शिप्रा नदी के तट पर बसी महाकाल की नगरी उज्जैन (ऐतिहासिक रूप से उज्जैनी या अवंती) में इस बार का सिंहस्थ महाकुम्भ 27 मार्च से 27 मई, 2028 तक सम्पन्न होगा, जिसकी तैयारी जोर-शोर से चल रही है।
उज्जैन का यह महाकुम्भ लगभग 18वीं शताब्दी से मनाया जा रहा है और यह खास तौर पर तब लगता है जब बृहस्पति ग्रह सिंह राशि में प्रवेश करता है। उज्जैन में आध्यात्मिक महत्व और खगोलीय परंपरा सदियों से एकीकृत रूप में देखी गयी है।
उज्जैन में काल (समय) के देवता को समर्पित ‘महाकालेश्वर’ मंदिर, जहां शिवलिंग को ही एक ब्रह्मांडीय घड़ी और समय का सूचक माना जाता है, सदियों से भारत में खगोलीय विज्ञान का प्रमुख केंद्र रहा है। उज्जैन की गिनती भारत के लगातार बसे हुए नगरों में होती है।
पुरातात्विक खनन से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण युग (लगभग 2000 ईसा पूर्व) से लेकर लगातार यहाँ लोग रहते आए हैं। चौथी शताब्दी का खगोलीय ग्रंथ ‘सूर्य सिद्धांत’ के अनुसार उज्जैन भारतीय ‘प्राइम मेरिडियन’ और ‘कर्क रेखा’ के मिलन-बिंदु पर स्थित है, जो समय की गणना के लिए ‘सेंट्रल रिफरेन्स पॉइंट’ के रूप में कार्य करता रहा है।
इस भारतीय ‘प्राइम मेरिडियन’ को ग्रीनविच मेरिडियन की मान्यता से सदियों पहले ही स्थापित कर दिया गया था।
स्कंद पुराण में एक बड़े धार्मिक केंद्र के तौर पर उज्जैन को बनारस, गया और कांची से भी ऊँचा दर्जा दिया गया है। इस खुले विचारों वाले शहर में शैव धर्म, वैष्णव धर्म और उनसे जुड़ी अलग-अलग शाखाओं और पंथों, साथ ही जैन और बौद्ध धर्म को भी जगह मिली है। स्कंद पुराण के अवंती खंड में शक्ति और उनके अलग-अलग रूपों को समर्पित अनगिनत मंदिरों का ज़िक्र है। तंत्रवाद से निकले सिद्ध और नाथ पंथ भी उज्जैन में खूब फले-फूले।
एक प्रागैतिहासिक नगर
छठी से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से ही अवंती साम्राज्य की प्राचीन राजधानी के रूप में उज्जैन एक गणितीय और ग्रह संबंधी अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र था। यह मौर्य, गुप्त और शक राजवंशों के लिए शक्ति का एक प्रमुख केंद्र था। बौद्ध साहित्य में अवंती, जिसकी राजधानी उज्जैनी थी, का ज़िक्र वत्स, कोसल और मगध के साथ चार बड़ी ताकतों में से एक के तौर पर किया गया है।
उज्जैन का इतिहास रामायण और महाभारत के समय से जुड़ा है। भगवान राम ने रामघाट पर अपने पिता दशरथ का "पिंड-दान" किया था। यह भी कहा जाता है कि कृष्ण, बलराम और सुदामा ने उज्जैन में गुरु सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी। महाभारत के युद्ध में उज्जयिनी के शासक विंद और अनुविंद ने दो अक्षौहिणी सेनाओं के साथ भाग लिया था।
राजा चंडप्रद्योत के शासनकाल (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) में उज्जैन अत्यंत शक्तिशाली अवंती महाजनपद की राजधानी थी। यह शहर अपनी अजेय सैन्य शक्ति, समृद्ध व्यापारिक गतिविधियों और भव्य किलेबंदी के लिए उत्तरी भारत में सर्वोच्च राजनीतिक केंद्र बन गया था।
चौथी सदी के दौरान अवंती मौर्य साम्राज्य के अधीन आ गया जब अशोक को उनके पिता बिंदुसार ने उज्जैन का वायसराय नियुक्त किया था। इसी दौरान उन्होंने विदिशा के एक व्यापारी की बेटी देवी से विवाह किया था। उनके बच्चे महेंद्र और संघमित्रा, जिन्होंने श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया, का जन्म भी यहीं हुआ है।
इन दोनों ने अपना जीवन बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार को समर्पित कर दिया और श्रीलंका में ही अंतिम सांस ली। उज्जैन के लोगों के अनुरोध पर उनके अस्थि अवशेष उज्जैन भेजे गए थे। उज्जैन में वैश्य टेकरी (वैश्य स्तूप) नामक स्थल के पास इन अस्थि अवशेषों को रखकर दो अन्य स्तूप बनाए गए हैं।
सन 1234 में इल्तुतमिश के उज्जैन पर हमले के बाद मंदिरों को लूटने और उन्हें तोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया। तबाही का यह दौर मांडू के बाज बहादुर के समय में ही रुका। मुगल शासन ने पुनर्निर्माण का एक नया दौर शुरू किया।
सम्राट अकबर ने मालवा पर बाज बहादुर के वर्चस्व को खत्म किया और उज्जैन की सुरक्षा के लिए शहर की दीवार बनवाई। महमूद शाह के शासनकाल में महाराजा सवाई जयसिंह को मालवा का गवर्नर बनाया गया था। खगोल विज्ञान के बड़े विद्वान होने के नाते, उन्होंने उज्जैन की वेधशाला का पुनर्निर्माण करवाया और कई मंदिर बनवाए।
17वीं सदी की शुरुआत में, उज्जैन और मालवा को मराठों के कब्ज़े और हमलों का सामना करना पड़ा। मालवा पर मराठों के शासन ने इस इलाके में सांस्कृतिक पुनर्जागरण को बढ़ावा दिया और आधुनिक उज्जैन का उदय हुआ। उज्जैन के ज़्यादातर मंदिर इसी दौर में बनवाए गए। आखिरकार 1750 में उज्जैन सिंधियाओं के अधिकार में आ गया और 1810 तक, जब दौलत राव सिंधिया ने ग्वालियर में अपनी नई राजधानी बसाई, यह उनके राज्य का मुख्य शहर रहा।
प्राचीन भारत के सबसे महान साहित्यकारों में से एक मशहूर संस्कृत कवि और नाटककार कालिदास का उज्जैन से गहरा नाता था। वे चौथी-पांचवीं सदी में राजा चंद्रगुप्त II (विक्रमादित्य) के दरबार के एक रत्न थे। कालिदास की एक महान रचना ‘मेघदूत’ में उज्जैन (उज्जयिनी) को एक शानदार, खुशियों से भरे आध्यात्मिक, जीवंत और सांस्कृतिक नगर के रूप में चित्रित किया गया है।
उत्कृष्ट खगोलीय केंद्र
उज्जैन में खगोलीय परंपरा और आध्यात्मिक महत्व समेकित है। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1725-1730 के बीच उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर से मात्र 1.5 किलोमीटर दूर जंतर-मंतर (वेधशाला) का निर्माण किया, जो भारत के पांच जंतर-मंतरों में एक है और अपनी प्रमुख भौगोलिक स्थिति के कारण अत्यधिक महत्व रखता है। उज्जैन को एक सक्रिय वेधशाला के रूप में मान्यता प्राप्त है जहां ग्रहों के अध्ययन अभी भी प्रकाशित होते हैं।
जंतर-मंतर (वेधशाला), उज्जैन
उज्जैन विक्रम संवत की शुरुआत से भी जुड़ा है। यह एक ऐतिहासिक हिंदू लूनिसोलर कैलेंडर है जिसे 57 ईसा पूर्व में महान राजा विक्रमादित्य ने शुरू किया था। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 56.7 साल आगे है और भारत और नेपाल में त्योहारों और धार्मिक रस्मों के लिए इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। इसके अलावा, यह नेपाल का आधिरिक कैलेंडर भी है।
दूसरी सदी के मशहूर यूनानी भूगोलवेत्ता और खगोलशास्त्री क्लॉडियस टॉलेमी ने अपने दुनिया के नक्शों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड में उज्जैन को "ओज़ेने" के तौर पर दिखाया है और इसे एक अहम शहर और भौगोलिक गणनाओं के लिए एक ज़रूरी ‘एस्ट्रोनॉमिकल रेफरेंस पॉइंट’ के रूप में दर्शाया। अतः इस शहर की अपनी एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान थी।
उज्जैन का खगोलीय दृष्टि से बहुत महत्व है। इसे भारत का ऐतिहासिक "ग्रीनविच" माना जाता है क्योंकि प्राचीन भारतीय समय-गणना में यह मुख्य मध्याह्न रेखा (0° देशांतर) का काम करता था। कर्क रेखा पर स्थित यह शहर गणित और खगोल विज्ञान के अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र था। उज्जैन का पंचांग सबसे सटीक और प्रामाणिक माना जाता है क्योंकि यहीं से भारतीय काल गणना और मानक समय का निर्धारण होता है।
उज्जैन सिर्फ सैद्धांतिक रूप से ही 'ज़ीरो पॉइंट' (शून्य बिंदु) नहीं था, बल्कि यह प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान का मुख्य केंद्र भी था। उज्जैन की महान परंपरा ने वराहमिहिर (छठी शताब्दी ईस्वी), ब्रह्मगुप्त (सातवीं शताब्दी ईस्वी)—जिन्होंने शून्य की अवधारणा को औपचारिक रूप दिया और भास्कराचार्य (12वीं शताब्दी ईस्वी), जो उज्जैन की खगोलीय वेधशाला के प्रमुख थे, जैसे महान विद्वान दिए।
एक अनोखा ‘क्रॉस और बॉल’ का निशान, जिसे आम तौर पर ‘उज्जयनी सिंबल’ कहा जाता है, ग्रहों को दर्शाता है। इस निशान का सबसे पहला उदाहरण गुजरात में भादर नदी के पास रोजाडी में एक टीले पर मिले हड़प्पा के मिट्टी के बर्तनों पर मिला (लगभग 3000 ईसा पूर्व)। उज्जैन में साम्राज्यों के उदय और पतन होते रहे पर ‘उज्जयनी सिंबल’ का प्रयोग हर राज्य में बदस्तूर जारी रहा जो हमारी सदियों पुरानी स्थापित, मज़बूत और व्यापक खगोलीय परंपरा को दर्शाता है।
विश्व धरोहर स्थल का एक मज़बूत दावेदार
भारत के दो शहरों- अहमदाबाद और जयपुर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। यूनेस्को का 'वर्ल्ड हेरिटेज सिटीज प्रोग्राम' एक ऐतिहासिक शहरी परिदृश्यों को संरक्षित करने की वैश्विक पहल है। इस अवसर को हमें अपने प्रागैतिहासिक नगरों को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दिलाने में उपयोग करना चाहिए। उज्जैन हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ा हुआ शहर है और सिंहस्थ के इस मौके पर इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की सूची में लाना एक बड़ी उपलब्धि होगी।
लेखक एक संरक्षण विशेषज्ञ है एवं शिवा फाउंडेशन, नोएडा के कार्यकारी निदेशक हैं