजली को नियति नहीं, बल्कि रोकी जा सकने वाली आपदा के रूप में स्वीकार करना होगा। यही स्वीकारोक्ति विज्ञान को समाज से और नीति को जीवन से जोड़ने की पहली शर्त है।