भीषण सर्दी में आग के सामने बैठ अपने आप को गर्म रखने का प्रयास करते स्थानीय; फोटो: आईस्टॉक 
मौसम

सूनी फरवरी, समय से पहले विदाई, क्या भारत में बदल रही है सर्दियों की तस्वीर?

असमय दस्तक और असमय विदाई के साथ आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि भारत की सर्दियों के मिजाज में बड़ा बदलाव आ रहा है।

Kiran Pandey

  • जनवरी 2026 में जहां देशभर में शीतलहर/कोल्ड डे के 24 दिन दर्ज हुए, वहीं फरवरी पूरी तरह ‘सूनी’ रही—पिछले पांच वर्षों में पहली बार।

  • डीटीई के विश्लेषण से पता चलता है कि शीतलहर अब केवल पारंपरिक सर्दी के महीनों तक सीमित नहीं रही।

  • 2025 में नवंबर में ही असामान्य रूप से ठंड की दस्तक और पोस्ट-मानसून सीजन में रिकॉर्ड 49 शीतलहर दिनों का उछाल यह संकेत देता है कि ठंड का समय और भूगोल दोनों बदल रहे हैं।

  • कभी उत्तर भारत तक सीमित रहने वाली शीतलहर अब अलग-अलग वर्षों में अपना दायरा बढ़ा और सिमटा रही है।

  • 2026 की ‘सूनी’ फरवरी और 2025 की असमय ठंड यह सवाल खड़ा करती है कि क्या यह सिर्फ मौसमी उतार-चढ़ाव है या भारत की सर्दियों के मिजाज में स्थायी बदलाव का संकेत।

  • बदलते तापमान, संभावित अल नीनो और घटती ठंड का असर कृषि, खासकर गेहूं जैसी रबी फसलों, पर भी पड़ सकता है—जिससे यह बदलाव सिर्फ मौसम की नहीं, बल्कि भविष्य की कहानी बन जाता है।

भारत में शीतलहर की तस्वीर बदल रही है। वे अब केवल जनवरी से फरवरी के बीच सर्दी के पारम्परिक महीनों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उनका समय और भौगोलिक प्रसार दोनों बदलते दिख रहे हैं।

डाउन टू अर्थ (डीटीई) के विश्लेषण के अनुसार जनवरी 2026 में देशभर में शीतलहर/कोल्ड डे की कुल 24 घटनाएं दर्ज की गई, जबकि फरवरी 2026 में एक भी दिन ऐसी परिस्थितियां नहीं दर्ज की गई। 28 फरवरी को सर्दी का आधिकारिक समापन होने के साथ यह संख्या बढ़ने की आशंका नहीं है, खासकर तब जब भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान के सामान्य से 2–4 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने का अनुमान जताया है।

पांच वर्षों में पहली बार ‘सूनी’ रही फरवरी

जनवरी 25 को पूर्वी और पश्चिमी राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के कुछ हिस्सों में शीतलहर से गंभीर शीतलहर की स्थिति आखिरी बार देखी गई। हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में 27 जनवरी तक कोल्ड डे की स्थिति बनी रही, जिसके बाद देशभर में सर्दी की चुभन कम होती गई।

डाउन टू अर्थ द्वारा 2022 से 2025 के बीच शीतलहर और कड़ाके की ठंड वाले दिनों के विश्लेषण में सामने आया है कि फरवरी 2026 में शीतलहर का पूरी तरह गायब रहना हाल के वर्षों के रुझान से साफ तौर पर पूरी तरह अलग है।

2022 से 2025 के बीच हर साल फरवरी के महीने में शीतलहर दर्ज हुई। इस दौरान जहां 2022 में 6 दिन, 2023 में एक दिन, 2024 में 7 दिन और 2025 में 5 दिन शीतलहर की घटनाएं दर्ज की गई। लेकिन इस साल 27 जनवरी को आखिरी बार शीतलहर या कड़ाके की ठंड दर्ज की गई थी।

इसके बाद फरवरी 2026 में एक भी दिन शीतलहर या कोल्ड डे दर्ज नहीं हुआ। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) और डीटीई डेटा सेंटर द्वारा तैयार इंडियाज एटलस ऑन वेदर डिजास्टर्स के विश्लेषण के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में यह पहली बार है जब फरवरी महीने में शीतलहर पूरी तरह नदारद रही है।

क्या होती है ‘शीतलहर’ और ‘कोल्ड डे’?

आईएमडी के अनुसार, जब अधिकतम तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री सेल्सियस कम हो, तो उसे ‘कोल्ड डे’ कहा जाता है। वहीं तापमान में 6.4 डिग्री से अधिक गिरावट होने पर उसे ‘सीवियर कोल्ड डे’ कहा जाता है। इसी तरह न्यूनतम तापमान में इतनी ही गिरावट होने पर ‘शीतलहर’ और अधिक गिरावट पर ‘गंभीर शीतलहर’ घोषित की जाती है।

कुल मिलाकर 2026 की सर्दियों में 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शीतलहर या कड़ाके की ठंड (कोल्ड डे) के 24 दिन दर्ज किए गए। पिछले पांच वर्षों में देखें तो यह दूसरा सबसे कम आंकड़ा है। इससे पहले 2023 में इन दिनों की संख्या 21 दर्ज की गई थी। वहीं इसके उलट 2024 में ऐसे 38 दिन दर्ज हुए, जबकि 2022 में 30 दिन और 2025 में 26 दिन ऐसे रिकॉर्ड किए गए।

विश्लेषण से पता चला है कि 2022 से 2026 के बीच शीतलहर मुख्य रूप से उत्तर, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत तक सीमित रही। हालांकि सर्दियों और मानसून के बाद के मौसम में हर साल इसका असर अलग-अलग इलाकों में बदलता रहा। 2022 में सर्दियों के 59 दिनों में से 30 दिन शीतलहर दर्ज की गई। ये 14 राज्यों में देखी गईं, जबकि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व भारत में इसका कोई असर नहीं पड़ा।

2023 में शीतलहर का दायरा बढ़कर 17 राज्यों तक पहुंच गया, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक था। हालांकि, शीतलहर के दिनों की संख्या घटकर 21 रह गई। इस साल दक्षिण भारत के दो राज्यों, तेलंगाना में 2 दिन और कर्नाटक में 4 दिन शीतलहर दर्ज की गई। वहीं 2024 में सर्दियों के 60 दिनों में से 38 दिन शीतलहर या कड़ाके की ठंड दर्ज हुई। लेकिन इसका असर केवल 13 राज्यों तक सीमित रहा और दक्षिण व दक्षिण-पूर्व भारत फिर इससे बाहर रहे।

वहीं 2025 में शीतलहर का दायरा और सिमटकर महज नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक सीमित रह गया। दक्षिण से केवल तेलंगाना में एक दिन शीतलहर दर्ज की गई।

हालांकि 2026 में इसका दायरा फिर बढ़कर 15 राज्यों तक पहुंच गया, जो 2023 के बाद दूसरा सबसे बड़ा फैलाव है। इस साल दक्षिण भारत में केवल कर्नाटक इससे प्रभावित रहा। यह दिखाता है कि शीतलहर का असर कभी-कभार दक्षिण तक भी पहुंच जाता है, लेकिन इसका मुख्य केंद्र अब भी उत्तर भारत ही है।

ओडिशा में भी 2026 में सात दिन शीतलहर या कड़ाके की ठंड (कोल्ड डे) का अनुभव हुआ, जो पिछले वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है।

अल नीनो का असर?

फरवरी 2026 का मौसम काफी हद तक फरवरी 2023 जैसा देखा गया, क्योंकि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो बनने की संभावना है। अमेरिकी एजेंसी एनओएए के ताजा अपडेट के मुताबिक, अभी तटस्थ (न्यूट्रल) स्थिति है, लेकिन अगस्त तक अल नीनो की स्थिति बन सकती है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि मानसून के बाद ला नीना की स्थिति दक्षिण, मध्य और पूर्व भारत में शीतलहर की वजह हो सकती है। वहीं आने वाला अल नीनो सर्दी को जल्दी खत्म कर तेज और ज्यादा गर्म गर्मी की शुरुआत का संकेत दे सकता है। ऐसे में शीतलहर या कड़ाके की ठंड के दिनों की कमी का सीधा असर रबी फसलों, खासकर गेहूं, पर पड़ सकता है।

2025 में बदला पैटर्न: नवंबर में ही शीतलहर ने दी दस्तक

विश्लेषण बताता है कि शीतलहर अब केवल जनवरी-फरवरी तक सीमित नहीं रह गई है। हालांकि आईएमडी जनवरी और फरवरी को सर्दी का मौसम मानता है, लेकिन शीतलहर आमतौर पर नवंबर से शुरू हो जाती है और दिसंबर तक जारी रहती है। ये दोनों महीने आधिकारिक तौर पर मानसून के बाद के मौसम (पोस्ट-मानसून) में आते हैं।

विश्लेषण से पता चला है कि साल भर में दर्ज होने वाली शीतलहर/कड़ाके की ठंड का बड़ा हिस्सा सर्दी के मौसम में ही होता है। उदाहरण के लिए, 2022 से 2024 के बीच साल के कुल शीतलहर दिनों में से 65 फीसदी, 72 फीसदी और 67 फीसदी सर्दी के महीनों में दर्ज किए गए। इसके मुकाबले पोस्ट-मानसून सीजन की हिस्सेदारी काफी कम रही, जो 28 से 35 फीसदी के बीच थी।

लेकिन 2025 में यह रुझान पूरी तरह बदल गया। दिसंबर 2025 तक के पोस्ट-मानसून सीजन में साल के कुल शीतलहर दिनों में से 65 फीसदी दर्ज किए गए, जबकि सर्दी के मौसम में महज 35 फीसदी दिन देखे गए।

बदलता भूगोल, बदलती सर्दी

आंकड़ों से पता चला है कि इस साल पोस्ट-मानसून सीजन में 49 शीतलहर/कड़ाके की ठंड के दिन दर्ज हुए, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा हैं और पहले के उच्चतम आंकड़े के दोगुने से भी अधिक हैं। वहीं पिछले वर्षों से तुलना करें तो 2022 में ऐसे 16 दिन, 2023 में 8 दिन और 2024 में 19 दिन दर्ज किए गए थे।

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि 2025 में यह बदलाव मुख्य रूप से नवंबर में शीतलहर के असामान्य रूप से बढ़ने के कारण हुआ। सिर्फ नवंबर में ही 20 शीतलहर दिन दर्ज किए गए, जो 2022 के बाद सबसे अधिक हैं। वहीं दूसरी तरफ नवंबर 2022 में महज दो दिन शीतलहर रही, 2023 में एक भी नहीं और 2024 में केवल 1 दिन ऐसा दर्ज किया गया, जब शीतलहर का कहर जारी था। यानी 2025 में नवंबर में शीतलहर की घटनाएं करीब दस गुना बढ़ गईं।

इतना ही नहीं, 2025 में शीतलहर पहले से भी जल्दी शुरू हो गई, 7 नवंबर से, जबकि 2022 में यह 21 नवंबर से शुरू हुई थी। पिछले वर्षों में नवंबर की शीतलहरें मुख्य रूप से महाराष्ट्र और राजस्थान तक ही सीमित थीं।

पहले नवंबर की शीतलहरें मुख्यतः महाराष्ट्र और राजस्थान तक सीमित रहती थीं, लेकिन 2025 में यह 13 राज्यों तक फैल गईं उत्तर-पश्चिम, मध्य, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत तक इनका कहर देखा गया। इस साल 13 राज्यों में शीतलहर दर्ज की गई, जिनमें उत्तर-पश्चिम के 7 राज्य, मध्य भारत के 4 राज्य, पूर्व और पूर्वोत्तर का एक राज्य और दक्षिण प्रायद्वीप का एक राज्य शामिल था। यह दिखाता है कि 2025 में शीतलहर का भौगोलिक फैलाव काफी ज्यादा बढ़ गया था।

2022 से 2026 के आंकड़े और डीटीई विश्लेषण साफ संकेत देते हैं कि शीतलहर अब अपने पारंपरिक समय और क्षेत्रीय सीमाओं में बंधी नहीं रही। कभी इसका फैलाव बढ़ता है, कभी सिमट जाता है। 2025 में नवंबर की असामान्य ठंड और 2026 की ‘सूनी’ फरवरी यह दिखाती है कि भारत में ठंड के चरम रूपों का समय और भूगोल दोनों बदल रहे हैं।

अब सवाल यह है कि क्या यह केवल अस्थाई उतार-चढ़ाव है या भारत की सर्दियों के मिजाज में स्थाई बदलाव का संकेत?

ऐसे में इन रुझानों पर लगातार नजर रखना जरूरी है, ताकि यह समझा जा सके कि यह सिर्फ कुछ वर्षों का उतार-चढ़ाव है या देश के सर्दी के मौसम में बड़े बदलाव का संकेत। इन बदलते रुझानों पर लगातार नजर रखना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि सर्दी की यह बदलती कहानी सिर्फ मौसम की नहीं, बल्कि कृषि, जलवायु और हमारे भविष्य की भी कहानी है।