जली करंज के रास्ते में बने वायु कूपक। दाएं: आजकल लोग कूपकों को ही कुएं की तरह प्रयोग करने लगे हैं, जिनके नीचे सालभर साफ पानी बहता ही रहता है। (फ़ोटो : गणेश पंगारे/सीएसई)
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बुरहानपुर की सदियों पुरानी जल सुरंगें: मुगलकालीन भूजल प्रबंधन से क्या सीखें हम?

उस समय न तो भारी-भरकम डिग्रियों वाले इंजीनियर थे और न ही बड़ी-बड़ी मशीनें। लेकिन उस दौर का समाज पानी, मौसम और मिट्टी के मिजाज को बखूबी समझता था। तभी साढ़े तीन सौ साल पहले विकसित की गई जल वितरण प्रणाली आज भी काम कर रही है। इसमें अगर कहीं व्यवधान है भी तो वह आधुनिक समाज की देन है न कि उस जल प्रबंधन की कोई खामी

DTE Staff

बुरहानपुर ताप्ती नदी के किनारे बसा मध्य प्रदेश का एक जिला मुख्यालय है। यहां की प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली मुगलिया सल्तनत की स्थापत्य कला का शानदार नमूना है। चूंकि यह एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक केंद्र के साथ ही मुगल साम्राज्य का सीमावर्ती इलाका था, इसलिए यहां की छावनी में दो लाख से ज्यादा फौजी रहा करते थेे।

उस समय शहर में आम लोगों की आबादी करीब 35,000 रही होगी। फिर ऐसे छोटे शहर को, जो ताप्ती जैसी नदी के किनारे था, इतने विशाल जल प्रबंधन की जरूरत क्यों पड़ गई? इसका कारण यह था कि ताप्ती अनेक ऐसे राज्यों से होकर आती थी, जहां अलग-अलग शासकांे का राज था। तभी इस बात का ख़तरा बना रहता था कि युद्ध में दुश्मनी के समय जाने कौन इसके पानी में जहर मिला दे। ऐसे में सिर्फ ताप्ती के पानी पर निर्भर रहने का अर्थ अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना था। मुगल शासनकाल में ही अब्दुल रहीम खान को भूजल पर आधारित एक योजना का कार्य सौंपा गया। वर्ष 1615 में फारसी भूतत्ववेत्ता तबक़ुतुल अर्ज़ ने ताप्ती के मैदानी इलाके, जो सतपुड़ा पहाड़ियों के बीच स्थित हैं, के भूजल स्रोतों का अध्ययन किया और शहर में जलापूर्ति के लिए भूमिगत सुरंगें बिछाने का इंतज़ाम किया।

ऐसी कुल आठ प्रणालियां अलग-अलग समय में तैयार की गईं। इनमें से दो तो काफी पहले बर्बाद हो चुकी हैं। शेष बची छह प्रणालियों में से तीन आज भी बुरहानपुर शहर को पानी मुहैया करवा रही हैं। अन्य तीन का पानी पास के बहादुरपुर गांव और राव रतन महल को जाता है। बुरहानपुर में अपनाई गई तकनीक मूलत: सतपुड़ा पहाड़ियों से भूमिगत रास्ते से ताप्ती तक जाने वाले पानी को जमा करने की थी। बुरहानपुर शहर से उत्तर-पश्चिम में चार जगहों पर इस पानी को रोकने का इंतज़ाम किया गया था। इनका नाम था मूल भंडारा, सुख भंडारा, चिंताहरण भंडारा और खूनी भंडारा।

इनसे पानी जमीन के अंदर बनी सुरंगों से भूमिगत भंडार, जिसे ‘जली करंज’ कहते हैं, में जमा होता है और फिर वहां से यह शहर तक पहुंचता है। मूल भंडारा और चिंताहरण का पानी बीच में एक जगह मिलता है और फिर खूनी भंडारा की तरफ बढ़ जाता है। खूनी भंडारा से आने वाला पानी जली करंज में जाता है। खूनी भंडारा से आने वाला पानी जब जली करंज में आए, इससे ठीक पहले सुख भंडारा का पानी भी उससे आकर मिलता है। मुगलकाल में जली करंज का पानी मिट्टी के बने पाइपों से शहर तक जाता था। अंग्रेजों ने मिट्टी की जगह लोहे की पाइप लाइन डलवाई थी। इसके प्रवाह को व्यवस्थित रखने के लिए प्रत्येक 20 मीटर की दूरी पर हवा आने-जाने के लिए कूपक बनाए गए थे। चूंकि नीचे की सुरंग से सालोंभर साफ पानी बहता ही रहा है, इसलिए इसका इस्तेमाल कुएं की तरह होने लगा।

मुगलकाल में इस प्रणाली से रोज एक करोड़ लीटर पानी मिल सकता था। सदियों से इसकी सफाई नहीं होने के कारण इसकी जल संग्रह की क्षमता कम हो गई है

यह पूरी प्रणाली गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के आधार पर काम करती है। भूमिगत नालिकाओं को भी हल्की ढलान दी गई है। सुख भंडारा जमीन से तीस मीटर नीचे है और वहां से पानी इस सुरंग में आता है। गर्मियों में भी यहां डेढ़ मीटर पानी होता है। चट्टानों वाली इस प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए करीब एक मीटर मोटी दीवार भी निर्मित की गई। भूजल का रिसाव इसके अंदर होता रहे, इसके लिए दीवार में जहां-तहां जगह छोड़ी गई है। मूल भंडारा शहर से 10 किमी दूर एक सोते के पास स्थित है। यह खुले हौज़ की तरह है और इसकी गहराई 15 मीटर है।

इसकी दीवारें पत्थर से बनी हैं। इसके चारों तरफ 10 मीटर ऊंची दीवार भी बनाई गई है। चिंताहरण, मूल भंडारा के पास ही एक सोते के किनारे है और इसकी गहराई 20 मीटर है। खूनी भंडारा शहर से पांच किमी दूर लाल बाग के पास है। इसकी गहराई करीब 10 मीटर है। इसकी तलहटी पत्थर को जोड़कर बनी है। जली करंज इन चारों भंडारों का पानी एक जगह एकत्र करने का उपकरण मात्र है। यहां पानी जमीन से मात्र दो मीटर नीचे रहता है और यहीं से शहर को जाता है। कपड़ा बनाने वाली बुरहानपुर-ताप्ती मिल से निकला रसायनयुक्त गंदा पानी जली करंज के पास ही छोड़ा जा रहा है, जिससे इस प्राचीन प्रणाली के प्रदूषित होने का खतरा पैदा हो गया है।

बुरहानपुर किले के खंडहरों के पास से ही ताप्ती नदी बहती है, पर किले के अंदर मौजूद मुगलकाल के जल प्रबंध ही आज तक पानी की आपूर्ति करते हैं।

पानी की वर्तमान व्यवस्था

वर्ष 2001 में बुरहानपुर शहर की आबादी 1,93,725 के करीब थी। यहां रोज 90 लाख लीटर जल की आपूर्ति होती है, जिसमें से 76.5 लाख लीटर पानी नलकूपों और कुओं से तथा 13.5 लाख लीटर पानी पुरानी व्यवस्था से मिलता है। अपने निर्माण के साढ़े तीन सौ साल बाद भी यह व्यवस्था बिना किसी लागत या खर्च के काम आ रही है। बुरहानपुर नगर पालिका के इंजीनियर जी एस पाटिल के अनुसार, “पुरानी प्रणाली रोज अपनी मौजूदा आपूर्ति से साढ़े तेरह से लेकर 18 लाख लीटर ज्यादा पानी की आपूर्ति करने में सक्षम है। इस प्रकार अभी पुरानी प्रणाली का पूरा सदुपयोग नहीं हो पा रहा है। हाल के कुछ वर्षों में नगर पालिका इस प्रणाली की असल कीमत को समझी है और अब वह इसके रखरखाव के प्रति सचेत हुई है।”

पिछले कुछ वर्षों में इससे जुड़ी कुछ मुख्य समस्याएं भी सामने आई हैं, जिससे इसकी पानी प्रदान करने की क्षमता कम हुई है। मुगलकाल में इस प्रणाली से रोज एक करोड़ लीटर पानी मिल सकता था। 1976-77 तक यह क्षमता घटकर 15 लाख लीटर रह गई। यहां के पानी में मैग्नीशियम और कैल्शियम की मात्रा काफी अधिक है। रिसाव वाले छिद्रों में इन रसायनों का जमाव बढ़ जाने से पानी का आना कम हुआ है। कई जगहों पर तो इन खनिजों की परतें 10 से 15 सेमी मोटी हो चुकी हैं। चूंकि सदियों से इनकी सफाई नहीं हुई है, इसलिए इस पूरी प्रणाली की जल संग्रह क्षमता कम हुई है।

कम पानी जमा होने का एक अन्य कारण इसके आसपास के इलाक़ों में सिंचाई के लिए असंख्य नलकूपों का रोपा जाना भी है। नलकूपंांें से जितना पानी उलीचा जाता है, उसी अनुपात में भूजल का स्तर भी गिरता जाता है। इससे भंडारों में पानी का रिसाव कम हुआ है। कई जलभर भी रीते हो गए हैं। पहले यह पूरा इलाक़ा पेड़-पौधों के चलते हरा-भरा था, लेकिन नेपानगर में कागज का कारखाना लगने और आबादी का दबाव बढ़ने से सारा जंगल उजाड़ हो चुका है। पेड़ न रहने से बरसात का पानी ज़मीन के अंदर जाने की बजाय ताप्ती नदी में चला जाता है। सुरंग और कूपकों की गाद जमा होने से भी इस व्यवस्था की क्षमता प्रभावित हुई है।

पानी की गुणवत्ता में गिरावट हाल में पैदा हुई समस्या है। खुले कुंडों के पास चूना कुटाई वाला कारख़ाना ‘राय लाइम मिल’ है। इसकी धूल खुले कुंडों के माध्यम से कूपकों में जाती है, जिससे पूरी प्रणाली पर बुरा असर पड़ रहा है। कुंडों के आसपास आबादी का दवाब भी बढ़ रहा है। यहां के बाशिंदे कुंडों के पास बने चबूतरों पर नहाते-धोते हैं। इसका गंदा पानी भी रिसकर कूपकों में पहुंचता है। रेलवे स्टेशन के पास स्थित दो कुंड ऊपर से टूट गए हैं। इसमें बरसात का पानी और कई बार नालियों का पानी भी सीधे चला जाता है। अगर इन मामूली सी दिखने वाली बातों पर तत्काल ध्यान न दिया गया तो यह ऐतिहासिक प्रणाली बहुत जल्दी ही सिर्फ़ इतिहास का किस्सा बन कर रह जाएगी।

मध्य प्रदेश की अन्य जल प्रणालियां

हवेली प्रणाली : जबलपुर/नरसिंहपुर

नर्मदा घाटी के ऊपरी इलाकों में अभी तक प्रचलित यह प्रणाली जल संचय और खेती की एक अनोखी विधि है। इसकी शुरुआत जबलपुर शहर से आगे उत्तर-पश्चिम के मैदानी इलाके में हुई थी। फिर यह नर्मदा पार करके नरसिंहपुर ज़िले में पहुंची। इस प्रणाली में ऊंचे बांधों के जरिए बरसाती पानी को फसलों की बुवाई तक रोके रखा जाता है। फिर पानी निकालकर खेत सुखा लिया जाता है और फसल बोई जाती है। इसके बाद सिंचाई की जरूरत नहीं रहती।

जल ब्रह्मांड : सांची

ईसा से तीन सदी पूर्व बनाए गए तीन प्राचीन जलाशय सांची की पहाड़ी पर हैं जो जल ब्रह्मांड को उजागर करते हैं। एक जलाशय पहाड़ी के ठीक ऊपर बना है और शेष दो पहाड़ी की ढलान पर हैं। उस जमाने में वर्षा जल द्वारा बने मार्ग और नालियां पानी जमा करती थीं जो एक जलाशय से दूसरे में चला जाता था। पहाड़ी से दो किलोमीटर दूर बेतवा नदी बहती थी, जो भोपाल के तालाबों से मिल जाती थी। यह नदी, तीन जलाशय और एक घना जंगल मिलकर एक स्वतंत्र जल प्रणाली का काम करते थे।

पाट प्रणाली : झाबुआ

ज़िले के सांदवा प्रखंड के भील आदिवासियों ने खेतों की सिंचाई के लिए यह अचम्भित करने वाली प्रणाली विकसित की। इस प्रणाली में पहाड़ी से नीचे बहते पानी को ख़ास तरह के सिंचाई नालों की तरफ मोड़ दिया जाता है, जिन्हें पाट कहते हैं। पाट प्रणाली में सोते के किसी बिंदु पर 30-60 सेंटीमीटर मोटा बांध डाला जाता है, जो धारा को मोड़कर सिंचाई वाले भागों में डाल देता है। पाट का ढलाव सोते की पेटी से कम होता है।