इलेक्ट्रोकोएगुलेशन प्रणाली, फोटो : आईआईटी, गुवाहटी 
जल

आईआईटी गुवाहटी ने बनाई कम लागत में भूजल से 99 फीसदी आर्सेनिक हटाने की तकनीक 

प्रयोगशाला स्तर तक मिली सफलता में नई इलेक्ट्रोकोएगुलेशन प्रणाली कुछ ही मिनटों में उपचार करने में सक्षम होगी। प्रति 1,000 लीटर के फिल्टरेशन की लागत लगभग 8 से 9 रुपये हो सकती है

Vivek Mishra

पीने वाले पानी में भारी धातु के की तरह खतरनाक आर्सेनिक की मौजूदगी देशव्यापी एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरी है। आज के वक्त में पानी से विषैले आर्सेनिक की अशुद्धि हटाना एक जटिल और महंगा काम है। हालांकि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक उम्मीद की किरण दिखाई है। आईआईटी गुवाहटी ने भूजल में मौजूद आर्सेनिक को 99 प्रतिशत तक हटाने में सक्षम एक कम-लागत प्रणाली विकसित की है। यह प्रणाली इलेक्ट्रोकोएगुलेशन (ईसी) तकनीक पर आधारित है और कुछ ही मिनटों में दूषित पानी का उपचार कर सकती है, जिससे यह सीमित बुनियादी ढांचे वाले क्षेत्रों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।

तेजी से औद्योगिकीकरण और शहरी विस्तार के कारण दुनिया भर में भूजल पर निर्भरता बढ़ी है। कई क्षेत्रों में भूजल में आर्सेनिक प्राकृतिक चट्टानों से घुलकर या खनन और कृषि जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण पहुंचता है। आर्सेनिक के लंबे समय तक संपर्क से अंगों को नुकसान, त्वचा संबंधी रोग और कैंसर जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। वैश्विक स्तर पर लगभग 14 करोड़ लोग असुरक्षित स्तर के आर्सेनिक के संपर्क में हैं, जिनमें भारत, बांग्लादेश और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्से सबसे अधिक प्रभावित हैं।

आर्सेनिक हटाने के लिए कई पारंपरिक तकनीकें विकसित की गई हैं लेकिन इनमें अक्सर रसायनों का उपयोग, लंबा उपचार समय और जटिल उपकरण शामिल होते हैं। इन प्रणालियों को स्थल पर संचालित करना कठिन हो सकता है और उपचार के दौरान बड़ी मात्रा में कीचड़ (स्लज) उत्पन्न होता है, जिससे निपटान की लागत और ऊर्जा खपत बढ़ जाती है।

नई तकनीक

इलेक्ट्रोकोएगुलेशन तकनीक में बाहरी रसायन मिलाने के बजाय पानी में डाले गए इलेक्ट्रोड के माध्यम से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है। इससे धातु आयन निकलते हैं, जो आर्सेनिक और अन्य प्रदूषकों से जुड़कर उन्हें गुच्छों (फ्लॉक) में बदल देते हैं। ये फ्लॉक तलछट के रूप में नीचे बैठ जाते हैं या सतह पर तैरकर अलग किए जा सकते हैं।

परंपरागत ईसी प्रणालियों में स्थिर (स्टेशनरी) इलेक्ट्रोड का उपयोग होता है, जिससे समय के साथ इलेक्ट्रोड की सतह पर जमाव बन जाता है और दक्षता घटती है।

आईआईटी गुवाहाटी की टीम ने, डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर मिहिर कुमार पुरकैत की अगुवाई में एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जिसमें घूमने वाला एनोड (रोटेटिंग एनोड) और स्थिर कैथोड लगाया गया है। प्रो. पुरकैत के अनुसार, “इलेक्ट्रोकोएगुलेशन को घूमने वाले इलेक्ट्रोड सिस्टम के साथ मिलाकर आर्सेनिक-प्रदूषित जल के लिए एक प्रभावी समाधान विकसित किया गया है। नियंत्रित विद्युत धारा के माध्यम से लोहे का सैक्रिफिशियल इलेक्ट्रोड घुलता है और उसका घूमना मिश्रण और द्रव्यमान अंतरण को बढ़ाता है, जिससे लोहे के कोएगुलेंट का समान रूप से निर्माण होता है, जो पानी में मौजूद आर्सेनिक से प्रभावी रूप से जुड़ जाता है।”

प्रक्रिया के दौरान बनने वाले सूक्ष्म गैस बुलबुले आर्सेनिक युक्त फ्लॉक से चिपककर उन्हें सतह तक ले आते हैं, जिससे अलग करना आसान हो जाता है। उनका कहना है कि घूमने वाले लोहे के इलेक्ट्रोड के उपयोग से हटाने की दक्षता बढ़ती है और परिचालन लागत कम रहती है।

आईआईटी गुवाहटी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, प्रयोगशाला परीक्षणों में, कृत्रिम पानी और वास्तविक भूजल दोनों पर इस प्रणाली का परीक्षण किया गया। परिणामों के अनुसार एक घन मीटर (1,000 लीटर) दूषित पानी के उपचार में लगभग 0.36 यूनिट बिजली की खपत हुई। मौजूदा बिजली दरों पर यह लागत लगभग 8 से 9 रुपये प्रति 1,000 लीटर बैठती है। वहीं, अनुकूल परिस्थितियों में आर्सेनिक का स्तर दो से तीन मिनट के भीतर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर की सीमा से काफी नीचे लाया गया। पारंपरिक ईसी प्रणालियों की तुलना में कम स्लज उत्पन्न हुआ और उसका जमाव तथा प्रबंधन भी अपेक्षाकृत आसान पाया गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक मेम्ब्रेन और एडसॉर्प्शन आधारित प्रणालियों की तुलना में किफायती विकल्प हो सकती है। 10–50 किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता वाले सामुदायिक संयंत्र के लिए ईसी प्रणाली की अनुमानित लागत 8 से 15 लाख रुपये है, जबकि पारंपरिक प्रणाली 12 से 20 लाख रुपये तक हो सकती है। 

100–500 किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता पर ईसी प्रणाली की लागत 30 से 80 लाख रुपये है, जबकि रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) आधारित प्रणालियां 1 से 2 करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच सकती हैं।

परिचालन स्तर पर, ईसी प्रणाली में महंगे मेम्ब्रेन या बार-बार रसायन मिलाने की जरूरत नहीं होती। रखरखाव मुख्यतः इलेक्ट्रोड बदलने तक सीमित है, जबकि मेम्ब्रेन प्रणालियों में फाउलिंग, मेम्ब्रेन प्रतिस्थापन और अधिक ऊर्जा खपत जैसी चुनौतियां रहती हैं।

आईआईटी गुवाहटी के शोधार्थी

यह तकनीक विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जा रही है, जहां लागत, मजबूती और संचालन की सरलता अहम होती है। इस अध्ययन के निष्कर्ष सेपरेशन एंड प्यूरीफिकेशन टेक्नोलॉजी जर्नल  में प्रकाशित हुए हैं। इस शोध पत्र के सह-लेखक प्रो. मिहिर कुमार पुरकैत और उनके शोधार्थी मुकेश भारती हैं।

आईआईटी ने कहा है कि अगले चरण में टीम इस प्रणाली का वास्तविक क्षेत्रीय परिस्थितियों में परीक्षण करेगी और फ्लोराइड तथा आयरन जैसे अन्य प्रदूषकों की उपस्थिति में दीर्घकालिक प्रदर्शन का आकलन करेगी। आईआईटी गुवाहाटी की टीम असम के शिवसागर स्थित एम/एस काकाती इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के साथ प्रणाली के निर्माण और स्थापना को लेकर बातचीत कर रही है। उपयुक्त वित्तीय स्रोत मिलने के बाद इसके व्यावसायीकरण की दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे।

हालांकि, शोधकर्ता ने यह स्पष्ट किया है कि यह तकनीक अभी प्रयोगशाला स्तर पर है। निष्कर्षों का आगे सत्यापन किया जाना बाकी है और इसे अभी अंतिम या व्यावसायिक रूप से तैयार समाधान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।