भूजल का अत्यधिक दोहन करने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में धान की खेती के लिए भूमिगत जल पंप किया जा रहा है। फोटो: वर्षा सिंह 
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उत्तर प्रदेश में भूजल दोहन मामलों पर एनजीटी के कड़े निर्देश, जल ऑडिट और क्षतिपूर्ति आकलन अनिवार्य

पीठ ने कहा कि जहां मीटर नहीं लगे हैं वहां खपत का प्रतिकूल अनुमान लगाया जाए

Vivek Mishra

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की प्रधान पीठ ने उत्तर प्रदेश में अवैध भूजल दोहन पर चिंता जाहिर करते हुए सरकार के संबंधित प्राकिरणों को भूजल दोहन के आकलन और जल ऑडिट से संबंधित कड़े निर्देश जारी किए हैं।

एनजीटी के चेयरमैन और न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह आदेश महेश चंद्र सक्सेना बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य और विक्रांत टोंगड़ बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामले में दिया। इस पीठ में विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल और डॉ. अफरोज अहमद भी शामिल थे।

पीठ ने भूजल दोहन के आकलन एवं पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति से संबंधित अपने पूर्व आदेशों के अनुपालन पर जोर दिया। सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि 19 जून 2020 के आदेश विशेषकर अवैध भूजल दोहन के आकलन और जल ऑडिट से संबंधित निर्देश का पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ है।

अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 26 मार्च 2025 के आदेश में इन निर्देशों में कोई संशोधन नहीं किया गया है, अतः यह प्रभावी हैं।अधिकरण ने दोबारा निर्देशित किया है कि भूजल दोहन का यथार्थ आकलन किया जाए।

जल मीटर के अभाव में प्रतिकूल अनुमान (एडवर्स इनफरेंस ) लगाया जाए यानी यदि आप जल मीटर नहीं लगाते या सही जानकारी नहीं देते, तो अधिकारी आपके पानी के बिल या खपत के लिए आपके खिलाफ अनुमान लगा सकते हैं।

पीठ ने कहा कि पिछले तीन वर्षों के भूजल उपयोग और पुनर्भरण का जल ऑडिट किया जाए।अवैध दोहन के लिए पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति निर्धारित की जाए।वर्षा जल संचयन प्रणालियों की गुणवत्ता की जांच कर आवश्यक सुधारात्मक उपाय सुझाए जाएं।

अधिकरण ने पूर्व में गठित संयुक्त समिति में सीपीसीबी और आईआईटी दिल्ली के अतिरिक्त प्रतिनिधियों को शामिल करने का निर्देश दिया है। पूर्व में गठित संयुक्त समिति में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला मजिस्ट्रेट गौतम बुद्ध नगर, नोएडा प्राधिकरण तथा केंद्रीय भूजल प्राधिकरण शामिल हैं।

इस समिति की नोडल एजेंसी यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड है। पीठ ने बोर्ड के सदस्य सचिव को निर्देशित किया गया है कि समिति निर्धारित कार्यवाही कर छह सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करे।अधिकरण ने इस आदेश की प्रति आईआईटी दिल्ली के निदेशक को भेजने का भी निर्देश दिया है।

मामले की अगली सुनवाई 16 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है।