देश के 178 प्रमुख जलाशयों में जल संकट गहराता जा रहा है।
48 जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का 50 प्रतिशत से भी कम पानी बचा है।
दक्षिण भारत में स्थिति सबसे गंभीर है, जहां कई जलाशयों में पानी का स्तर 10 प्रतिशत से भी नीचे पहुंच चुका है।
यह स्थिति आने वाले महीनों में जल संकट को और बढ़ा सकती है, जिससे जनजीवन प्रभावित होगा।
देश के 178 प्रमुख जलाशयों में जल संकट की स्थिति और गहराती दिख रही है। केंद्रीय जल आयोग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इन जलाशयों की कुल उपयोगी जल भंडारण क्षमता 184.82 अरब घन मीटर (बीसीएम) है, लेकिन 5 नवंबर 2026 तक इनमें महज 121.93 अरब घन मीटर पानी बचा था। यानी जलाशयों की कुल क्षमता का करीब 66 प्रतिशत ही भरा हुआ है।
चिंता की बात यह है कि पिछले सात दिनों में पानी की स्थिति में सुधार के बजाय 0.095 अरब घन मीटर (9.5 करोड़ घन मीटर) की मामूली गिरावट दर्ज की गई। पिछले सात दिनों में पानी का स्तर घटने से साफ है कि जलाशयों में पानी की कमी का सिलसिला जारी है। यह स्थिति आने वाले महीनों में पेयजल और सिंचाई के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है।
दक्षिण भारत के जलाशयों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बनी हुई है। आंध्र प्रदेश में जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का महज 27.78 प्रतिशत पानी बचा है। वहीं तेलंगाना में यह आंकड़ा 34.18 प्रतिशत है। देश के 13 जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का 20 प्रतिशत से भी कम पानी रह गया है। इनमें चार जलाशयों में पानी का स्तर 10 प्रतिशत से भी नीचे पहुंच चुका है।
केंद्रीय जल आयोग के पांच नवंबर 2026 को जारी बुलेटिन के मुताबिक जिन 13 जलाशयों में हालात बहुत खराब हैं, उनमें राजस्थान का जवाई बांध (12.44 प्रतिशत), बिहार का बदुआ बांध (12.05 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल का हिंगलो (17.24 प्रतिशत), गुजरात का भादर (16.14 प्रतिशत), उंड-I (7.50 प्रतिशत) और हिरण-II (17.49 प्रतिशत) शामिल हैं।
महाराष्ट्र के मांजरा (5.87 प्रतिशत), लोअर दुधना (13.48 प्रतिशत) और लोअर टेरना (17.85 प्रतिशत) में भी पानी 20 प्रतिशत से नीचे है। वहीं आंध्र प्रदेश के सोमासिला (17.25 प्रतिशत) और कंडलेरू (18.92 प्रतिशत), तेलंगाना के सिंगुर (8.88 प्रतिशत) और तमिलनाडु के अलियार (5.26 प्रतिशत) में भी जल भंडारण बेहद कम रह गया है।
इनमें चार जलाशयों मांजरा, अलियार, सिंगुर और उंड-I में पानी 10 प्रतिशत से भी कम है।
48 जलाशयों में आधे से कम पानी
देश के 178 प्रमुख जलाशयों में से 48 में उनकी कुल क्षमता का 50 प्रतिशत से भी कम पानी बचा है। उत्तरी और पूर्वी भारत में पंजाब का थेइन बांध (43.55 प्रतिशत), राजस्थान का जवाई बांध (12.44 प्रतिशत) और जयसमंद (49.18 प्रतिशत), असम का खांडोंग (24.74 प्रतिशत), बिहार के बदुआ बांध (12.05 प्रतिशत), गरही अपर किऊल (44.60 प्रतिशत) और फूलवरिया (46.11 प्रतिशत), मेघालय का उमियम (48.28 प्रतिशत), ओडिशा का सालानदी (48.16 प्रतिशत) तथा पश्चिम बंगाल के मयूराक्षी (41.52 प्रतिशत), कांगसाबती (48.47 प्रतिशत) और हिंगलो (17.24 प्रतिशत) में पानी आधी क्षमता से कम रह गया है।
पश्चिम और मध्य भारत में गुजरात के साबरमती (45.75 प्रतिशत), कड़ाना (49.81 प्रतिशत), भादर (16.14 प्रतिशत), दांतीवाड़ा (21.06 प्रतिशत), पानम (41.84 प्रतिशत), हथमती (45.08 प्रतिशत), उंड-I (7.50 प्रतिशत), हिरण-II (17.49 प्रतिशत) और मुंजियासर (24.36 प्रतिशत) में स्थिति चिंताजनक है। महाराष्ट्र के अपर वर्धा (42.27 प्रतिशत), मांजरा (5.87 प्रतिशत), लोअर दुधना (13.48 प्रतिशत), लोअर टेरना (17.85 प्रतिशत) और वीर बांध (41.71 प्रतिशत) में भी आधे से कम पानी बचा है। मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर (22.39 प्रतिशत) और छत्तीसगढ़ के सिकासार (26.44 प्रतिशत) में भी जल भंडारण कम है।
दक्षिण भारत में स्थिति और गंभीर है। आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम (22.95 प्रतिशत), सोमासिला (17.25 प्रतिशत), कंडलेरू (18.92 प्रतिशत), पुलिचिंतला (40.62 प्रतिशत) और ब्रह्मम सागर (24.96 प्रतिशत) में पानी आधी क्षमता से कम है। कर्नाटक के कृष्णराज सागर (34.05 प्रतिशत), तुंगभद्रा (28.05 प्रतिशत), नारायणपुर (22.94 प्रतिशत), मालाप्रभा (39.36 प्रतिशत), लिंगनमक्की (49.98 प्रतिशत), सुपा (49.60 प्रतिशत) और टाट्टिहल्ला (22.59 प्रतिशत) में भी यही स्थिति है। केरल के पेरियार (41.62 प्रतिशत) और करापुझा (48.61 प्रतिशत), तमिलनाडु के अलीयार (5.26 प्रतिशत), शोलायार (25.17 प्रतिशत), करायर (24.16 प्रतिशत) और मणिमुथार (24.36 प्रतिशत) तथा तेलंगाना के नागार्जुन सागर (27.41 प्रतिशत) और सिंगुर (8.88 प्रतिशत) में भी कुल क्षमता का आधा पानी नहीं बचा है।