मौसम विभाग ने 2026 में मानसूनी बारिश के 92 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया, जो सामान्य से कम है और चिंता बढ़ाता है। 
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2026 में मानसूनी बारिश के सामान्य से कम रहने का अंदेशा, मौसम विभाग ने जारी किया अनुमान

मौसम विभाग ने जून से सितंबर तक के दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम का पूर्वानुमान जारी किया, बारिश का असमान वितरण, यानी कहीं बहुत ज्यादा तो कहीं बहुत कम बारिश होने की आशंका है।

Dayanidhi

  • मौसम विभाग ने 2026 में मानसूनी बारिश के 92 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया, जो सामान्य से कम है और चिंता बढ़ाता है।

  • एल नीनो बनने की आशंका से मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे देश के कई हिस्सों में कम बारिश के आसार हैं।

  • असमान बारिश वितरण की आशंका, कुछ क्षेत्रों में अधिक और कुछ में बहुत कम बारिश से कृषि प्रभावित हो सकती है।

  • कम बारिश से फसल उत्पादन घटेगा, जिससे किसानों की आय कम और महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है।

  • भारत की लगभग आधी खेती बारिश पर निर्भर है, इसलिए कमजोर मानसून का असर अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने आज, 13 अप्रैल 2026 को दक्षिण-पश्चिमी मानसून का पूर्वानुमान जारी किया है। जिसमें कहा गया है कि इस साल मानसूनी बारिश के सामान्य से कम होने की आशंका है। यह खबर खेती, पशुपालन और जल संसाधनों के लिए अच्छी नहीं मानी जा सकती है। मानसूनी बारिश अर्थव्यवस्था और आम लोगों के लिए भी बहुत जरूरी है।

क्या कहता है मानसून 2026 का पूर्वानुमान?

मौसम विभाग के अनुसार, इस साल मानसून लगभग 92 प्रतिशत रहने की संभावना है। सामान्य बारिश 96 से 104 प्रतिशत के बीच मानी जाती है, इसलिए 92 प्रतिशत को “सामान्य से कम” कहा जाता है। हालांकि इस अनुमान में बारिश के पांच प्रतिशत तक ऊपर या नीचे होने की संभावना भी रहती है। यह लंबी अवधि के 1971 से 2020 तक के औसत 87 सेमी के अनुमान पर आधारित है। इसका मतलब यह है कि वास्तविक बारिश थोड़ी ज्यादा या कम भी हो सकती है। फिर भी, यह इस ओर इशारा करता है कि इस साल बारिश पूरी तरह से अच्छी नहीं होगी।

भारत में सालभर की कुल बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मानसून से आता है। यही बारिश खेतों को पानी देती है और फसलों की खेती को संभव बनाती है। देश के लगभग 45 प्रतिशत खेत अभी भी बारिश पर निर्भर हैं। यानी अगर मानसून कमजोर रहता है, तो सीधे खेती पर असर पड़ता है। इससे किसानों की आय कम हो सकती है।

एल नीनो का खतरा

विभाग के द्वारा इस साल एल नीनो बनने की आशंका भी जताई गई है। एल नीनो एक मौसम से जुड़ी घटना है, जिसमें समुद्र का तापमान बढ़ जाता है। इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। भारत में अक्सर एल नीनो के दौरान बारिश कम होती है। इतिहास बताता है कि कई बार एल नीनो के कारण कमजोर मानसून देखने को मिला है। इसलिए इस साल भी यह चिंता का कारण है।

खेती और किसानों पर असर

अगर बारिश कम होती है, तो किसान कम बोवाई करते हैं। खासकर खरीफ की फसलें जैसे धान, दालें, मक्का और सोयाबीन प्रभावित होती हैं। कम बारिश के कारण फसलें ठीक से नहीं बढ़ पातीं और उत्पादन घट जाता है। इससे किसानों की आय कम हो जाती है। जब किसानों के पास पैसा कम होता है, तो वे बाजार में कम खर्च करते हैं, जिसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

महंगाई पर प्रभाव

जब फसल उत्पादन कम होता है, तो बाजार में अनाज और सब्जियों की आपूर्ति घट जाती है। इससे कीमतें बढ़ने लगती हैं। यानी कम बारिश का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाती हैं और महंगाई बढ़ती है। यह स्थिति सरकार और आम जनता दोनों के लिए चुनौती बन जाती है।

अन्य मौसमीय प्रणालियां

हालांकि सिर्फ एल नीनो ही सब कुछ तय नहीं करता। कुछ अन्य मौसमीय प्रणालियां भी मानसून को प्रभावित करते हैं। जैसे कि हिंद महासागर में बनने वाला डिपोल और उत्तरी गोलार्ध में बर्फ की स्थिति। अगर ये कारण अनुकूल रहते हैं, तो वे एल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। इसलिए मौसम का पूरा अनुमान कई चीजों पर निर्भर करता है, और अंतिम स्थिति समय के साथ साफ होती है।

देशभर में बारिश का असमान वितरण

यह जरूरी नहीं है कि पूरे देश में एक जैसी बारिश हो। कई बार कुल बारिश ठीक होती है, लेकिन वह अलग-अलग जगहों पर असमान रूप से होती है। कहीं बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है और कहीं बहुत कम। इससे भी फसलों को नुकसान होता है। इसके अलावा अगर बारिश गलत समय पर होती है - जैसे बोवाई या कटाई के समय, तो भी फसल खराब हो सकती है।

किन क्षेत्रों में असर कम हो सकता है

मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार, देश के ज्यादातर हिस्सों में कम बारिश होने के आसार हैं। लेकिन कुछ इलाकों जैसे पूर्वोत्तर भारत, दक्षिण भारत और उत्तर-पश्चिम के कुछ हिस्सों में सामान्य या बेहतर बारिश होने की संभावना भी जताई गई है। इसका मतलब है कि पूरे देश में एक जैसी स्थिति नहीं होगी। कुछ जगहों पर स्थिति बेहतर भी रह सकती है।

मौसम विभाग ने अपने पूर्वानुमान में कहा कि जनवरी से मार्च 2026 की अवधि के दौरान उत्तरी गोलार्ध का बर्फबारी का आवरण और साथ ही यूरेशिया का बर्फ का आवरण भी सामान्य से थोड़ा ही कम दर्ज किया गया है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून के विकसित होने और मानसूनी बारिश के लिए अनुकूल है।

विभाग के लंबी अवधि वाले इस पूर्वानुमान में सूखे वाली जगहों की जानकारी नहीं दी है, लेकिन जिन राज्यों में सामान्य से कम बारिश जैसे हालात बनने की आशंका अधिक जताई गई है, उनमें उत्तर भारत के कई इलाकों, खासकर गंगा के मैदानी और आसपास के पठारी क्षेत्र शामिल हैं।

कुल मिलाकर, इस साल का मानसून थोड़ा कमजोर रहने का अंदेशा जताया गया है। यह स्थिति बहुत गंभीर नहीं है, लेकिन चिंता जरूर पैदा करती है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत की खेती और अर्थव्यवस्था अभी भी मानसून पर काफी निर्भर है। इसलिए हर साल मानसून का अनुमान बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार, किसान और आम लोगों को इस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। सही योजना और सावधानी से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।