सारांश
2017-18 से 2021-22 के बीच हुई ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, 1967 में जम्मू-कश्मीर में 697 झीलें थीं। इनमें से 367 झीलें जम्मू और 330 झीलें कश्मीर में थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, 697 में से 692 झीलें वन विभाग, राजस्व विभाग और कृषि विभाग के अधीन थीं।
जिन 203 झीलों (कुल 697 झीलों का 29 प्रतिशत) का जल क्षेत्र कम हुआ है उनमें 63 ऐसी झीलें शामिल थीं, जिनका जल क्षेत्र 50 प्रतिशत या उससे अधिक कम हो गया।
जम्मू-कश्मीर सरकार के पास केवल छह झीलों यानी डल, वुलर, होकरसर, मानसबल, सुरिनसर और मानसर के लिए ही संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रम थे।
हालांकि छह झीलों की विस्तृत ऑडिट जांच में उनके संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के संबंध में कई कमियां भी सामने आईं।
जम्मू-कश्मीर में झीलों के प्रबंधन और संरक्षण पर आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक हालिया रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। 2017-18 से 2021-22 के बीच हुई ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, 1967 में जम्मू-कश्मीर में 697 झीलें थीं। इनमें से 367 झीलें जम्मू और 330 झीलें कश्मीर में थीं।
ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया है कि 1,537.07 हेक्टेयर में फैली 315 झीलें गायब हो गईं हैं और 203 झीलों के क्षेत्रफल में 1,314.19 हेक्टेयर की कमी आई है। यानी कुल 518 झीलों के कुल क्षेत्रफल में 2,851.26 हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। इससे झीलों द्वारा प्रदान किए जाने वाले पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और अन्य सेवाओं को नुकसान पहुंचा है। रिपोर्ट के अनुसार, 150 झीलों का क्षेत्रफल 538.22 हेक्टेयर बढ़ा भी है, वहीं 29 झीलों के क्षेत्रफल में कोई बदलाव नहीं हुआ।
रिपोर्ट के अनुसार, 697 में से 692 झीलें वन विभाग, राजस्व विभाग और कृषि विभाग के अधीन थीं। 315 गायब झीलों (697 झीलों का 45 प्रतिशत) में 80 झीलें (25 प्रतिशत) वन विभाग के अधिकार क्षेत्र वाली और 235 झीलें (75 प्रतिशत) राजस्व विभाग और कृषि विभाग के अधिकार क्षेत्र में थीं।
ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया है कि जिन 203 झीलों (कुल 697 झीलों का 29 प्रतिशत) का जल क्षेत्र कम हुआ है उनमें 63 ऐसी झीलें शामिल थीं, जिनका जल क्षेत्र 50 प्रतिशत या उससे अधिक कम हो गया। इस प्रकार, इन 63 झीलों के विलुप्त होने का खतरा काफी अधिक है। इन 203 झीलों में 98 झीलें, 83 झीलें, 20 झीलें और दो झीलें क्रमशः पीसीसीएफ, जिला प्रशासन, वन्यजीव संरक्षण विभाग (डब्ल्यूसीडी) और झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एलसीएमए) के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।
केवल 6 झीलों के संरक्षण पर ध्यान
रिपोर्ट में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर सरकार के पास केवल छह झीलों यानी डल, वुलर, होकरसर, मानसबल, सुरिनसर और मानसर के लिए ही संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रम थे। शेष 691 झीलों के संबंध में वन विभाग ने न तो पात्र झीलों की पहचान की और न ही पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा शुरू किए गए विभिन्न कार्यक्रमों के तहत सहायता प्राप्त करने के लिए कोई योजना बनाई। 2017-22 के दौरान जम्मू और कश्मीर के कैपेक्स बजट का लगभग एक प्रतिशत (560.65 करोड़ रुपए) उन छह झीलों के लिए आवंटित किया गया था जिनकी विस्तार से जांच की गई थी।
ऑडिट के दौरान सीएजी ने 63 झीलों की जांच की और पाया कि इन झीलों के जलग्रहण क्षेत्र में हुए बदलावों का समय-समय पर मूल्यांकन नहीं किया गया था। इसके अलावा, झीलों की जल-धारण क्षमता और जल बजट के मूल्यांकन का भी अभाव था। सीएनजी ने पाया कि वैज्ञानिक आधार पर फ्लशिंग, झीलों की जल गुणवत्ता को उनके मूल ट्रॉफिक स्तरों तक बहाल करना, जैव विविधता का मूल्यांकन और संरक्षण, झीलों की अपेक्षित आयु का आकलन, प्रदूषण के स्रोत बिंदुओं और गैर-स्रोत बिंदुओं की पहचान और उपचार, निर्धारित मानदंडों के अनुसार खरपतवार हटाना और गाद निकालना तथा आम जनता के बीच जन जागरूकता फैलाना जैसे सभी कार्य या तो किए ही नहीं गए थे या 63 नमूना झीलों के संबंध में इन्हें अपर्याप्त रूप से लागू किया गया।
संरक्षण में खामियां
छह झीलों की विस्तृत ऑडिट जांच में उनके संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के संबंध में कई कमियां भी सामने आईं। डल झील में जमीन के उपयोग में बदलाव हुए जिसका मुख्य कारण डल झील के निवासियों से जमीन का अधिग्रहण न होना, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का ठीक से काम न करना, खरपतवार हटाने की अनुचित व्यवस्था और निगरानी तथा देखरेख तंत्र का अपर्याप्त होना था। इसके परिणामस्वरूप, डल झील में खुले पानी वाले क्षेत्र को बहाल नहीं किया जा सका। राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम (एनएलसीपी), प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण योजना (पीएमआरपी) और अन्य कार्यक्रम गतिविधियों के तहत झील संरक्षण कार्यक्रम के कार्यान्वयन में भी कमियां पाई गईं।
इसी तरह निगरानी निकायों के गठन न होने के कारण वुलर झील के संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रम को नुकसान पहुंचा, क्योंकि वुलर संरक्षण और प्रबंधन प्राधिकरण से जुड़े नीतिगत मामलों पर निर्णय नहीं लिया जा सका। विस्तृत योजना तैयार न होने के कारण, वुलर झील के पुनरुद्धार और जीर्णोद्धार के लिए भारत सरकार से मिलने वाली वित्तीय सहायता से वंचित रहना पड़ा। खराब हो चुके जंगलों में अपर्याप्त वृक्षारोपण के परिणामस्वरूप झील में गाद जमा होने की समस्या बढ़ गई, जिससे झील के “बूढ़ा होने” (एजिंग) की प्रक्रिया तेज हो गई।
इसी तरह, होकरसर झील के मामले में भी झील के संरक्षण और प्रबंधन के लिए कोई व्यापक योजना नहीं बनाई गई थी। वन्यजीव संरक्षण विभाग ने केवल वार्षिक योजनाएं बनाईं जिनमें झील के खराब होने के मूल कारणों जैसे जल-प्रवाह में बदलाव, प्रदूषण या झील में जैव विविधता की हानि पर ध्यान नहीं दिया गया था। सर्वेक्षण और सीमांकन की कमी के कारण, होकरसर झील का 2,528.10 कनाल क्षेत्र अतिक्रमण की चपेट में आ गया।
रिपोर्ट के अनुसार जांची गई झीलों में जमीन के इस्तेमाल/वर्गीकरण में बदलाव मुख्य रूप से झीलों के अंदर और आसपास लगातार होने वाली इंसानी गतिविधियों के कारण हुए, जिन पर कोई रोक नहीं थी। झीलों के लिए कोई खास केंद्रीय विकास कार्यक्रम और नियामक प्राधिकरण मौजूद नहीं था। नतीजतन, जमीन के इस्तेमाल में हुए बदलावों का न तो मूल्यांकन किया जा सका और न ही उनकी निगरानी की जा सकी। जमीन के इस्तेमाल में समय के साथ हुए बदलावों के कारण इन झीलों का ईकोसिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुआ।