रैका माला गांव सरिस्का टाइगर रिजर्व कोर 1 जोन में बसा है, जहां पानी समेत कोई बुनियादी सुविधा नहीं है। महिलाओं का अधिकांश समय पानी ढोने में गुजरता है (फोटो: भागीरथ / सीएसई)
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विश्व जल दिवस विशेष: एक गांव, जहां पानी ढोने में गुजर रही है महिलाओं की जिंदगी

बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे इस गांव में लोग जोहड़ों का गंदा पानी पीने को मजबूर, अन्य नागरिक सुविधाएं भी नहीं

Bhagirath

“यहां जानवर और इंसान यही पानी पीते हैं।” गांव की चार महिलाओं के साथ प्लास्टिक के डिब्बों में पतले सफेद कपड़े से छानकर जोहड़ का पानी भर रही 30 साल की सुमन गुर्जर शिकायती लहजे में कहती हैं, “भले ही यह पानी गंदा है लेकिन इसी का सहारा है। इसी पानी पर पूरे गांव का जीवन टिका है। नहाने, खाना बनाने और पीने के लिए पूरा गांव इसी पानी का इस्तेमाल करता है।”

सुमन जिस जोहड़ से पानी भर रही हैं, उसमें इकट्ठा हुआ पानी बरसात की देन है। जोहड़ के एक तरफ कंटीली झाड़ियां लगी हैं और तीन ओर से खुला है। इसके गिर्दगिर्द पशुओं का गोबर पड़ा है। पानी के हरे रंग को देखकर लगता है कि उसमें गोबर घुला है।

इसी हरे और मटमैले पानी को भरने सुमन करीब एक किलोमीटर दूर से आई हैं। एक चक्कर में वह करीब 20-30 लीटर पानी ढोती हैं और आने-जाने में उन्हें कम से कम 30-40 मिनट लग जाते हैं। एक पथरीली और ऊबड़खाबड़ पगडंडी उन्हें जोहड़ तक पहुंचाती है। एक दिन में 6-7 चक्कर उन्हें पानी ढोना पड़ता है। इस तरह दिन में लगभग चार घंटे पानी लाने में नष्ट हो जाते हैं। इस लिहाज से देखें तो एक साल में करीब 1,500 घंटे उनके पानी लाने में ही खर्च होते हैं।

अलवर जिले के कालीखोल गांव से ब्याह कर रैका माला आई सुमन को उस वक्त अंदाजा नहीं था कि यहां पानी की इतनी भीषण समस्या है। शादी के बाद उन्होंने अपने माता-पिता को ताना मरते हुए कहा भी “कहां शादी कर दी।” हालांकि कुछ समय बाद बिना शिकायत काम करते रहना और पानी ढोते रहता सुमन की आदतों में शुमार हो गया।

सुमन जैसा संघर्ष गांव की हर महिला का है। मसलन, 40 साल की उर्मिला गुर्जर के घर से जोहड़ की दूरी करीब डेढ़ किलोमीटर है। जाने-आने में तीन किलोमीटर की दूरी तय करने में उन्हें एक से डेढ़ घंटा खर्च करना पड़ता है। सात से आठ चक्कर पानी लाने में उनका दिन का अधिकांश समय गुजर हो जाता है। उर्मिला कहती हैं कि दिनभर पानी ठोने में उनकी सिर, कंधों और कमर में दर्द होने लगता है। साथ ही जंगली जानवरों का भी खतरा रहता है। उनका कहना है कि घर में मेहमान आने पर पूरा दिन पानी ढोने में गुजर जाता है।

रैका माला में रहने वाली लगभग सभी महिलाओं की दिनचर्या पानी के इर्दगिर्द घूमती रहती है। गांव में लगभग 10 जोहड़ हैं जो इंसानों और जानवरों की पानी की तमाम जरूरतें पूरी करते हैं। गर्मियों में जोहड़ का पानी सूखने पर पूरे गांव को पलायन करता पड़ जाता है। ग्रामीण अपने पशुओं के साथ अरावली के पहाड़ के ऊपर बसे अपने गांव से करीब 6 किलोमीटर दूर मैदानी इलाके में आ जाते हैं, जहां उनके परिवार के कुछ सदस्य अस्थायी तौर पर रहते हैं। लेकिन मॉनसून की पहली बारिश के साथ ही उनकी गांव में वापसी शुरू हो होती है।

कोटपुतली बहरोड़ जिले में शामिल यह गांव ढाई साल पहले तक अलवर जिले का हिस्सा लेकिन 2023 में इसे नए जिले (कोटपुतली बहरोड़) में शामिल कर लिया गया। यह गांव बामनवास कांकड़ ग्राम पंचायत में है। पूरे गांव में गुर्जर समुदाय के लोग रहते हैं जिनकी अर्थव्यवस्था मुख्यत: पशुपालन पर टिकी है। यहां के लोग लघु और सीमांत किसानों की श्रेणी में आते हैं। कुछ किसान खरीफ सीजन में मक्का और बाजरा उगाते हैं, जबकि कई खेत परती पड़े रहते हैं। पानी न होने पर रबी सीजन में खेती नहीं होती। ऐसी स्थिति में पशुपालन पर निर्भरता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। लगभग हर घर में कम से कम 8-10 और अधिकतम 50 भैसें तक हैं जो उनकी आजीविका को सहारा देती है। करीब 80 परिवारों वाले इस गांव की आबादी 600 से अधिक है।

चारपाई बन जाती है एंबुलेंस

रैका माला गांव में ऐसी कोई बुनियादी सुविधा नहीं है जो नागरिकों के लिए आवश्यक है। गांव में सड़क, विद्यालय, स्वास्थ्य सेवा, बिजली और शौचालय जैसी नागरिक सेवाएं तक नहीं हैं। जरूरत के हर छोटे से छोटे सामान के लिए ग्रामीणों को छह किलोमीटर के कच्चे, पथराली, रपटीले और खतरनाक रास्ते से होकर पहाड़ से नीचे उतरना पड़ता है। आने जाने में लोगों का 4 से 5 घंटे का वक्त जाया होता है। इसी रास्ते से मोटरसाइकल में सामान ढोकर ऊपर ले जा रहे विक्रम गुर्जर कहते हैं कि यह बहुत खतरनाक रास्ता है। रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर हैं जिनसे हर वक्त फिसलने का डर बना रहता है। कई बार से पत्थर चोटिल भी कर देते हैं। इस रास्ते पर कोई बड़ा वाहन नहीं जा सकता और मोटरसाइकल से चलना भी सबके बस की बात नहीं है।

ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य की आपात स्थिति में विशेषकर गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाने में सबसे अधिक दिक्कत होती है। ऐसी महिलाओं को चारपाई पर लिटाकर चार लोगों की मदद से नीचे ले जाना पड़ता है। रतनपाल गुर्जर कहते हैं कि उस वक्त खाट ही हम लोगों की एंबुलेंस बन जाती है।

रैका माला गांव का यह जोहड़ ग्रामीणों की पानी जरूरतें पूरी करता है। इस पानी में गोबर घुला है, जिसे लोग पीते हैं। यहां तक आने-जाने में महिलाओं को करीब एक घंटा लगता है

कोर जोन की कीमत

रैका माला सरिस्का टाइगर रिजर्व के कोर जोन-1 में बसे होने की कीमत चुका है। रिजर्व के कोर क्षेत्र को तीन हिस्सों- कोर 1, कोर 2 और कोर 3 में बांटा गया है। कोर क्षेत्र में कुल 29 गांव हैं और रैका माला कोर 1 के 11 गांवों में शामिल है। कोर क्षेत्र के सभी गांवों का पुनर्वास होना है।

कोर क्षेत्र में बसे गांवों की पुनर्वास की कवायद तब शुरू हुई जब 2005 में आई रिपोर्ट में सरिस्का टाइगर रिजर्व को बाघ विहीन घोषित किया गया था। कोर क्षेत्र में बसे गांवों और अवैध शिकार को इसका जिम्मेदार ठहराया गया। उसके बाद बाघों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) का गठन हुआ जिसने कई दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें बाघों के प्रजनन और उनकी स्थायी आबादी के लिए कोर क्षेत्रों में अविच्छिन्न क्षेत्र को “क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट” के रूप में चिह्नित करना भी शामिल था। इन निर्देशों के अनुपालन में सरिस्का टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र को 28 दिसंबर 2007 को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2006 के तहत क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट के रूप में अधिसूचित किया गया।

वर्तमान में सरिस्का टाइगर रिजर्व का कुल अधिसूचित क्षेत्रफल 1,213.3324 वर्ग किलोमीटर है। इसका कोर/क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट क्षेत्र 881.1124 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जबकि बफर जोन में कुल मिलाकर 245.72 वर्ग किलोमीटर वन भूमि और 86.50 वर्ग किलोमीटर राजस्व भूमि शामिल है। कोर क्षेत्र के गांवों के पुनर्वास के लिए 2008 में नीति बनी। इस नीति में किसानों को पुनर्वास के लिए दो विकल्प प्रदान किए गए। पहला एकमुश्त राशि (15 लाख रुपए) का भुगतान है और दूसरा 6 बीघा (1.5 हेक्टेयर) जमीन और घर बनाने के लिए पैसे का प्रावधान है। सरिस्का के फील्ड डायरेक्टर संग्राम सिंह कटारिया डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि पुनर्वास पैकेज पूरी तरह स्वैच्छिक है। उनका कहना है कि कोर क्षेत्र में कुल 29 गांव हैं जिनमें 5 गांवों- डाबली, देवरी, पानीढाल, रोटेकला और बघानी का पुनर्वास हुआ है। शेष 24 गांवों का पुनर्वास अभी होना है। इसी कारण रैका माला जैसे कोर क्षेत्र में बसे गांवों का विकास नहीं हो रहा है। साथ ही पुनर्वास की प्रकिया भी ठप पड़ी है। कटारिया इसका कारण बताते हुए कहते हैं कि लोगों को जमीन का पैकेज चाहिए। इस क्षेत्र में इतनी बड़ी जमीन उपलब्ध नहीं है। 15 लाख रुपए कैश लेकर कोई जाना नहीं चाहता। कटारिया कहते हैं कि पुनर्वास के लिए थोड़ी जमीन नहीं चाहिए बल्कि 10-15 हजार हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। लोगों को जमीन भी अपने आसपास चाहिए। इसी कारण पुनर्वास फंसा हुआ है।

नगर निगम के अधिकारी सही नक्शों की कमी के कारण अनजाने में पानी की पाइपलाइनों के ऊपर ही शौचालय या अन्य ढांचे बना सकते हैं

पुनर्वास स्थल से शिकायतें

स्पेस एंड कल्चर जर्नल में 2015 में प्रकाशित मुराली लाल मीणा के अध्ययन के अनुसार, सरिस्का के भीतर बसे गांवों का पुनर्वास एक जटिल मुद्दा है। पुनर्वास पैकेज के तहत प्रत्येक परिवार को 15 लाख रुपए नकद देने का प्रावधान है, लेकिन आजीविका छिन जाने के भय से ग्रामीणों ने इसमें विशेष रुचि नहीं दिखाई है। उनके अध्ययन के अनुसार, कोर जोन-1 के गांवों की कुल आबादी लगभग 3,200 है, जिनमें गुर्जर समुदाय 86.1 प्रतिशत है। अन्य समुदायों में मीणा (7.6 प्रतिशत), मेव (3.2 प्रतिशत), बावरिया (1.7 प्रतिशत) और अन्य (1.4 प्रतिशत) शामिल हैं। परंपरागत रूप से ये पशुपालक समुदाय मुख्य रूप से पशु चराने तथा दूध और दुग्ध उत्पादों की बिक्री से जुड़े रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नए पुनर्वास स्थल पर पानी की उपलब्धता को बेहद खराब बताया। यहां गांवों की अर्थव्यवस्था सूखा और अकाल दोनों परिस्थितियों में अत्यंत संवेदनशील हो गई है। विस्थापन से पहले सभी परिवार पशुपालन और डेयरी कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़े थे, जबकि लगभग 14 प्रतिशत कृषि गतिविधियों में लगे हुए थे। लेकिन विस्थापन की प्रक्रिया के बाद ग्रामीण अपने पशुपालन और डेयरी व्यवसाय को जारी रखने में असफल रहे। नए बसे लोगों में से 95 प्रतिशत से अधिक ने अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भरता शुरू कर दी। इस पेशागत बदलाव का लोगों की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। अधिकांश उत्तरदाताओं के अनुसार, लोगों की औसत वार्षिक आय पहले की तुलना में 40 प्रतिशत से अधिक घट गई है।

राजस्थान में ओरणों और देवबणियों के संरक्षण के लिए काम करने वाले गैर लाभकारी संगठन कृपाविस के संस्थापक अमन सिंह डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि कोर क्षेत्र के गांवों की मुख्य मांग जमीन की है, जबकि जमीन के अभाव में सरकार चाहती है कि लोग केवल एकमुश्त राशि लेकर गांव से चले जाएं। लोगों के लिए इस राशि का कोई मूल्य नहीं है। उनका कहना है कि अक्सर वन विभाग ग्रामीणों पर दबाव बनाता है ताकि लोग परेशान होकर पैसे लेने को राजी हो जाएं। लेकिन लोग तमाम कष्टों के बावजूद इसके लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि रैका माला जैसी स्थिति कई गांवों की है।

हालांकि वह यह भी कहते हैं कि पुनर्वास फंसा होने का एक कारण ग्रामीणों का लालच भी है। लोग अधिकतम लाभ लेना चाहते हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए किसी का लड़का 15 साल का है, वह तीन साल रुककर लड़के के 18 साल के होने का इंतजार करता है ताकि वह भी एक अलग परिवार के रूप में देखा जाए और पुनर्वास पैकेज का हकदार बन जाए। अतिरिक्त जमीन और पैसों का लालच लोगों के दिमाग में है।

उधर, रैका माला गांव में रहने वाले पायलट गुर्जर डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “हम किसी भी हालात में गांव नहीं छोड़ना चाहते। यहां हमारा जन्म हुआ है और यह हमारे देवता का भी वास है।” गांव में बसे तमाम परिवार गांव न छोड़ने पीछे इसी तरह के तर्क देते हैं। जगरांव गुर्जर यहां तक कहते हैं, “हमें अपनी पुरखों की जमीन सबसे ज्यादा प्यारी है। हमारे गांव को बसे 1,000 साल से अधिक हो चुके हैं। हम करोड़ों रुपए में भी गांव नहीं छोड़ेंगे, चाहे कितनी भी परेशानियों का सामना करना पड़े।”