जल

नोएडा–बेंगलुरु से डाउन टू अर्थ की ग्राउंड रिपोर्ट: एआई डेटा सेंटर्स ने कैसा पैदा किया जल संकट?

भारत तेजी से डाटा सेंटर्स का वैश्विक केंद्र बनने की राह पर है। यह वो केंद्र हैं जहां सर्वर और मशीनें दिन-रात काम करके हमारी ऑनलाइन दुनिया को जिंदा रखती हैं। लेकिन एक बड़ी चिंता तेजी से उभर रही। इन मशीनों को ठंडा रखने के लिए पानी की बहुत बड़ी मात्रा चाहिए। जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का दायरा बढ़ रहा वैसे-वैसे ताकतवर कंप्यूटिंग की जरूरत बढ़ रही है। चिंता की बात यह है कि कई ऐसे डेटा सेंटर पानी की कमी वाले इलाकों में बनाए जा रहे हैं। नोएडा और बंग्लुरु से रोहिणी कृष्णमूर्ति की रिपोर्ट

Rohini Krishnamurthy

उत्तर प्रदेश में करीब 2,000 की आबादी वाले छोटे से गांव तुसियाना में दो बिल्कुल ही अलग-अलग दुनिया बसती है। गांव के प्रवेश मार्ग के पास आठ हेक्टेयर में फैला एक विशाल परिसर दिखाई देता है, जिसकी चारदीवारी ऊंची दीवारों और कंटीले तारों से घिरी है। इसकी चारदीवारी के किनारे एक चौड़ी और नई बनी सड़क पर एसयूवी गाड़ियां खड़ी हैं और पेड़ लगे हुए हैं, जो उस इलाके में समृद्धि का आभास कराती हैं। लेकिन उस जगह से एक किलोमीटर आगे बढ़ते ही यह भ्रम टूट जाता है। कंक्रीट की सड़क खत्म हो जाती है और हवा बदबूदार हो जाती है। खुले नालों से भरी, गंदे पानी से अटी गलियां दिखने लगती हैं। यह उस गांव की रोजमर्रा की सच्चाई है, जहां आज भी बुनियादी ढांचे की कमी है।

यह विशाल परिसर योट्टा डाटा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड का डाटा सेंटर पार्क है। यह मुंबई की कंपनी है, जो रियल एस्टेट क्षेत्र की बड़ी कंपनी हीरानंदानी ग्रुप से जुड़ी है। 2022 में उद्घाटन किया गया यह केंद्र गौतम बुद्ध नगर जिले के ग्रेटर नोएडा शहर में स्थित है और अभी आंशिक रूप से ही चालू है। इसके छह डाटा सेंटर्स में से केवल एक ही काम कर रहा है। योट्टा डाटा सर्विसेज इसे “उत्तर भारत का डिजिटल दुनिया का प्रवेश द्वार” बताती है, लेकिन तुसियाना के लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इससे इलाके में भविष्य में पानी की उपलब्धता पर आखिर क्या असर पड़ेगा?

तुसियाना के मजदूर सतीश चंद कहते हैं, “बीस साल पहले हमें छह से नौ मीटर की गहराई पर पानी मिल जाता था। अब 25 मीटर तक खोदना पड़ता हैं।” डाटा सेंटर में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) से जुड़ा एक बड़ा ढांचा होता है। मिसाल के तौर पर इनमें सर्वर, कंप्यूटर स्विच, स्टोरेज सिस्टम और राउटर होते हैं, जिनका उपयोग डाटा और एप्लिकेशन को संग्रहित करने व प्रोसेस करने और बांटने के लिए किया जाता है।

ई-मेल, बैंकिंग सेवाएं, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, मोबाइल ऐप, क्लाउड स्टोरेज और लगभग सभी ऑनलाइन सेवाएं डाटा सेंटर्स पर ही निर्भर रहती हैं। इन केंद्रों में कई सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट, ग्राफिकल प्रोसेसिंग यूनिट और मेमोरी चिप्स होते हैं, जो सर्वर का हिस्सा होते हैं। सर्वर द्वारा उपयोग की जाने वाली अधिकांश बिजली गर्मी में बदल जाती है, जिसे लगातार हटाना जरूरी होता है, ताकि ऑनलाइन सेवाएं धीमी न हों या बंद न हो जाएं। अधिकतर डाटा सेंटर्स ठंडा रखने के लिए पानी का उपयोग करते हैं, जो आमतौर पर भूजल या सतही जल स्रोतों से लिया जाता है। कुछ केंद्र रीसाइकल यानी उपचारित पानी का भी उपयोग करते हैं (देखें, ठंडा करने की तकनीकें,)।

योट्टा डाटा सर्विसेज की आईटी लोड क्षमता 30 मेगावाट है। लोड क्षमता से पता चलता है कि डाटा सेंटर कितने कंप्यूटिंग उपकरणों को संभाल सकता है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि पानी से ठंडा होने वाला एक मेगावाट का डाटा सेंटर साल में लगभग 2.6 करोड़ लीटर पानी खपत करता है। इस हिसाब से 30 मेगावाट की योट्टा जैसी सुविधा साल में करीब 78 करोड़ लीटर पानी उपयोग कर सकती है, जो शहरी भारत में लगभग 15,830 लोगों की घरेलू पानी की जरूरत के बराबर है। घरेलू पानी की जरूरत का यह अनुमान सरकार के मानक के हिसाब से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी की घरेलू जरूरत 135 लीटर के हिसाब से निकाला गया है।

हालांकि, योट्टा का कहना है कि वह पानी के जरिए ठंडा करने की तकनीक के बजाय हवा से ठंडा करने की तकनीक इस्तेमाल करती है, जिससे प्रणाली को ठंडा करने के लिए पानी की खपत घटकर केवल 60 लाख लीटर प्रति वर्ष रह जाती है। राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए) की वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार, इस केंद्र को सालाना 4.3 करोड़ लीटर पानी उपयोग करने की अनुमति है। वहीं, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (जीएनआईडीए) के कार्यकारी अभियंता विनोद शर्मा ने डाउन टू अर्थ को बताया, “कंपनी ने शुद्ध किए गए अतिरिक्त पानी का अनुरोध किया है।”

योट्टा के पानी के उपयोग पर नजर डालने से कई सवाल खड़े होते हैं। कंपनी द्वारा डाउन टू अर्थ को दी गई जानकारी के अनुसार, इस केंद्र को जीएनआईडीए से साल में 1.82 करोड़ लीटर शुद्ध किया हुआ पानी और 18 लाख लीटर पीने योग्य पानी मिलता है। कंपनी यह भी कहती है कि उसके सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से साल में 1.82 करोड़ लीटर रीसाइकल लायक पानी बनता है। इस तरह कुल पानी उपयोग (शुद्ध, पीने योग्य और रीसाइकल) 3.84 करोड़ लीटर प्रति वर्ष होता है। यह मात्रा उसकी तय सीमा 4.3 करोड़ लीटर प्रति वर्ष से कम है। तो फिर कंपनी ने और अधिक पानी इस्तेमाल करने की अनुमति क्यों मांगी? पानी का और किन कामों में उपयोग किया जा रहा है?

उत्तर प्रदेश में तुसियाना गांव के पास आठ हेक्टेयर में फैला हुआ योट्टा डाटा सेंटर पार्क, जिसका उद्घाटन 2022 में किया गया था

मंजूरी की प्रक्रिया

उत्तर प्रदेश में डाटा सेंटर से जुड़े प्रस्तावों को मंजूरी राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईएसी) द्वारा दिया जाती है। यह मंजूरी राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति की सिफारिशों के आधार पर होती है। यह समिति परियोजनाओं का मूल्यांकन करने की जिम्मेदार संस्था है।

15 अक्टूबर, 2020 को उत्तर प्रदेश की विशेषज्ञ समिति ने योट्टा डाटा सर्विसेज के प्रस्ताव को पर्यावरण मंजूरी देने की सिफारिश की। इसमें पानी के उपयोग की सीमा 120 किलोलीटर प्रति दिन यानी 4.3 करोड़ लीटर प्रति वर्ष तय की गई। मंजूरी की शर्तों में यह भी शामिल था कि कंपनी को केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से अनुमति लेनी होगी जो भूजल दोहन को नियंत्रित करता है। यदि सतही जल का उपयोग किया जाए तो किसी अन्य सक्षम प्राधिकरण से अनुमति लेनी होगी। उसी दिन एसईआईएए ने भी मंजूरी दे दी। इसमें यह शर्त रखी गई कि यदि परियोजना किसी अधिसूचित क्षेत्र में आती है यानी ऐसे इलाके जहां भूजल का अत्यधिक दोहन हो चुका है या स्थिति गंभीर या दबाव वाली है तो कंपनी को मीठे पानी की जरूरत अन्य कानूनी स्रोतों से पूरी करनी होगी। जब डाउन टू अर्थ ने जिले के भूजल विभाग से जानकारी मांगी तो अधिकारियों ने यह पुष्टि नहीं की कि योट्टा को भूजल निकालने की अनुमति है या नहीं। कंपनी का कहना है कि निर्माण या संचालन के किसी काम के लिए कोई बोरवेल नहीं खोदा गया है। योट्टा डाटा सर्विसेज ने अभी तक कोई पर्यावरण सामाजिक और प्रशासन से जुड़ी रिपोर्ट भी प्रकाशित नहीं की है।

बाजार की प्रमुख नियामक सिक्यूरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) की बिजनेस रिस्पांसिबिलिटी एंड सस्टेनिबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की शीर्ष 1,000 सूचीबद्ध कंपनियों के लिए ऐसी जानकारी देना कानूनी रूप से जरूरी है। योट्टा डाटा सेंटर्स एक सूचीबद्ध कंपनी नहीं है लेकिन फिर भी वह ऐसी रिपोर्ट खुद से प्रकाशित कर सकती है।

उभरता हब

डाटा सेंटर 1990 के दशक से ही मौजूद हैं। हालांकि, इंटरनेट की बढ़ती पहुंच क्लाउड कंप्यूटिंग और हाल के वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के उपयोग में तेजी के कारण अधिक कंप्यूटिंग शक्ति और डाटा भंडारण की जरूरत बढ़ गई है। इससे डाटा सेंटर्स की मांग तेजी से बढ़ी है। अमेरिका की सलाहकार कंपनी मैकिंजी एंड कंपनी के 2024 के विश्लेषण के अनुसार, 2030 तक बनने वाली नई डाटा सेंटर क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ऐसे कामों के लिए होगा जिनमें एआई का भारी उपयोग होता है। भारत भी दुनिया के सबसे आकर्षक डाटा सेंटर गंतव्यों में के रूप में उभर रहा है।

इसका कारण डाटा सेंटर को चलाने की कम लागत, सस्ता और उपलब्ध श्रम व ऐसी भौगोलिक स्थिति है, जिससे कंपनियां भारत और दक्षिण एशिया के बड़े बाजारों तक आसानी और प्रभावी ढंग से पहुंच बना सकती हैं। यूनाइटेड किंगडम की बहुराष्ट्रीय कंपनी डेलॉइट की 2025 की रिपोर्ट अटरेक्टिंग एआई डाटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट इन इंडिया के मुताबिक, भारत के टिअर वन शहरों में इस समय लगभग 150 चालू डाटा सेंटर हैं। इनकी कुल आईटी लोड क्षमता 1200 से 1300 मेगावाट है (देखें, जलसंकट क्षेत्र,)।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत एशिया प्रशांत क्षेत्र में डाटा ढांचे का एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है और 2024 से 2026 के बीच यहां क्षमता में सबसे अधिक बढ़ोतरी होने की संभावना है। यह बढ़ोतरी जापान सिंगापुर कोरिया ऑस्ट्रेलिया और हांगकांग जैसे अन्य देशों से भी अधिक हो सकती है। लेकिन भारत का बढ़ता डिजिटल ढांचा एक छिपी हुई कीमत भी लेकर आता है। वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट द्वारा प्रकाशित एक्वाडक्ट वाटर रिस्क एटलस के मुताबिक, भारत उन शीर्ष 25 देशों में शामिल है जहां हर साल पानी का अत्यधिक दबाव (वाटर स्ट्रेस) रहता है। वाटर स्ट्रेस यह बताता है कि उपलब्ध सतही और भूजल की तुलना में पानी की घरेलू, उद्योग, खेती और पशुपालन में कुल मांग कितनी है। क्योंकि डाटा सेंटर पानी की बहुत अधिक खपत करते हैं इसलिए इनकी संख्या में बढ़ोतरी देश के जल संकट को और गंभीर बना सकती है। यूनाइटेड किंगडम की गैर लाभकारी संस्था प्लेनेट ट्रैकर के 2025 के विश्लेषण में बताया गया है कि एशिया में चीन, भारत और जापान में सबसे अधिक डाटा सेंटर हैं। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में स्थित डाटा सेंटर्स की संख्या के मामले में भारत एशिया में इंडोनेशिया के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत के लगभग 50 डाटा सेंटर ऐसे क्षेत्रों में हैं जहां पानी की अत्यधिक कमी है।

डाटा सेंटर में पानी का उपयोग कई चीजों पर निर्भर करता है। जैसे स्थान, मौसम, पानी की उपलब्धता, आकार और इस्तेमाल की गई तकनीक आदि चीजें शामिल होती है। डाटा सेंटर में बढ़ोतरी के असर को समझने के लिए डाउन टू अर्थ ने दो प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी केंद्रों का दौरा किया। यह केंद्र कर्नाटक के बेंगलुरु और उत्तर प्रदेश में गौतमबुद्ध नगर में स्थित हैं। यहां देखा गया कि डाटा सेंटर कैसे पानी का उपयोग करते हैं और इसका स्थानीय समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

उत्तर प्रदेश में नोएडा के सेक्टर 62 में स्थित खोड़ा कॉलोनी का भूजलस्तर तेजी से गिर रहा है, यहां से चंद किलोमीटर दूर डाटा सेंटर बनाया जा रहा है

नीति का प्रोत्साहन

गौतमबुद्ध नगर भारत के सबसे व्यस्त डाटा सेंटर कॉरिडोर में से एक बन गया है। डेनमार्क के ऑनलाइन डाटा सेंटर मैप से मिली जानकारी के मुताबिक, अब यहां लगभग 17 चालू या निर्माणाधीन केंद्र हैं, जिनमें योट्टा डाटा सर्विसेज, सीटीआरएलएस डाटा सेंटर्स लिमिटेड, एसटी टेलीमीडिया ग्लोबल डाटा सेंटर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, अदानी कनेक्स लिमिटेड और टेलीकॉम दिग्गज एयरटेल का नक्षत्र शामिल हैं। डाटा सेंटर्स में यह बढ़त एक सोची-समझी नीतिगत प्रोत्साहन का परिणाम है। 2021 में राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश डाटा सेंटर नीति 2021 लागू किया, जो पांच साल का ढांचा है और इसका उद्देश्य 30,000 करोड़ रुपए के निवेश को आकर्षित करना और राज्य में 900 मेगावाट डाटा सेंटर उद्योग का विकास करना है। नीति का लक्ष्य कम से कम आठ निजी डाटा सेंटर पार्क स्थापित करना है, यानी बड़े परिसर जिनमें कई केंद्र होंगे।

राज्य सरकार ने ऐसी औद्योगिक परियोजनाएं बनाई हैं जिनमें डाटा सेंटर शामिल हैं और उनको तेजी से मंजूरी देने के लिए समर्पित सिंगल-विंडो क्लियरेंस सिस्टम है। इसका असर पहले ही दिखाई दे रहा है। 2023 में एसटी टेलीमीडिया ग्लोबल डाटा सेंटर्स इंडिया ने राज्य सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए और नए केंद्रों में लगभग 4,100 करोड़ रुपए का निवेश करने की योजना बनाई और नोएडा शहर को “एक आशाजनक और उभरता हुआ केंद्र” बताया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जून 2025 तक राज्य में डाटा सेंटर की कुल प्रस्तावित क्षमता 644 मेगावाट पहुंच गई है, जो 21,342.9 करोड़ रुपए के निवेश को आकर्षित करती है।

वहीं, पानी की आपूर्ति के विवरण पर अधिक स्पष्ट नीति नहीं है। इसमें केवल यह कहा गया है कि औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण जैसे नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण और ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके क्षेत्र में काम कर रहे डाटा सेंटर को सातों दिन और चौबीसों घंटे निरंतर पानी उपलब्ध हो।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिले के बिसरख ब्लॉक में भूजल स्तर पहले ही अत्यधिक दोहन वाला है, जिसमें नोएडा और अधिकांश ग्रेटर नोएडा शामिल है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट “डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेस ऑफ इंडिया 2023” के अनुसार जिले में भूजल दोहन 104.79 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि प्राकृतिक तरीके से जितना पानी जमीन के भीतर जा रहा है उससे अधिक पानी निकाला जा रहा है। खराब बात यह है कि अधिकारी जानकारी साझा करने में अनजान या असहज लगते हैं। जब डाउन टू अर्थ ने नोएडा प्राधिकरण कार्यालय का दौरा किया ताकि डाटा सेंटर के लिए पानी उपयोग अनुमति के बारे में जानकारी मिल सके तब सीईओ लोकेश एम ने रिपोर्टर को शोभा नाम की किसी व्यक्ति से बात करने के लिए कहा, जिन्होंने एक अधूरी डाटा सेंटर सूची साझा की। उन्होंने स्वीकार किया कि यह सूची पूरी नहीं है। शोभा के अलावा जनरल मैनेजर (प्लानिंग) यह पुष्टि नहीं कर सकीं कि इन केंद्रों का पानी स्रोत क्या है। हालांकि मीना ने उद्योगों के लिए स्रोत के रूप में रीसाइकिल्ड पानी का जिक्र किया। वह डाटा सेंटर के पानी उपयोग के आंकड़े भी नहीं दे सकीं, जबकि यह प्राधिकरण उनके 24 घंटे और सातों दिन पानी की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार है। ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने भी इसी तरह की प्रतिक्रिया दी।

राज्य में पेयजल और सीवरेज सुविधाओं के लिए जिम्मेदार जल निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम गुप्त रहने की शर्त पर कहा, “नोएडा प्राधिकरण कंपनियों से उनके पानी की जरूरत के विवरण के साथ अनुरोध हमें भेजता है। हम प्रति व्यक्ति गणना के आधार पर पानी उपलब्ध कराते हैं। यदि कमी होती है तो हम उद्योगों से कहते हैं कि वह अपनी जरूरतें स्वयं पूरी करें या भूजल विभाग से अनुमति लें।” उन्होंने यह भी कहा कि विभाग उद्योगों को आमतौर पर निर्माण कार्य के लिए प्रति किलोलीटर पांच रुपए में शुद्ध पानी देता है।

उत्तर प्रदेश भूजल (प्रबंधन और नियंत्रण) अधिनियम 2019 के अनुसार, अधिसूचित क्षेत्रों में बोरवेल के निर्माण पर रोक है। भूजल विभाग कार्यालय में कार्यकारी अभियंता विश्वजीत सिंह ने पुष्टि कर कि गौतमबुद्ध नगर का अधिकांश हिस्सा अधिसूचित क्षेत्र है। उन्होंने कहा, “हमारे पास जिला भूजल परिषद है, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरण विभाग के अधिकारी शामिल हैं, जो अनुमति जारी करते हैं। हम नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट केवल तभी देते हैं जब कंपनियां वचन दें कि हर एक लीटर निकाले गए पानी के लिए दो लीटर भूजल का पुनर्भरण किया जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि उद्योगों को वर्षा जल संचयन प्रणाली या तालाब बनाना होगा, फ्लो मीटर का उपयोग करना होगा और साप्ताहिक डाटा विभाग को जमा करना होगा। वह आगे कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में भूजल कोई बड़ी समस्या नहीं है। हम निकाले गए हर किलोलिटर पानी के लिए 1.2 रुपए चार्ज करते हैं।”

डाउन टू अर्थ ने राज्य के डाटा सेंटर्स की सूची सिंह को साझा की और जानकारी मांगी कि किस केंद्र को भूजल दोहन की अनुमति है और वह कितना पानी निकाल रहे हैं? लगातार फॉलो-अप के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

कौन कर रहा निगरानी

डाटा सेंटरो के जल उपयोग को लेकर सार्वजनिक रूप से पर्याप्त जानकारी की कमी एक गहरा सवाल उठाती है। पहले से कमी झेल रहे इलाकों मे इन अधिक जल खपत करने वाले उद्योगों की निगरानी कैसे हो रही है और इसके दुष्परिणाम कौन झेल रहा है। मिसाल के लिए सिफी टेक्नोलॉजीज गौतमबुद्ध नगर में दो डाटा सेंटर चलाती है। पहली सुविधा का आईटी पावर लोड 10.8 मेगावाट है जबकि दूसरी सुविधा जो केवल एक किलोमीटर दूर है उसकी कुल पावर क्षमता 130 मेगावाट से अधिक है।

मानक अनुमान के अनुसार, एक मेगावाट का डाटा सेंटर हर साल दो करोड़ 60 लाख लीटर (260 मिलियन) पानी उपयोग करता है। इस हिसाब से सिफी के दोनो सेंटर हर साल लगभग 3.64 अरब लीटर पानी उपयोग कर सकते हैं। लेकिन 5 अप्रैल 2022 को हुई एसईएसी बैठक के मुताबिक, सिफी की वार्षिक जल आवश्यकता केवल 0.059 अरब लीटर है। दस्तावेज में कूलिंग के लिए जल आवश्यकता का कोई उल्लेख नहीं है। 11 अप्रैल 2022 के एसईआईएए दस्तावेज में परियोजना को मंजूरी दी गई और यह जोड़ा गया कि यदि सुविधा अधिसूचित क्षेत्र में स्थित है तो मीठे पानी की आवश्यकता भूजल के अलावा अन्य स्रोतों से पूरी की जाएगी। व्यक्तिगत डाटा सेंटर्स के जल उपभोग को लेकर गंभीर अस्पष्टता है।

सिफी की 2023-24 की ईएसजी रिपोर्ट बताती है कि कंपनी द्वारा उपयोग किए गए जल संसाधन मुख्य रूप से नगरपालिका जल आपूर्ति प्रणाली से और कुछ भूजल दोहन से है। 2024 में भारत भर में उसके सभी डाटा सेंटरों का कुल जल उपभोग लगभग 6.13 अरब लीटर था जो शहरी भारत में 124,404 लोगों की जल आवश्यकता के बराबर है। यह जानकारी मई 2025 के आईसीआरए ईएसजी रेटिंग्स लिमिटेड के दस्तावेज में दी गई है जो आईसीआरए लिमिटेड की सहायक कंपनी और एक स्वतंत्र क्रेडिट रेटिंग एजेंसी है।

एक अन्य डाटा सेंटर अदाणी कनेकएक्स गौतमबुद्ध नगर के सेक्टर 62 में स्थापित किया जा रहा है। यह भारत के अदाणी समूह और अमेरिका स्थित एजकनेकएक्स के बीच 50:50 का संयुक्त उपक्रम है। कंपनी का मिशन 2030 तक एक पर्यावरण और सामाजिक रूप से जागरूक एक गीगावाट डाटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर प्लेटफॉर्म बनाना है। स्थल पर निर्माण कड़ी सुरक्षा में है। कंपनी के अनुसार इस सुविधा की आईटी लोड क्षमता 150 मेगावाट होगी।

अदानी कनेक्स की कोई अलग ईएसजी रिपोर्ट नहीं है। इसकी मूल कंपनी अदाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड की रिपोर्ट में डाटा सेंटर भी शामिल है लेकिन उसमें जल उपभोग पर कोई ठोस जानकारी नहीं दी गई है। अदानी कनेक्स का दावा है कि वह अधिक जल खपत वाली वाटर कूल्ड प्रणालियों के बजाय एयर कूल्ड चिलर का उपयोग करती है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय रिवरसाइड के इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग के सह प्राध्यापक शाओलेई रेन ने डाउन टू अर्थ को बताया कि यदि डाटा सेंटर एयर कूलर का उपयोग करता है तो वह अधिक पानी उपयोग नहीं करता, हालांकि उसकी ऊर्जा खपत बढ़ जाती है। ये एयर कूलर परोक्ष रूप से पानी उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए एक किलोवाट घंटा थर्मोइलेक्ट्रिसिटी या जलविद्युत उत्पन्न करने में क्रमश 0.18 से 2 लीटर या 0.67 से 1.19 लीटर पानी की खपत हो सकती है। यह जानकारी 2024 में जर्नल रिसोर्सेज, कंजरवेशन एंड रीसाइक्लिंग में प्रकाशित अध्ययन मे दी गई है।

डाउन टू अर्थ ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत नोएडा ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण और गौतमबुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट को भी आवेदन भेजे। इनमें व्यक्तिगत डाटा सेंटरों के जल उपभोग जल के स्रोत और भूजल दोहन की अनुमति प्राप्त डाटा सेंटरों की संख्या के बारे मे पूछा गया। रिपोर्ट प्रकाशित होने तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ।

प्रमुख क्लस्टर

बंग्लुरु एक प्रमुख आईटी हब है और इसका हाल भी ग्रेटर नोएडा जैसा है। बंग्लुरू में डाटा सेंटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। बंग्लुरू ग्रामीण जिले के देवनहल्ली तालुका के अक्कलेनहल्ली मल्लेनहल्ली गांव का उदाहरण लेते हैं, जहां लगभग 250 लोग रहते हैं। गांव मे रियल एस्टेट मे तेज उछाल देखा जा रहा है जहां बिरला गोदरेज और टाटा जैसी कंपनियां आवासीय परिसरों का निर्माण कर रही हैं। गांव के निवासी और रियल एस्टेट कारोबारी वेणुगोपाल कहते हैं कि पिछले पांच सालों में संपत्ति के दाम दोगुने हो गए हैं। संभावित खरीदार और निर्माण मजदूर आमतौर पर दिखाई देते हैं लेकिन एक नए डाटा सेंटर का आना उतना स्पष्ट नहीं है। कर्नाटक सरकार ने चेन्नई स्थित आईजी3 इंफ्रा लिमिटेड की सहायक कंपनी ईटीएल सिक्योर स्पेस लिमिटेड के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी है। यह कंपनी सुरक्षित व्यावसायिक अवसंरचना का विकास और प्रबंधन करती है। 5 फरवरी 2024 के सरकारी आदेश के मुताबिक, यह कंपनी गांव मे 490.5 करोड़ रुपए के निवेश से डाटा सेंटर सुविधा स्थापित करेगी। आदेश के अनुसार कंपनी को या तो केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से या कर्नाटक के वन पारिस्थितिकी और पर्यावरण विभाग से पर्यावरण स्वीकृति प्राप्त करनी होगी।

डाउन टू अर्थ यह पुष्टि नहीं कर सका कि डाटा सेंटर का निर्माण शुरू हुआ है या नहीं क्योंकि इलाके में निर्माण गतिविधि बहुत अधिक हैं। जिन गांववालों से बातचीत की गई उनमें से किसी को भी यह नहीं पता था कि डाटा सेंटर क्या होता है। फिलहाल वे ज्यादा तात्कालिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, जैसे जमीन और पानी तक बुनियादी पहुंच और यह डर कि नए डाटा सेंटर और आवासीय परियोजनाएं उनकी परेशानी को कहीं और अधिक तो नहीं बढ़ा देंगी। वेल्डर लगुमाया कहते हैं कि हमारे पास भूजल नहीं है और हर सुबह हम पास के गांव के बोरवेल से पानी लाते हैं।

अब सवाल यह है कि क्या इलाके में पर्याप्त पानी होगा। सरकारी आदेश के अनुसार ईटीएल सिक्योर स्पेस को सालाना 23.75 करोड़ लीटर से कुछ अधिक पानी आवंटित किया गया है जो लगभग 5,000 लोगों की वार्षिक पेय और घरेलू जल आवश्यकता के बराबर है। यह आपूर्ति शायद अन्नेश्वर ग्राम पंचायत से आएगी जो अक्कलेनहल्ली मल्लेनहल्ली सहित 11 गांवों को बोरवेल का पानी देती है। आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कंपनी के पास भूजल दोहन की अनुमति है या नहीं।

बंग्लुरु जो नियमित रूप से जल संकट का सामना करता है दो मुख्य जल स्रोतों पर निर्भर है- भूजल और कावेरी नदी जिस का पानी लगभग 100 किलोमीटर दूर से शहर तक पंप किया जाता है। पूरे बंग्लुरु क्षेत्र को आधिकारिक रूप से अतिदोहन श्रेणी में रखा गया है। यह वर्गीकरण तब लागू होता है जब भूजल दोहन वार्षिक पुनर्भरण के 100 प्रतिशत से अधिक हो जाता है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि डाटा सेंटरों का अनियंत्रित विस्तार पहले से जल की कमी झेल रहे शहर पर पर्यावरणीय दबाव और बढ़ा सकता है। यह और खतरनाक हो सकता है क्योंकि 2024 की गर्मियों मे बंग्लुरू बेहाल हो गया था।

अर्थ नामक नागरिक पहल आधारित थिंक टैंक की पूर्णकालिक शोधकर्ता खुशबू बिरावत डाउन टू अर्थ से कहती हैं कि मुझे नहीं लगता कि बंग्लुरू में नए डाटा सेंटर या किसी भी जल गहन उद्योग का आना समझदारी है। वह पूछती हैं कि अगर देवनहल्ली मे ऐसे 10 संयंत्र बनते हैं तो हम कैसे सुनिश्चित करेंगे कि वह एक्विफर को और खत्म नहीं करेंगे।

बंग्लुरू के उत्तरी बाहरी इलाके में स्थित देवनहल्ली शहर के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक है, जहां सॉफ्टवेयर हार्डवेयर वित्तीय सेवाएं एयरोस्पेस हब और अब डाटा सेंटर भी तेजी से बढ़ रहे हैं। डाउन टू अर्थ द्वारा कर्नाटक की राज्य उच्च स्तरीय स्वीकृति समिति (एसएचएलसीसी) और राज्य स्तरीय सिंगल विंडो क्लीयरेंस कमिटी (एसएलएसडब्ल्यूसीसी) की बैठक की समीक्षा से पता चलता है कि 2013 से 2025 के बीच देवनहल्ली में कम से कम आठ डाटा सेंटरों को मंजूरी दी गई है। लेकिन इलाके की जल स्थिति बेहद गंभीर है।

देवनहल्ली के पास कोई स्थायी जल स्रोत नहीं है और यह पूरी तरह भूजल पर निर्भर है। भूजल दोहन की अवस्था या वार्षिक दोहन योग्य संसाधनों के सापेक्ष उपयोग का प्रतिशत 169 प्रतिशत है जो अनुमेय सीमा से 69 अंक अधिक है। कर्नाटक भूजल विभाग और केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा प्रकाशित कर्नाटक 2024 की गतिशील भूजल संसाधन रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरे बंग्लुरू ग्रामीण जिले में सबसे अधिक है जिसमें देवनहल्ली डोड्डबल्लापुर होस्कोट और नेलमंगला शामिल है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि भविष्य के उपयोग के लिए कोई शुद्ध भूजल उपलब्ध नहीं है।

जहां देवनहल्ली तेजी से एक हॉटस्पॉट बन रहा है, वहीं बंग्लुरू शहरी जिले का व्हाइटफील्ड पहले से ही एक घना डाटा सेंटर हब है। डाटा सेंटर मैप के अनुसार, व्हाइटफील्ड बेंगलुरु के 30 डाटा सेंटरों में से छह की मेजबानी करता है। यह 5,500 से अधिक आईटी कंपनियों का भी घर है जिनमें कई वैश्विक क्लाउड और इंटरनेट दिग्गज शामिल हैं। व्हाइटफील्ड में पांच दशक से अधिक समय से रह रहे छोटे व्यवसायी अशोक कहते हैं कि पिछले 10 सालों मे जल संकट नाटकीय रूप से बढ़ा है। वह कहते हैं कि पांच साल पहले बोरवेल का पानी खत्म हो गया और 6,000 मीटर की गहराई पर भी खासकर गर्मियों मे पानी नहीं मिलता। हमें कावेरी से हफ्ते में केवल एक बार पानी मिलता है जो बहुत कम है। कमी पूरी करने के लिए अशोक हर महीने दो से तीन निजी टैंकर मंगवाते हैं।

इसी इलाके में जन्मे और पले बढ़े लक्ष्मण कुमार 100 घरों वाले शैंडर्स स्प्रिंगडेल अपार्टमेंट परिसर का प्रबंधन करते हैं। वह कहते हैं कि बोरवेल सूख चुके हैं और हमें हर दिन चार या पांच टैंकर चाहिए, जिनकी कीमत 1,600 रुपए प्रति टैंकर है। दोनों निवासियों को यह नहीं पता था कि डाटा सेंटर क्या होता है या यह कि पास ही आयरन माउंटेन नाम का 7,000 वर्ग मीटर का डाटा सेंटर संचालित हो रहा है। हालांकि दोनों को इमारत दिखने की एक धुंधली याद है।

सरकारी उदासीनता

उत्तर प्रदेश की तरह कर्नाटक के पास भी डाटा सेंटर पॉलिसी 2022 है, जिसका उद्देश्य राज्य को भविष्य की डाटा अवसंचना के लिए “पसंदीदा गंतव्य” के रूप मे स्थापित करना है। इस नीति के तहत 2027 तक घरेलू और विदेशी निवेश लगभग 100,00 करोड़ रुपए का लक्ष्य है और 2025 तक 200 मेगावाट से अधिक डाटा केंद्र क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इस नीति को इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी और बायोटेक्नोलॉजी विभाग के तहत कर्नाटक इनोवेशन एंड टेकनोलॉजी सोसाइटी (केआईटीएस) लागू करती है।

नीति में अनुमति प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम शुरू किया गया है, जिसे वाणिज्य और उद्योग विभाग के तहत कर्नाटक उद्योग मित्र प्रबंधित करता है। जब कोई कंपनी डाटा सेंटर स्थापित करने के लिए आवेदन करती है, तो उसके प्रस्ताव की समीक्षा एसएलएसडब्ल्यूसीसी या एसएचएलसीसी द्वारा की जाती है, इसके बाद पर्यावरण मंजूरी होती है। इसके बाद केआईटीएस पंजीकरण या अस्थायी पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी करता है। उत्तर प्रदेश की तरह इस नीति दस्तावेज में भी कहा गया है कि राज्य 24 घंटे और सातों दिन बिना रुकावट पानी की आपूर्ति देगा। हालांकि योट्टा डाटा सर्विसेज इस धारणा से असहमति जताती है कि राज्य की नीतियां ताजा पानी के असीमित उपयोग की अनुमति देती हैं।

कंपनी डाउन टू अर्थ से कहती है, “यह मान्यता गलत है कि राज्य की नीतियां डाटा सेंटर्स को ताजा पानी तक असीमित पहुंच देती हैं। कर्नाटक की नीति एयर कूल्ड, हाइब्रिड और क्लोज्ड लूप सिस्टम को प्राथमिकता देती है, जिससे पानी पर निर्भरता कम होती है।” कंपनी आगे दावा करती है कि कर्नाटक में स्पष्ट प्रावधान हैं जिनके तहत डाटा सेंटर्स को शुद्ध लेकिन पीने योग्य न होने वाला पानी उपयोग करना होता है, साइट पर रीसाइक्लिंग सिस्टम बनाना होता है और पीने के पानी के भंडार से पानी नहीं लेना होता। हालांकि यह दावा नीति के वास्तविक पाठ से पुष्ट नहीं होता।

वर्ष 1964 के बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड अधिनियम के तहत बना एक स्वायत्त निकाय बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड (बीडब्ल्यूएसएसबी) के अध्यक्ष राम प्रसाद मनोहर वी डाउन टू अर्थ से कहते हैं कि राज्य मे डाटा सेंटर्स के लिए रीसाइकल पानी उपयोग करने का कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है। वाटर सेविंग अनिवार्यताओं को लेकर जानकारियों में बड़ी कमियां हैं। अगस्त 2025 में डाउन टू अर्थ ने केआईटीएस के सीईओ राहुल शरणप्पा संकनूर से मुलाकात की, जिन्होंने नीति की बारीक जानकारी न होने की बात कही। सवालों का कोई जवाब न मिलने पर रिपोर्टर को सलाहकार के पास भेज दिया जबकि किसी सरकारी अधिकारी ने भी यह नहीं कहा कि पानी खपत में एयर-कूल्ड, हाइब्रिड और क्लोज्ड लूप सिस्टम को प्राथमिकता दी जाती है।

अनुमति प्रक्रिया

कर्नाटक में जब डाटा सेंटर डेवलपर परियोजना अनुमति के लिए आवेदन करते हैं तो उन्हें प्रस्तावित जल स्रोत बताना होता है। चाहे वह बीडब्ल्यूएसएसबी, कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरियाज डेवलपमेंट बोर्ड (केआईएडीबी), नगरपालिका निकाय या निजी व्यवस्था जैसे बोरवेल ही क्यों न हों। 15 करोड़ से 500 करोड़ रुपए तक की परियोजनाओं का मूल्यांकन एसएलएसडब्ल्यूसीसी करता है, जबकि इससे बड़ी परियोजनाएं एसएचएलसीसी के पास जाती हैं। हालांकि डाउन टू अर्थ द्वारा देखे गए एसएसएसडब्ल्यूसीसी और एसएचएलसीसी बैठकों की रिपोर्ट में स्वीकृत जल स्रोतों के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती।

कर्नाटक उद्योग मित्र की वेबसाइट पर 2013 से 2025 के बीच हुई सरकारी बैठकों की रिपोर्ट और बीडब्ल्यूएसएसबी के आंकड़ों के आधार पर बंग्लुरु के डाटा सेंटर (रामनगर सहित) को मिलाकर लगभग 81.29 करोड़ लीटर प्रति वर्ष पानी उपयोग की अनुमति है (देखें, पानी के खपत का पैटर्न, पेज 46)। हालांकि यह केवल एक अनुमान है, क्योंकि सभी सुविधाओं के वास्तविक उपयोग का समग्र डाटा उपलब्ध नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को लंबित विधेयक के अनुसार, भूजल दोहन की सख्त निगरानी और मीटरिंग करनी चाहिए और एक्विफर रिचार्ज में निवेश करना चाहिए। पानी अर्थ के बिरावत कहते हैं, “हमारे पास अच्छे कानून हैं। सवाल उनके पालन का है। बंग्लुरु का भूगोल ही ज्यादा पानी खपत वाले उद्योगों के लिए उपयुक्त नहीं है।”

कॉरपोरेट गोपनीयता

भारत के शीर्ष डाटा सेंटर संचालकों की एनवायरमेंट, सोशल और गर्वनेंस (ईएसजी) रिपोर्ट की समीक्षा से एक चिंताजनक रुझान सामने आता है। इन कंपनियों में पानी के उपयोग की रिपोर्टिंग में पारदर्शिता की व्यापक कमी है। कंपनियों की ईएसजी रिपोर्ट दो मुख्य शब्दों- जल उपभोग और जल निकासी का उपयोग करती है। उपभोग का अर्थ है संचालन के दौरान नष्ट हुआ पानी, जो आमतौर पर कूलिंग सिस्टम में वाष्पीकरण से होता है। वहीं जल निकासी का मतलब है प्राकृतिक या नगर स्रोतों से लिया गया पानी जैसे सतही जल, भूमिगत जल, पुनः उपयोग किया गया या शुद्ध पेय जल, जिसे बाद में वापस भी किया जा सकता है।

दूरसंचार कंपनी एयरटेल की एनएक्सट्रा आठ भारतीय शहरों में 15 हाइपरस्केल डाटा सेंटर संचालित करती है। अपनी 2025 की ईएसजी रिपोर्ट में कंपनी ने कुल जल उपभोग 216.36 मिलियन लीटर बताया। इसमें 9.876 मिलियन लीटर भूमिगत जल से लिया गया और 191.15 मिलियन लीटर तीसरे पक्ष के स्रोतों से खरीदा गया, जबकि सतही जल के उपयोग की कोई रिपोर्ट नहीं दी गई। हालांकि एनएक्सट्रा ने 2023 या 2024 के लिए उपभोग के आंकड़े जारी नहीं किए। इससे एक महत्वपूर्ण कमी रह जाती है और समय के साथ पानी के उपयोग में बदलाव या वृद्धि का आकलन करना असंभव हो जाता है।

अडानीकनेक्स की कोई अलग ईएसजी रिपोर्ट नहीं है। इसकी मूल कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड अपनी सभी व्यावसायिक गतिविधियों जैसे खनन, हवाई अड्डे, सोलर निर्माण, पवन ऊर्जा, तांबा, सड़क, डाटा सेंटर, रक्षा और डिजिटल प्रयोगशालाओं में कुल जल निकासी की रिपोर्ट देती है। 2025 में यह आंकड़ा 439 करोड़ लीटर था, जो 2022 की तुलना में 59 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट यह नहीं बताती कि इसमें से कितना पानी डाटा सेंटर के लिए उपयोग हुआ, जबकि 2022 वही वर्ष था जब अडानीकनेक्ट ने चेन्नई में संचालन शुरू किया। एसटी टेलीमीडिया ग्लोबल डाटा सेंटर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जो सिंगापुर स्थित एसटी टेलीमीडिया ग्लोबल डाटा सेंटर्स की सहायक कंपनी है, भारत में 30 सुविधाएं संचालित करती है। इसकी 2024 की ईएसजी रिपोर्ट में कुल जल निकासी 114.9 करोड़ लीटर दिखाई गई है, जो 2023 के 105.9 करोड़ लीटर से 8.5 प्रतिशत अधिक है।

2024 के देशवार आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन 2023 की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत से 41.92 करोड़ लीटर पानी निकाला गया, जो इसके वैश्विक कुल का 40 प्रतिशत था और पिछले वर्ष से 17 प्रतिशत अधिक था। इंग्लैंड में मुख्यालय वाली एनटीटी इंक अमेरिका, एशिया प्रशांत, यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और भारत सहित 20 देशो और क्षेत्रों में काम करती है, जहां इसके 15 केंद्र हैं। इसकी 2024 की स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने 2023 में 41.38 करोड़ लीटर पानी निकाला और उसमें से 20.33 करोड़ लीटर का उपभोग किया। हालांकि 2025 की रिपोर्ट में जल निकासी या उपभोग का कोई उल्लेख नहीं है। इससे कंपनी की पारदर्शिता और वर्ष दर वर्ष रिपोर्टिंग की निरंतरता पर सवाल उठते हैं।

सिफी टेक्नोलॉजीज, जो देश में लगभग 200 मेगावाट की संयुक्त आईटी क्षमता वाले 14 एआई रेडी डाटा सेंटर संचालित करती है, ने 2023 24 में 613.232 करोड़ लीटर जल निकासी की रिपोर्ट दी, जो पिछले वर्ष से पांच प्रतिशत अधिक थी। इसकी 2024-25 की रिपोर्ट में यह आंकड़ा तेज गिरावट के साथ 30.692 करोड़ लीटर दिखाया गया। भारत आधारित संचालक कंट्रोलएस ने 2023-24 में 40.904 करोड़ लीटर जल उपभोग की रिपोर्ट दी, जो पिछले वर्ष के 46.833 करोड़ लीटर से कम थी। इन रिपोर्टों में से कोई भी डाटा सेंटर स्तर के विवरण नहीं देती। एसटी टेलीमीडिया ग्लोबल डाटा सेंटर्स की 2024 रिपोर्ट को छोड़कर कोई भी वैश्विक संचालक देश स्तर के आंकडे साझा नहीं करता। इस बीच जिन इलाकों में डाटा सेंटर स्थित हैं, वहां के निवासियों के लिए कूलिंग तकनीक और जल संतुलन पहलों पर बहस अलग ही लगती है। तुसियाना में एक सेवानिवृत्त निवासी रत्तू सिंह इसे सरल शब्दों में कहते हैं, अगर कल हमारे गांव में पानी नहीं होगा तो हम क्या करेंगे। सरकार को हमारे बारे में भी सोचना चाहिए।

(डाउन टू अर्थ की यह रिपोर्ट इंटरन्यूज अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के सहयोग से तैयार की गई है)