आठ साल में बिहार के 8 हजार से अधिक जल निकाय गायब हो गए। ये आकड़ा स्वयं भारत सरकार के जलशक्ति मंत्रालय द्वारा पिछले साल असम, बिहार, दिल्ली, लद्दाख और सिक्किम में किए गए जलानिकायों की जनगणना से निकले हैं। जल निकायों की इस दूसरी सेन्सस (गणना) से पता चला कि 2018-19 में बिहार में 45,793 जल निकाय थे, जो 2025 में घाट कर 36,856 रह गए।यानी, 8 साल में करीब 8 हजार जल निकाय जमीन से गायब पाए गए।
जनसंख्या की दृष्टि से बिहार के दूसरे सबसे बड़े जिले, पूर्वी चंपारण के जिला मुख्यालय मोतीहारी शहर की जीवन रेखा माने जाने वाली मोतीझील वैसे तो अभी जमीन से गायब नहीं हुई है, लेकिन अदालती आदेशों पर गंभीरता से कम नहीं हुआ, तो संभव है कि अगले कुछेक जलनिकाय जनगणना में मोतीझील भी गायब जल निकाय की सूची में शामिल हो जाए, क्योंकि किसी भी जल निकाय के विलुप्त होने के जो कारण हो सकते हैं, उनमें से ज्यादातर कारण इस झील के साथ भी मौजूद है। हालांकि, पटना हाई कोर्ट के ने मोतीझील के पुनरुद्धार को लेकर तत्परता और थोड़ी सी सख्ती दिखाई है, जिससे आशा की एक किरण दिखाई दे रही है।
कोर्ट ने क्या कहा?
करीब 4 साल तक चली कानूनी कार्यवाही के बाद माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह एवं न्यायमूर्ति सौरेन्द्र पांडेय की खंडपीठ ने 1 अक्टूबर 2026 को मिसलेनियास ज्यूरिशडिक्शन केस संख्या 3862 ऑफ 2024, जो सिविल रिट केस संख्या 3876 ऑफ 2022 से संबंधित है, में मोतीझील संरक्षण को ले कर एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है।
पटना हाई कोर्ट ने बिहार के चीफ सेक्रेटरी को निर्देश दिया है कि वे मोतीझील की गाद की सफाई (डिसिल्टिंग), ड्रेजिंग, शेष अतिक्रमण हटाने तथा पूरे क्षेत्र के सौंदर्यीकरण से संबंधित सभी कार्यों को अगले छह माह (मार्च, 2027 तक) के भीतर पूरा कराना सुनिश्चित करें।
इस आदेश का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता कुमार अमित को यह स्वतंत्रता दी है कि अगर बिहार सरकार के मुख्य सचिव द्वारा न्यायालय के समक्ष दिए गए आश्वासन का निर्धारित छह माह की अवधि में अक्षरशः एवं वास्तविक भावना के अनुरूप पालन नहीं किया जाता है, तो वे नई अवमानना याचिका दायर कर सकते हैं।
अदालती निर्देशों का अनुपालन?
इस केस में पटना हाई कोर्ट ने 5 मई 2023 को भी एक आदेश पारित किया था। मूल रिट याचिका में न्यायालय ने मोतीझील के पुनरुद्धार से संबंधित चार प्रमुख मुद्दों पर ध्यान आकृष्ट किया था:
1. मोतीझील में गाद की सफाई एवं ड्रेजिंग का अधूरा कार्य पूरा करना।
2. मोतीझील के भीतर और उसके आसपास किए गए अतिक्रमण को हटाना।
3. झील के तटबंध, पार्क तथा अन्य आधारभूत संरचनाओं का विकास करना।
4. वृक्षारोपण सहित संपूर्ण परिसर का सौंदर्यीकरण करना तथा मोतीझील के मुख्य जल पुनर्भरण स्रोत रत्नागिरि चैनल से अतिक्रमण हटाना।
लेकिन, इन निर्देशों के अनुपालन में कथित चूक को लेकर वर्तमान अवमानना याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता कुमार अमित पटना हाई कोर्ट में वकील हैं।
डाउन टू अर्थ से बात करते हुए उन्होंने बताया कि मोतीझील के पुनरुद्धार और झील को जिंदा रखने हेतु झील के जल श्रोत अर्थात् रत्नागिरी चैनल के प्रवाह को पुनः स्थापित करना अति आवश्यक है एवं रामरेखा के माध्यम से जानपुल से आने वाले जल प्रवाह को सुनिश्चित करना होगा, तभी मोतीझील का अस्तित्व बच पाएगा।
4 साल से कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद भी अब तक कोइ मुक्कमल परिणाम नहीं निकलने को ले कर कुमार अमित कहते हैं, “यह लीगल लड़ाई जारी रहेगी और माननीय अदालत के ताजा आदेशों का अनुपालन अगर नहीं होता है, तो मैं पुन: अवमानना वाद दायर करूंगा।
चीफ सेक्रेटरी का शपथपत्र!
मोतीझील के पुनरुद्धार, संरक्षण और सौन्दर्यीकरण को ले कर बिहार सरकार के मुख्य सचिव ने 18 सितंबर 2026 को एक विस्तृत शपथपत्र एवं स्थिति रिपोर्ट पटना हाई कोर्ट में दाखिल की थी। शपथपत्र के अनुसार, मोतीझील के आसपास कुल 158 अतिक्रमणों की पहचान की गई थी, जिनमें से 138 को अतिक्रमणमुक्त कराया जा चुका था।
रत्नागिरि चैनल के संबंध में रिपोर्ट में बताया गया कि चैनल के 20 स्थानों से अतिक्रमण हटाया जा चुका है। पूर्व की रिपोर्ट में भी चैनल के अतिक्रमण हटाने को मोतीझील के जलस्रोत के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए आवश्यक बताया गया था।
गाद की सफाई का कार्य 70 प्रतिशत पूरा, शेष कार्य के लिए 31 अक्टूबर 2026 की समय-सीमा माँगी गयी. इस शपथपत्र के अनुसार, मोतीझील में खरपतवार हटाने का कार्य पूरा हो चुका था, जबकि गाद की सफाई का कार्य 70 प्रतिशत पूरा हुआ था। रिपोर्ट में स्नान घाट का कार्य 40 प्रतिशत, शौचालय ब्लॉक का कार्य 50 प्रतिशत, चेंजिंग रूम का कार्य 40 प्रतिशत तथा तटबंधों के सुधार का कार्य 22 प्रतिशत पूरा बताया गया।
वहीं, पार्कों के विकास और पाथवे का निर्माण उस समय तक नहीं हुआ था। वृक्षारोपण, बैठने के लिए बेंच लगाने तथा कूड़ेदान स्थापित करने का कार्य भी लंबित बताया गया था। 2 सितंबर 2026 की समीक्षा बैठक में मुख्य सचिव ने मोतीझील के सौंदर्यीकरण के शेष कार्यों के लिए संशोधित डीपीआर तैयार करने तथा तटबंधों के सुधार, पार्कों के विकास, वृक्षारोपण, बेंच और कूड़ेदान की व्यवस्था सहित लंबित कार्यों को 31 दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया।
बहरहाल, एक बार फिर हाई कोर्ट ने 1 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में मुख्य सचिव को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि वे मोतीझील की गाद की सफाई एवं ड्रेजिंग, शेष अतिक्रमण हटाने, रत्नागिरि नहर और तटबंधों से अतिक्रमण हटाने तथा पूरे क्षेत्र में वृक्षारोपण, बेंच, कूड़ेदान एवं अन्य सौंदर्यीकरण कार्यों को छह माह के भीतर पूरा कराएं।
वैसे दिलचस्प है कि इस झील के पूर्वी किनारे निजी पार्टी द्वारा किए अतिक्रमण (झील क्षेत्र) को हटा कर सरकार की तरफ से पक्की और चौड़ी सड़क बना दी गयी थी। हालांकि, कोर्ट की तरफ से अब झील के किनारे किसी भी तरह के पक्के सड़क निर्माण पर रोक लगा दी गयी है।
ये देखना दिलचस्प होगा कि जहां पिछले 4 साल की कानूनी लड़ाई के दौरान, बिहार को दो मुख्यमंत्री मिल गए, दो चीफ सेक्रेटरी मिल गए, पूर्वी चंपारण को तीन जिलाधिकारी मिल गए, अब अदालत के निरंतर आदेशों के बाद अगले 6 महीनों में मोतीझील का कायाकल्प हो पाता है या नहीं।