नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दाखिल एक जनहित याचिका ने देश के शहरी जल प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सुयश कुमार मिश्रा की ओर से दायर इस ओरिजिनल एप्लीकेशन में आरोप लगाया गया है कि भारत के कई बड़े शहरों में पीने का पानी बार-बार सीवर से दूषित होकर लोगों तक पहुंच रहा है, जिससे हजारों लोग बीमार पड़े हैं और कुछ मामलों में जान तक गई है। याचिका में ग्रेटर नोएडा, इंदौर, गांधीनगर, पुणे और बेंगलुरु की हालिया घटनाओं को एक-दूसरे से जुड़ी हुई और पूरी तरह रोकी जा सकने वाली शहरी विफलताओं का नतीजा बताया है।
एनजीटी की प्रधान पीठ ने इस याचिका की सुनवाई के बाद मामले में सभी नगर निगम और निकायों को लोगों को स्वच्छ जल मुहैया कराने के आदेश दिए हैं। हालांकि, खबर लिखने तक एनजीटी का यह आदेश सार्वजनिक नहीं किया गया है।
याचीकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अंबर सचदेवा ने कहा कि याचिका का तात्कालिक आधार उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के सेक्टर डेल्टा-1 की जनवरी 2026 की घटना है, जहां 6 से 8 जनवरी के बीच घरों में सप्लाई हुआ पानी गहरे पीले रंग का, बदबूदार और सीवर जैसी गंध वाला था। इस पानी के सेवन के बाद 25 से 30 लोग अचानक बीमार पड़े, जिनमें 12 से 15 वर्ष तक के बच्चे भी शामिल थे। उल्टी, दस्त, तेज बुखार और पेट दर्द के मामलों ने इलाके में दहशत फैला दी। चिकित्सा सहायता के लिए कसना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल कैंप लगाना पड़ा।
वहीं, याचिका में कहा गया है कि ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने मरम्मत और जांच की कार्रवाई तब शुरू की, जब लोग पहले ही बीमार हो चुके थे, और अब तक पानी की माइक्रोबायोलॉजिकल जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। याचिका के मुताबिक, सेक्टर डेल्टा-1 की पानी की पाइपलाइनें 25–30 साल पुरानी हैं, कई जगहों पर रिसाव है और इन्हें खुली नालियों के भीतर या बेहद पास से बिछाया गया है, जिनमें सीवर का पानी बहता है। याचिका में कहना है कि ऐसी स्थिति में जब जल आपूर्ति रुकती और दोबारा शुरू होती है, तो पाइपलाइन में नकारात्मक दबाव बनता है, जिससे आसपास का गंदा पानी सीधे पीने के पानी की लाइन में खिंच आता है।
याचिका में इंदौर के मामले में सबसे गंभीर उदाहरण के रूप में दर्ज किया है। दिसंबर 2025 के अंत में मध्य प्रदेश के भगिरथपुरा इलाके में दूषित पानी से फैली बीमारी ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। याचिका के अनुसार इससे 3,000 से अधिक लोग बीमार पड़े, 140 से ज्यादा को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और आधिकारिक रूप से 6 से 7 मौतों की पुष्टि हुई, जबकि स्थानीय स्तर पर मृतकों की संख्या 14 से 17 तक बताई गई। मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों की जांच में पानी में ई.कोलाई और अन्य रोगजनक बैक्टीरिया पाए गए, जो सीधे तौर पर फीकल कंटैमिनेशन का संकेत है। याचिका में यह भी उल्लेख है कि एक शौचालय का निर्माण पीने के पानी की पाइपलाइन के बेहद पास किया गया था और वर्षों से हो रहा रिसाव अंततः जल आपूर्ति प्रणाली में पहुंच गया।
गांधीनगर की घटना में जनवरी 2026 के दौरान 70 से अधिक टाइफाइड के मामलों की पुष्टि हुई। याचिका के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग ने माना कि बीमारी का पैटर्न पानी से फैलने वाले संक्रमण जैसा है। कई इलाकों में पानी मटमैला और बदबूदार पाया गया। हालात इतने गंभीर हो गए कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगनी पड़ी। दाखिल एप्लीकेशन में कहा गया है कि यह घटना बताती है कि योजनाबद्ध राजधानी शहर भी सुरक्षित नहीं हैं, यदि पानी और सीवर की पाइपलाइनें एक-दूसरे के बेहद करीब हों और नियमित निगरानी न हो।
पुणे और बेंगलुरु के मामलों में भी यही तस्वीर सामने आती है। पुणे के बावधन और भुसारी कॉलोनी में अक्टूबर 2025 में तीव्र आंत्रशोथ के मामलों की जांच में जल स्रोतों में फीकल कंटैमिनेशन के संकेत मिले। बेंगलुरु के लिंगराजपुरम इलाके में जनवरी 2026 में घरों के संप और टंकियों में सीवर की गाद और झाग तक पाया गया, जिसके बाद जल बोर्ड को सप्लाई रोककर पुरानी कास्ट आयरन पाइपलाइन बदलनी पड़ी।
याचिका में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की भूजल रिपोर्ट, 2024 की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट और राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश के कई शहरी इलाकों में भूजल और पाइप्ड सप्लाई दोनों फीकल और रासायनिक प्रदूषण के खतरे में हैं।
याचिका के मुताबिक, बीआईएस आईएस 10500 मानक के अनुसार 100 एमएल पानी में ई.कोलाई की मौजूदगी शून्य होनी चाहिए, जबकि इन घटनाओं में यही बुनियादी शर्त टूटती दिखती है।
याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल से मांग की है कि वह केवल तात्कालिक मरम्मत तक सीमित न रहकर देशभर में जल और सीवर नेटवर्क का जीआईएस आधारित ऑडिट, उपभोक्ता स्तर पर नियमित माइक्रोबायोलॉजिकल जांच, पाइपलाइन बदलने की समयबद्ध योजना, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान और पर्यावरणीय मुआवजे जैसे निर्देश दे।
याचिका का कहना है कि जब तक शहरी जल आपूर्ति को सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा मानकर संरचनात्मक सुधार नहीं किए जाएंगे, तब तक दूषित पानी से फैलने वाली बीमारियां देश के शहरों में एक बार-बार लौटने वाला संकट बनी रहेंगी।