हिमालय को "तीसरा ध्रुव" और एशिया की जल-मीनार कहा जाता है, पर यह मीनार दरक रही है। यूनेस्को की विश्व जल विकास रिपोर्ट 2025 के अनुसार यहां के हिमनद वैश्विक औसत से तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे जल, खाद्य, ऊर्जा और आजीविका की सुरक्षा पर दीर्घकालिक संकट है। सितंबर 2026 की "समृद्ध और समुत्थानशील हिमालय" रिपोर्ट इसे और स्पष्ट करती है।
भारत की केवल 18% भूमि हिमालयी है, पर देश की 35% आपदाएँ यहीं होती हैं। सदी के मध्य तक अधिकांश हिमालयी नदी-बेसिन "पीक वॉटर" तक पहुँचेंगे, यानी हिमनद-जल अपने चरम के बाद घटने लगेगा। साथ ही हिमालय भारत के 20% से अधिक सकल घरेलू उत्पाद का आधार है, जबकि हिमालयी राज्य इसका मात्र लगभग 5% ही अपने पास रख पाते हैं। इस पृष्ठभूमि में हिमाचल की कूहलें एक जीवंत उत्तर के रूप में सामने आती हैं।
कूहल: सामुदायिक जल-अवसंरचना
कूहल खड्डों, झरनों और हिम-पिघलाव से जल मोड़कर खेतों तक पहुंचाने वाली गुरुत्व-चालित मानव निर्मित पारंपरिक नहरें हैं। चश्मा प्राकृतिक रूप से जमीन से फूटने वाला पानी का झरना या स्रोत है, जिसे अंग्रेजी में 'स्प्रिंग' कहा जाता है।
2023 के जल शक्ति मंत्रालय के जल निकायों की गणना (वाटर बॉडी सेंसस) के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में 88,017 विभिन्न प्रकार के जल निकाय दर्ज किए गए हैं। इनमें प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों प्रकार की प्रणालियां शामिल हैं, जो यहां के कई पारंपरिक जल नेटवर्कों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
ग्रामीण बुनियादी ढांचे का मूल्यांकन करने वाले एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि राज्य में सूचीबद्ध किए गए हजारों प्राकृतिक जल निकायों में से, सतही जल स्रोतों (जिनमें मुख्य रूप से समुदाय द्वारा प्रबंधित कुहल शामिल हैं) की संख्या 20,200 से अधिक है। कांगड़ा घाटी के अनुमानों के अनुसार, रिवाज़-ए-आबपाशी (1918) जैसे ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और समकालीन रिपोर्टों से पता चलता है कि केवल कांगड़ा क्षेत्र में ही लगभग 715-750 मुख्य कुहल (kuhls) और 2,100-2,500 छोटी कुहल काम कर रही थीं। ये कुहल मिलकर हज़ारों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई करती हैं।
ऊपरी चिनाब बेसिन (लाहौल) के अध्ययन में पाया गया कि 2,800 से 3,600 मीटर की ऊंचाई पर पत्थर और झाड़ियों से बने बांध जल को 2 से 15 किमी लंबी मुख्य कूहल में पहुंचाते हैं। एक कूहल से औसतन 6 से 30 किसान जुड़ते हैं और लगभग 20 हेक्टेयर सिंचाई होती है। जब सरकारी योजनाओं में आंशिक सीमेंट-अस्तर लगाया गया, तो जिस्पा और सिस्सू जैसे गाँवों में जल-क्षति 35–38% से घटकर 20–22% रह गई। यह परंपरा और आधुनिक तकनीक के मेल का उदाहरण है।
शासन की पाठशाला
कूहल की असली शक्ति उसका सामुदायिक शासन है। कोहली सिंचाई का संयोजन करता है और नीर-पंच की समिति निगरानी व विवाद-निपटारा करती है। वारबंदी में जोत, फसल और हिमपिघलाव के अनुसार हर परिवार को बारी मिलती है। श्रमदान न करने पर जल-अधिकार तक निलंबित हो सकता है। हिमाचल प्रदेश सहभागी सिंचाई प्रबंधन अधिनियम (2013) ने जल उपभोक्ता संघों को कानूनी मान्यता दी है।
इसके परिणाम ठोस हैं। कार्डांग गांव में दशक भर में केवल चार विवाद दर्ज हुए। गोंडला में फसल-सघनता 1990 के 120% से बढ़कर 2018 में 148% हुई और किसान-प्रबंधित सिंचाई प्रणाली (FMIS) समितियों में महिलाओं की भागीदारी लगभग शून्य से 22% तक पहुँची। जिन परिवारों ने वर्ष में 150 से अधिक दिन श्रम दिया, वहाँ 23% कम जल-विवाद पाए गए। 2010 के बादल-फटने के बाद समुदाय ने बाँध और वैकल्पिक मोड़-बिंदु स्वयं शीघ्र बना लिए, जो केंद्रीकृत व्यवस्था के लिए कठिन होता।
रिपोर्ट से जुड़ाव
"समृद्ध और समुत्थानशील हिमालय" रिपोर्ट 2026 का मूल सूत्र है कि प्राकृतिक प्रणालियों को "अवसंरचना" मानकर सुरक्षित किया जाए और समुदायों को संरक्षक बनाया जाए। रिपोर्ट के अनुसार तीस लाख से अधिक हिमालयी जलस्रोतों में से लगभग आधे सूख चुके हैं या मौसमी हो गए हैं। इसलिए वह राष्ट्रीय जलस्रोत मिशन की अनुशंसा करती है, जिसमें विज्ञान मार्गदर्शन करे और समुदाय स्रोतों की देखरेख व निगरानी करें।
इस दृष्टि से कूहलें उसी सोच की पूर्व-स्थापित मिसाल हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि स्थानीय प्रणालियाँ मौजूद हैं, पर मानकीकरण, कौशल और विश्वास के अभाव में खंडित और उपेक्षित हैं। यही स्थिति कूहलों की है। साथ ही रिपोर्ट की "हिमालयी बुद्धिमत्ता प्रणाली" की अवधारणा और शोध-पत्र में सुझाए गए आईओटी सेंसर व एआई-आधारित पूर्वानुमान बताते हैं कि तकनीक पारंपरिक ज्ञान की पूरक बन सकती है, विकल्प नहीं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप पाठ्यक्रम
रिपोर्ट युवा पीढ़ी के लिए बच्चों की सामग्री और कहानियों के माध्यम से हिमालयी समुत्थानशीलता की जन-चेतना पर बल देती है। एनईपी 2020 भी मातृभाषा-आधारित शिक्षा, अनुभवात्मक अधिगम, भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण-चेतना को प्राथमिकता देती है। इन्हीं आधारों पर कूहल-शिक्षा को चरणबद्ध जोड़ा जा सकता है:
आधारिक व प्रारंभिक स्तर: पहाड़ी बोलियों में कूहल की कथाएँ, जल-चक्र की समझ और कूहल-भ्रमण।
मध्य स्तर: विज्ञान व गणित में ढलान, प्रवाह-दर और वारबंदी-चक्र की गणना, तथा कक्षा 6 से कोडिंग के साथ सरल जल-सेंसर परियोजनाएँ।
माध्यमिक स्तर: नागरिकशास्त्र में जल उपभोक्ता संघ, पंचायती राज और 2013 का अधिनियम; भूगोल में हिमनद, पीक वॉटर और आपदा-जोखिम।
व्यावसायिक शिक्षा: पत्थर-चिनाई, नहर-मरम्मत और जलस्रोत-पुनर्जीवन का कौशल-प्रशिक्षण, जिसमें अनुभवी कोहली अतिथि-गुरु हों।
उच्च शिक्षा: भारतीय ज्ञान प्रणाली के अंतर्गत बहुविषयक पाठ्यक्रम, क्षेत्र-कार्य और सामुदायिक शोध।
शोध में बच्चों (औसत 1.46) और बुज़ुर्गों (1.93) की भागीदारी कम मिली। स्कूलों में "कूहल सफ़ाई दिवस" और बुज़ुर्गों से संवाद इस दूरी को पाट सकते हैं।
निष्कर्ष
कूहलें केवल नहरें नहीं, सहयोग, समता और पारिस्थितिक विवेक की पाठशालाएँ हैं। जब हिमालय संकट में है, तब इस ज्ञान को कक्षा तक लाना बच्चों को जलवायु-सजग, समुदाय-निष्ठ और तकनीक-सक्षम नागरिक बनाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं रिपोर्ट के शब्दों की भावना में, प्रार्थना-ध्वजों की तरह हर पक्ष की भूमिका है, और शिक्षा उन्हें जोड़ने वाली प्राणवायु बन सकती है। इस दिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में संदर्भित बदलाव की नितांत आवश्यकता है ताकि यह पाठ्यक्रम, जीवन धारा में और नीति तत्वों में न्यायसंगत रूप से निगमित हो सके। इसके प्रति जनभागीदारी, सामुदायिक जागरूकता, प्रतिबद्धता और कवायद को सुनियोजित रूप से ओर प्रगाढ़ करना होगा।