बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (बिट्स, पिलानी) के वैज्ञानिकों ने बिजलीघरों और बड़े उद्योगों से निकलने वाली गैसों को स्वच्छ ईंधन में बदलने की नई तकनीक विकसित की है। इस तकनीक के जरिए डाइमिथाइल ईथर (डीएमई) तैयार किया जा रहा है, जिसे भविष्य में घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) के विकल्प या पूरक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस शोध का नेतृत्व प्रो. सौनक रॉय कर रहे हैं। उनके साथ वैज्ञानिक सत्यपाल ए. सिंह और सेवानिवृत्त प्रोफेसर बी.एम. रेड्डी भी इस परियोजना से जुड़े हैं। टीम ने ऐसी प्रक्रिया विकसित की है जिसमें औद्योगिक गैसों को पकड़कर (कैप्चर) हाइड्रोजन के साथ मिलाया जाता है और एक ही चरण में डीएमई में बदला जाता है। यह हाइड्रोजन पानी को अलग करके तैयार किया जाता है।
वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का परीक्षण केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बिजलीघर जैसी वास्तविक परिस्थितियों में भी किया। इसके लिए एक हाई-प्रेशर रिएक्टर का उपयोग किया गया, जिसमें तापमान, दबाव और गैसों के प्रवाह को नियंत्रित कर बड़ी मात्रा में डीएमई तैयार किया गया। इससे संकेत मिलता है कि इस तकनीक को भविष्य में बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है।
डाइमिथाइल ईथर (डीएमई) को दुनिया भर में एक स्वच्छ ईंधन के रूप में माना जाता है। यह जलने पर कालिख नहीं बनाता, प्रदूषण कम करता है और एलपीजी की तरह ही रसोई में इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत में भारतीय मानक ब्यूरो पहले ही एलपीजी में 20 प्रतिशत तक डीएमई मिलाने की अनुमति दे चुका है, जिससे इसके उपयोग का रास्ता साफ हो गया है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक साथ दो समस्याओं का समाधान देती है। एक तरफ औद्योगिक उत्सर्जन को कम करती है और दूसरी तरफ उसी गैस से उपयोगी ईंधन तैयार करती है। इससे न केवल प्रदूषण घटेगा बल्कि देश की एलपीजी आयात पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
प्रो. सौनक रॉय के अनुसार, यह नवाचार भारत की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह उपलब्धि बिट्स पिलानी के स्वच्छ ऊर्जा और नवाचार के क्षेत्र में बढ़ते योगदान को भी दर्शाती है।