उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के फुलेहरा गांव की पोखरी पर कथित अतिक्रमण का मामला एनजीटी तक पहुंच गया है।
सीपीसीबी ने अदालत में बताया कि यूपीपीसीबी से अब तक कोई स्थिति रिपोर्ट नहीं मिली, इसलिए पोखरी की मौजूदा हालत पर उसके पास कोई ठोस जानकारी नहीं है। बोर्ड ने साफ किया कि तालाबों से अवैध कब्जा हटाने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण प्रदेश में जल निकायों पर कब्जे बढ़ते जा रहे हैं।
वहीं एक अन्य मामले में भोपाल के कोलार रोड स्थित एक मेडिकल कॉलेज पर कृषि भूमि में सीवेज युक्त गंदा पानी छोड़ने का गंभीर आरोप एनजीटी में पहुंचा है।
याचिका में कहा गया है कि दूषित पानी खेतों, कॉलोनियों और बोरवेल तक फैल रहा है, जिससे फसलों और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ गया है। क्षेत्र में बीमारियों के बढ़ने का भी दावा किया गया है।
उत्तर प्रदेश में देवरिया के फुलेहरा गांव स्थित एक पोखरी के कथित अतिक्रमण का मामला अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक पहुंच चुका है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस जलाशय की मौजूदा स्थिति को लेकर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के पास कोई ठोस जानकारी नहीं है।
सीपीसीबी ने एनजीटी द्वारा 14 नवंबर 2025 को दिए आदेश पर रिपोर्ट अदालत में सबमिट की है। इस रिपोर्ट में साफ कहा है कि उसे इस पोखरी के संबंध में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) से अब तक कोई स्थिति रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है।
गौरतलब है कि सीपीसीबी ने 8 दिसंबर, 2025 और 7 जनवरी, 2026 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सामने यह मामला उठाया था और स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। हालांकि अब तक यूपीपीसीबी की ओर से कोई जवाब नहीं आया है। इसी वजह से सीपीसीबी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि “इस विषय पर कोई विशिष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।“
अतिक्रमण रोकना स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि तालाबों पर अवैध कब्जा, निर्माण और अतिक्रमण रोकने की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों और राज्य प्रशासन की है। इस तरह के मामलों में प्रवर्तन की भूमिका मुख्यतः जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की होती है।
पोखरी पर कब्जे का आरोप
यह मामला राम लाल सिंह द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि फुलेहरा गांव की यह पोखरी सरकारी और राजस्व रिकॉर्ड में “पोखरी” के रूप में दर्ज है। इसके बावजूद कुछ लोगों ने इस जलाशय पर अवैध कब्जा कर निर्माण कर लिया है।
आवेदक का आगे कहना है कि यह तालाब सिर्फ जल स्रोत नहीं है, बल्कि जैवविविधता, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आवेदक ने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारियों की निष्क्रियता ने अतिक्रमणकारियों और भूमि माफियाओं के हौसले बढ़ा दिए हैं। उनका कहना है कि प्रदेश भर में तालाबों, जोहड़ों और अन्य सार्वजनिक जलस्रोतों पर कब्जे बढ़ते जा रहे हैं और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।
जल निकायों के संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश
सीपीसीबी ने 5 फरवरी 2026 को प्रस्तुत रिपोर्ट में यह भी बताया कि जल निकायों की बहाली के लिए उसने पहले ही “जल निकायों के पुनरुद्धार हेतु संकेतात्मक दिशानिर्देश” जारी किए हैं।
ये दिशानिर्देश एनजीटी के 10 मई 2019 के आदेश (सर्वदमन सिंह ओबेरॉय बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य) के अनुपालन में तैयार किए गए थे। इसके तहत सीपीसीबी ने 18 जून 2019 को सभी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों से अपने-अपने राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में जल निकायों के संरक्षण और बहाली के लिए कार्ययोजना बनाने का आग्रह किया था।
अब सवाल यह है कि जब तालाबों पर कब्जे के मामले बढ़ रहे हैं, तब जिम्मेदार एजेंसियों की चुप्पी और रिपोर्ट में देरी आखिर किसे बचा रही है?
भोपाल में खेतों से कॉलोनियों तक बह रहा सीवेज, एनजीटी ने मांगा जवाब
भोपाल के कोलार रोड स्थित मानसरोवर डेंटल एवं आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज पर कृषि भूमि में सीवेज युक्त गंदा पानी छोड़ने का गंभीर आरोप अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष पहुंच गया है। एनजीटी की प्रधान पीठ ने 9 फरवरी 2026 को इस मामले को भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच को स्थानांतरित करने का आदेश दिया है।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि चूंकि कार्रवाई का कारण सेंट्रल बेंच के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए मामले की सुनवाई अब भोपाल बेंच करेगी। इस मामले में अगली सुनवाई 12 मार्च 2026 को होगी।
खेतों से कॉलोनियों तक फैल रहा दूषित पानी
याचिका में बताया गया है कि कॉलेज से निकलने वाला प्रदूषित पानी खेतों से होकर एक छोटे नाले के जरिए 'अपनी मिलन कॉलोनी', फिर 'फॉर्च्यून एस्टेट कॉलोनी' और आगे कोलार स्थित इस्कॉन मंदिर तक पहुंचता है। इसी छोटे नाले जैसी नहर से हिनोतिया आलम क्षेत्र की करीब 130 एकड़ भूमि की सिंचाई होती है।
यहां उगाई जाने वाली सब्जियां, गेहूं, चावल आदि फसलें कोलार क्षेत्र की करीब 20 फीसदी आबादी तक पहुंचते हैं।
बोरवेल का पानी भी बताया गया दूषित
आवेदन में यह भी कहा गया है कि कॉलेज परिसर में करीब 700 छात्र और कर्मचारी रह रहे हैं, जिनका पूरा मानव अपशिष्ट सीधे पानी में मिल रहा है। यही दूषित पानी खेतों, सब्जियों और खाद्यान्नों के जरिए कोलार के लोगों तक पहुंच रहा है।
याचिका के अनुसार, आसपास की कॉलोनियों जैसे रूबी भगवान स्टेट और अपनी मिलन कॉलोनी के बोरवेल का पानी भी पूरी तरह दूषित हो चुका है। इन कॉलोनियों में नल जल योजना की सुविधा न होने के कारण लोग मजबूरी में इसी पानी का उपयोग पीने और घरेलू कार्यों के लिए कर रहे हैं।
बीमारियों में बढ़ोतरी का दावा
दावा है कि दूषित पानी के उपयोग से इलाके में पिछले एक साल में कैंसर, मलेरिया, पेट संबंधी रोगों और अन्य संक्रामक बीमारियों के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं।
अब इस मामले पर सबकी निगाहें 12 मार्च 2026 को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां एनजीटी भोपाल बेंच आगे की कार्रवाई तय करेगी।