फोटो: मिदुन विजयन 
जल

आभासी एआई: लैंगिक असमानता के बीच उभरता पानी का दृश्य संकट

महिलाएं आज भी पानी की जद्दोजहद में अपना समय, श्रम और अवसर गंवा रही हैं, वही जबकि आभासी दिखने वाली एआई चुपचाप करोडो लीटर पानी चट कर एक नए जल संकट को जन्म दे रही है, जिसका भार पहले से ही महिलाएं और किशोरियां उठा रही है। यह समय है समझने का कि तकनीकी प्रगति तभी सार्थक और न्यायपूर्ण है, जब वह जल न्याय और लैंगिक समानता के साथ आगे बढ़े।

Kushagra Rajendra

साल 2026 में जब हम जल दिवस मना रहे है तब यह मान लेना जरुरी हो जाता है कि जल संकट का सबसे मानवीय और संघर्षपूर्ण चेहरा महिलाएं और लड़कियां ही हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में पानी लाने की 80 प्रतिशत जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है।

सिर पर मटके और हाथों में बाल्टी और ड्रम थामे ये महिलाएं रोज लगभग 25 करोड़ घंटे केवल पानी जुटाने में गंवा देती हैं; यह वह समय है जो उनकी शिक्षा, आजीविका और बेहतर स्वास्थ्य में निवेश हो सकता था।

यह केवल श्रम का मुद्दा नहीं, बल्कि अधिकार और अस्तित्व का प्रश्न है। पानी की कमी का सीधा प्रहार लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं की विशेष स्वास्थ्य जरूरतों पर पड़ता है। मासिक धर्म स्वच्छता से लेकर सुरक्षित प्रसव तक, दुनिया की 27% महिलाएं पर्याप्त पानी न होने के कारण स्वास्थ्य जोखिमों की जद में हैं।

विडंबना यह है कि जो महिलाएं जल प्रबंधन का सबसे जमीनी अनुभव रखती हैं, निर्णय लेने वाली समितियों में उनकी भागीदारी 17% से भी कम है। यह विशाल अंतर दर्शाता है कि पानी पर मेहनत महिलाओं की है, लेकिन अधिकार और नीतियां पुरुषों के हाथ में हैं। इसलिए, इस वर्ष की थीम "वॉटर एंड जेंडर" केवल नारा नहीं, बल्कि धरातल पर समानता और सम्मान की मांग है।

एआई: पानी का नया संकट 

इसी पृष्ठभूमि में, अगर हम वर्तमान तकनीकी दौर पर नज़र डालें, तो एक नया, अपेक्षाकृत अदृश्य पर विकराल होता जल संकट सामने आता है, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेन्स (एआई) और उसे चलाने वाले विशाल डेटा सेंटर।

हम आमतौर पर एआई को मोबाइल ऐप, चैटबॉट या फोटो बनाने वाले टूल के रूप में देखते हैं,और आभासी समझने की भूल कर बैठते है, लेकिन इन सुविधाओं के पीछे खड़ा ढाँचा अत्यंत भौतिक है: हज़ारों सर्वरों से भरे डेटा सेंटर, जिनमें अरबों ट्रांजिस्टर वाली चिप्स चौबीसों घंटे काम कर रही होती हैं।

ये चिप्स जब एआई मॉडल चलाती हैं, तो भारी मात्रा में बिजली खपत करती हैं और उसी अनुपात में बहुत अधिक गरम होती हैं। अगर यह गर्मी नियंत्रित न की जाए, तो चिप खराब हो सकती है, प्रदर्शन गिर सकता है और पूरा सिस्टम असफल हो सकता है; इसलिए इन्हें लगातार ठंडा रखना अनिवार्य है।

और यहीं से पानी की कहानी एक अपेक्षाकृत नए तकनीक की दुनिया में प्रवेश करती है। डेटा सेंटरों को ठंडा करने के लिए बड़े बड़े कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं; पानी आधारित चिलर और कूलिंग टॉवर। 

उपलब्ध आकलनों के आधार पर एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर सालाना लगभग 11 करोड़ गैलन पानी सिर्फ़ कूलिंग के लिए इस्तेमाल कर सकता है, जो लगभग 1,000 घरों की सालाना पानी ज़रूरत के बराबर है। वही बड़े डेटा सेंटर तो प्रतिदिन 50 लाख गैलन तक पानी “खर्च” कर सकते हैं; यानी अकेला एक केंद्र साल में इतना पानी उपयोग कर सकता है, जितना 10,000 से 50,000 लोगों वाले किसी कस्बे या छोटे शहर की ज़रूरतों के बराबर है। विकसित देशों में तो में कुछ ही वर्षों में डेटा सेंटरों की संख्या तेज़ी से बढ़ने पर स्थानीय प्रशासन को घरेलू उपयोग से अधिक पानी उद्योग और डिजिटल बुनियादी ढाँचे के लिए आवंटित करना पड़ रहा है। यह सब उस दुनिया में हो रहा है जहाँ पहले से ही लगभग एक चौथाई से अधिक (लगभग 2.2 अरब) लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं, लगभग चार अरब लोग कम से कम एक महीने गंभीर जल संकट का सामना करते है, और 700 मिलियन लोग तो बस पानी की तलाश में पलायन कर रहे हो और करोड़ों महिलाएं पानी की तलाश में रोज भटकती रही हो। 

अनुमान से ज्यादा पानी का दोहन 

एआई की पानी की प्यास जिसे हम वाटर फुटप्रिंट के रूप में समझते है, केवल डेटा सेंटर में किसी एआई माडल को चलने तक सीमित नहीं रहता; बल्कि चिप के जन्म से शुरू होता है। जिस सेमीकंडक्टर चिप पर कोई एआई मॉडल चलता है, उसका निर्माण और उसकी सफाई अपने आप में अत्यधिक पानी सोखने वाली प्रक्रिया है, जिसमे आज करोड़ों गैलन “शुद्धतम” पानी का उपयोग करती हैं। “शुद्धतम” पानी के शोधन में सामान्य पानी की कहीं बड़ी मात्रा की ज़रूरत पड़ती है। एक अकेली चिप, जो अंततः किसी डेटा सेंटर के सर्वर में लगेगी, अपनी जीवन यात्रा में पहले ही हज़ारों गैलन पानी सोख चुकी होती है। फिर जब वही चिप किसी एआई मॉडल को चलाती है, तो उसे ठंडा रखने के लिए अतिरिक्त पानी की ज़रूरत पड़ती है। 

एआई की ऊर्जा की जरूरत के स्तर पर पानी की खपत और भी जटिल हो जाती है। एआई और डेटा सेंटरों की ऊर्जा–ज़रूरत बहुत बड़ी है, और दुनिया के कई हिस्सों में बिजली अभी भी कोयला और गैस आधारित थर्मल पावर प्लांट से आती है, जिसमें भारी मात्रा में पानी खर्च होता हैं। वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक और वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका, चीन और फ्रांस समेत अनेक देशों में पानी की कुल जरुरत का 30–40 प्रतिशत हिस्सा अकेले उर्जा उत्पदान में लगता है। इसमें से एक हिस्सा कूलिंग के बाद वापस लौटता ज़रूर है, लेकिन गर्म होकर, जिससे स्थानीय नदियों और झीलों की पारिस्थितिकी प्रभावित होती है; वहीं दूसरा हिस्सा वास्तविक खपत के रूप भाप बन कर उपयोग चक्र से बाहर चला जाता है। यानी डेटा सेंटर में कुलिंग के लिए सीधे इस्तेमाल होने वाले पानी के अलावा, उनकी बिजली के पीछे भी छिपा हुआ एक बड़ा वाटर फुटप्रिंट मौजूद है। इस तरह एआई का वाटर फुटप्रिंट चिप के निर्माण, इस्तेमाल होने वाले उर्जा के उत्पादन और डेटा सेंटर की कूलिंग, इन सब से जुड़ा हुआ है। 

हर प्रांप्ट एक बोतल पानी पी रहा?

इन सबके बीच, एआई के रोज़मर्रा खास कर बेजा उपयोग का पैमाना तेजी से बढ़ रहा है। बड़े भाषा मॉडल चलाने वाले डेटा सेंटरों पर किए गए शोध संकेत देते हैं कि एक औसत एआई से उतर जानने की प्रक्रिया (जैसे 100–200 शब्दों वाला सवाल–जवाब) में अप्रत्यक्ष रूप से लगभग एक बोतल पानी का उपयोग हो चूका होता है। चुकी सीधे सीधे पानी की खपत दिखती नहीं है, इसलिए हम पानी की बढती इस इस्तेमाल को महसूस नहीं कर पाते हैं। लेकिन जब करोड़ों उपयोगकर्ता रोज़ लाखों–करोड़ों प्रॉम्प्ट चला रहे हों, तो पानी की यह नयी पर अदृश्य खपत सालाना एक बहुत बड़े आँकड़े में बदल जाता है। एक शोध ‘मेकिंग एआई लेस थर्स्टी’  के अनुसार केवल 2025 एक वर्ष में वैश्विक एआई प्रणालियाँ जितना पानी अप्रत्यक्ष रूप से उपयोग कर सकती हैं, वह पूरी दुनिया की बोतलबंद पानी उद्योग की सालाना जल–खपत के स्तर के आसपास पहुँच सकता है। 

यह आधुनिक समय की सबसे कडवी विरोधाभास है जहाँ एक लड़की, जो रोज़ सुबह स्कूल जाने से पहले 2–3 किलोमीटर जाकर पानी भरती है और कई बार इसी वजह से उसकी पढ़ाई बाधित होती है और दूसरी तरफ कोई डेटा सेंटर, जिसका अधिकांश हिस्सा गैर जरुरी प्रांप्ट से भरा हो जो अकेले दिन भर में उतना पानी खर्च कर रहा है, जितना उस लड़की या उस जैसी सैकड़ों–हज़ारों महिलाओं ने मिलकर अपने घड़ों में शायद कभी देखा भी न हो।

दोनों ही एक ही वैश्विक मीठे पानी के सीमित स्रोत से हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन दोनों के निर्णय क्षमता और लाभ वितरण और हिस्सेदारी में के बीच गहरी खाई है। एआई आधारित सेवाओं का सबसे ज्यादा फायदा अक्सर उन समाजों और वर्गों को मिलता है, जो पहले से अपेक्षाकृत समृद्ध हैं, जैसे कॉर्पोरेट सेक्टर, ग्लोबल नॉर्थ, शहरी मध्यम और उच्च वर्ग, जबकि जल–संकट की मार उन समुदायों पर पड़ती है जिनके पास पानी पर सबसे कम नियंत्रण है और जिनके दिन का बड़ा हिस्सा पानी की जुगत में बीतता है।  

विवेकपूर्ण उपयोग एक मात्र रास्ता 

इसका अर्थ यह कतई नहीं कि  एआई “गलत” है या हमें तकनीक से मुँह मोड़ लेना चाहिए। प्रश्न यह है कि एआई का विकास और उपयोग किस रूप में, किस कीमत पर और किस जवाबदेही के साथ हो रहा है? अगर एआई मॉडल स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, जलवायु, अनुसन्धान या आपदा–पूर्वानुमान में सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं, तो यह स्वागतयोग्य है; लेकिन यह भूमिका तभी न्यायपूर्ण होगी, जब उनके विकास और संचालन में इस्तेमाल होने वाला पानी, उन समुदायों की पानी की उपलब्धता को खतरे में न डाल दे, जो पहले से ही गंभीर संकट झेल रहे हैं, खासकर महिलाएं और गरीब।

ऐसे में यह जरुरी हो जाता हैं कि कंपनियाँ अपने एआई मॉडल्स की कुल जल खपत को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करें और सुनिश्चित करे कि कूलिंग–तकनीकों में पुनर्चक्रित या गैर पीने योग्य पानी का ही प्रयोग हो।आम उपयोगकर्ता के स्तर पर भी जरुरी डिजिटल जागरूकता और समझ विकसित करने की ज़रूरत है  कि हर अनावश्यक, एआई प्रोसेसिंग के पीछे कहीं न कहीं पानी का अतिरिक्त बोझ जुड़ा हुआ है। इसका मतलब यह नहीं कि हम हर सवाल पूछने से डरें, बल्कि यह कि हम सजग होकर सोचें कि क्या हर काम के लिए एआई का उपयोग ज़रूरी है? यही सही समय है नीति–निर्माताओं और कंपनियों से सवाल पूछने  कि “आपका एआई कितना स्मार्ट है” के साथ–साथ “वह कितना पानी पीता है”?

विश्व जल दिवस पर “वॉटर एंड जेंडर” की थीम हमें यह सोचने का अवसर देती है कि पानी से जुड़े सभी मुद्दों को तकनीक की भाषा में भी पढ़ा जाए। अगर हम चाहते हैं कि भविष्य में किसी लड़की को सिर्फ़ कुछ बाल्टी पानी के लिए अपनी शिक्षा और स्वास्थ्य से समझौता न करना पड़े, तो हमें आज ही यह सुनिश्चित करना होगा कि एआई और डेटा सेंटरों की जल–भूख, उन समुदायों के अधिकारों और ज़रूरतों के ऊपर प्राथमिकता न पा जाए। एआई का सवाल सिर्फ़ एल्गोरिद्म और मॉडल–आर्किटेक्चर का नहीं है; वह पानी, न्याय और लैंगिक समानता का भी सवाल है, पानी की ‘मुलभुत जरुरत’ की प्राथमिकता सबसे पहले हैं । जिम्मेदार तकनीक वही होगी, जो इस सच को स्वीकार करे और अपने विस्तार की हर नई योजना में पानी और उससे जुड़े मानवीय चेहरों को केंद्र में रखे।