जल

"गंगा घाटी में 1300 वर्षों का सबसे गंभीर सूखा"

एरिजोना यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ जियोसाइंसेज में एसोसिएट प्रोफेसर कौस्तुभ थिरुमलाई बताते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप का हाइड्रो-क्लाइमेट यानी जलवायु व्यवहार एक जैसा नहीं है

Akshit Sangomla

आपके शोध के मुताबिक पिछले कुछ दशकों में गंगा में सूखा पिछले 1300 वर्षों में सबसे गंभीर हैं। इसका सटीकता स्तर क्या है?

हमारा शोध पैलियो-क्लाइमेट डाटा यानी प्राचीन जलवायु के आंकड़ों का उपयोग करता है, जिसमें आर्द्रता और सूखापन का आंकड़ा शामिल है, और यह डाटा मॉनसून एशिया ड्राउट एटलस (एमएडीए) नामक रिंग-ट्री आधारित डाटासेट से लिया गया है। हम विशेष रूप से गंगा नदी घाटी पर ध्यान केंद्रित करते हैं और हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग लागू करके पिछली शताब्दियों के एमएडीए वैल्यूज को बेसिन के प्रवाह (स्ट्रीमफ्लो) में बदलते हैं।

एमएडीए दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पिछले सूखे और आर्द्रता का पुनर्निर्माण है, जो हजारों वर्षों तक पीछे जाता है। यह मुख्य रूप से ट्री-रिंग रिकॉर्ड्स पर आधारित है, जो साल दर साल नमी की उपलब्धता की जानकारी सुरक्षित रखते हैं। अध्ययन में हम एमएडीए डाटा का उपयोग हाइड्रोलॉजिकल मॉडल के साथ करते हैं, जो एमएडीए के सूखे और आर्द्रता के वैल्यूज को स्टैंडर्डाइज्ड प्रवाह विसंगतियों में बदलता है। इससे हम गंगा बेसिन में हाल के देखे गए सूखे को दीर्घकालिक ऐतिहासिक संदर्भ में रख सकते हैं और दिखा सकते हैं कि पिछले दशकों में सूखे कितने असामान्य रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि एमएडीए आधुनिक उपकरणों या मॉडलों पर निर्भर नहीं करता बल्कि यह प्राकृतिक जलवायु अभिलेखों पर ही आधारित है। जब हम गंगा बेसिन में 1991–2020 के 30 साल के औसत सूखे की तुलना पिछले 700 ईस्वी तक हर 30 साल के औसत सूखों से करते हैं तो यह देखा गया कि हाल का यह दौर सबसे गंभीर सूखा वाला था। इसका मतलब है कि “पिछले 1300 वर्षों में सबसे खराब” सूखा केवल किसी एक साल के चरम को नहीं दिखाता बल्कि 1991–2020 के दौर की स्थिति को पुनर्निर्मित इतिहास के पूरे पैटर्न में देखने पर सबसे नकारात्मक पाया गया। यह पुराने सूखे और नमी के आंकड़े कई अलग-अलग संभावित तरीकों से तैयार किए गए हैं, इन्हें एन्सेम्बल कहते हैं और शोध में बताया गया है कि इन आंकड़ों के आधार पर हमें 95 फीसदी तक भरोसा है कि यह अनुमान सही है।

क्या भारत की अन्य प्रमुख नदियों में भी इसी तरह के सूखे या सूखापन की प्रवृत्तियां देखी जा रही हैं?

भारत के कुछ हिस्सों के लिए पैलियो-हाइड्रो-क्लाइमेट यानी पुराने जलवायु और नदी प्रवाह की जानकारी मौजूद है लेकिन, डाटा की कवरेज हर नदी बेसिन और हर प्रकार के प्रॉक्सी डाटा के हिसाब से समान नहीं है। हमारे जैसे और अध्ययन किए जाने की जरूरत है ताकि यह देखा जा सके कि बड़े पैमाने पर बने प्रॉक्सी डाटा (जैसे ट्री-रिंग, बर्फ की परतें आदि) को स्थानीय जलवायु और नदी प्रवाह के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है। इसके अलावा, हालांकि अधिकांश उपमहाद्वीप की बारिश गर्मी के मौसम में मॉनसून के द्वारा नियंत्रित होती है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप एक समान जलवायु क्षेत्र की तरह व्यवहार नहीं करता, खासकर जब उत्तर गोलार्ध की ग्रीष्मकालीन बारिश की बात होती है। अल नीनो और इंडियन ओशियन डाइपोल, एरोसोल प्रभाव (धूलकण), सिंचाई और क्षेत्रीय वायुमंडलीय बदलाव जैसे दूर-दराज जलवायु कनेक्शन ऐसे बड़े अंतर पैदा कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ उपक्षेत्रों में सूखा बढ़ सकता है, जबकि अन्य स्थानों पर बारिश में वृद्धि हो सकती है। इसलिए मैं यह मानने में सावधान रहूंगा कि हर नदी बेसिन में गंगा के पुनर्निर्माण जैसे इतने बड़े सूखे की पुष्टि पहले ही हो चुकी है। प्रत्येक बेसिन के हिसाब से सूखे की स्थिति का विश्लेषण करना महत्वपूर्ण है।

गंगा और अन्य नदी प्रणालियों के लिए भविष्य में क्या हो सकता है?

मॉडल अक्सर यह अनुमान लगाते हैं कि गर्म वातावरण अधिक नमी को समेट सकता है और कई अनुमानों में यह दिखाया गया है कि दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में औसतन बारिश में वृद्धि हो सकती है। हालांकि, हमारे परिणाम जटिलताओं को उजागर करते हैं। एक तो, हाल के दशक में जो सूखापन देखा गया है, उसे अधिकांश मॉडल ठीक से नहीं समझा पाए हैं, इसलिए नजदीकी भविष्य के लिए क्षेत्रीय अनुमान पर भरोसा सीमित है। इसके अलावा, जोखिम केवल औसत वर्षा के बारे में नहीं है बल्कि मौसमी बदलाव, सूखे की अवधि,चरम मौसमी घटनाएं और भूजल की निकासी का भी नदी के प्रवाह और जल उपलब्धता पर असर पड़ता है। भले ही इस सदी के अंत में औसत वर्षा बढ़े लेकिन कई वर्षों तक सूखा और जल प्रबंधन पर दबाव फिर भी बना रह सकता है क्योंकि मांग, भूजल की कमी, और वर्षा में उतार-चढ़ाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन सभी कारकों के साथ-साथ भारत और दुनिया भर में आर्थिक विकास, उत्सर्जन में बदलाव, और प्राकृतिक परिदृश्यों में बदलाव भी जुड़ते हैं। मुझे लगता है कि हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वर्षा में उतार-चढ़ाव और चरम घटनाएं अधिक महत्वपूर्ण होंगी, खासकर जब ग्रहीय तापन और मानव जल उपयोग लगातार बढ़ते रहेंगे।