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विज्ञान

ओटीटी प्लेटफॉर्म: मनोरंजन की व्यक्तिगत क्रांति या सामूहिकता का अंत?

अब संस्कृति अपने आप समाज से जन्म लेने वाली प्रक्रिया नहीं रह गई है; बल्कि वह एक बाजार द्वारा तय की जाने लगी है

Arun Kumar Gond

भारतीय गांवों की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना परंपरागत रूप से सामूहिकता, साझापन और सह-अस्तित्व पर आधारित रही है। तकनीकी साधनों के अभाव में, मनोरंजन का स्वरूप सामाजिक जुड़ाव का माध्यम रहा करता था।

उस समय देखने-सुनने की प्रक्रिया केवल व्यक्तिगत गतिविधि नहीं थी, बल्कि सामूहिक अनुभव का उत्सव होती थी। अधिकांश ग्रामीण घरों में टीवी (टेलीविजन) उपलब्ध नहीं था और मोबाइल या इंटरनेट जैसी तकनीक भी सीमित थी। ऐसे में मनोरंजन एक साझा-सामाजिक घटना होता था, जो समाज में सामूहिक भावना और व्यक्तिगत तथा समूह के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायक था।

परन्तु आज “संस्कृति उद्योग” की अवधारणा हमें यह समझने में मदद करती है कि ओटीटी प्लेटफाॅर्म (ऐसी डिजिटल सेवाएं जो सीधे इंटरनेट के जरिये फिल्म, सीरीज या वीडियो पहुंचाती हैं) कैसे मनोरंजन से आगे बढ़कर एक पूरी व्यवस्था बन चुके हैं।

अब संस्कृति अपने आप समाज से जन्म लेने वाली प्रक्रिया नहीं रह गई है; बल्कि वह एक बाजार द्वारा तय की जाने लगी है। क्या बनेगा, कैसे बनेगा और किसके लिए बनेगा यह सब अब लाभ, दर्शक संख्या और उपभोक्ता डेटा तय करते हैं।

समाजशास्त्री जिगमंट बॉमन की ‘तरल आधुनिकता’ के संदर्भ में देखें तो ओटीटी संस्कृति त्वरित संतुष्टि, बदलती पसंद और बिंज-वॉचिंग (एपिसोड खत्म होते ही अगला अपने-आप चलने लगे) जैसी आदतों को बढ़ावा देती है, जहां मनोरंजन टिकाऊ सामाजिक संबंधों की जगह क्षणिक उपभोग में बदल जाता है।

इसके उलट, अगर हम गांव के पुराने दृश्य को याद करें तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। गांव के कुछ ही घरों में टीवी हुआ करती थी; अधिकतर काले-सफेद स्क्रीन वाली, जिसके ऊपर एंटीना लगा रहता था और हवा या मौसम के साथ तस्वीर साफ-धुंधली होती रहती थी। शाम होते ही बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों में एक ही उत्साह होता “आज वाला सीरियल/एपिसोड देखना है।”

जैसे ही टीवी ऑन होता, आस-पास के घरों से लोग धीरे-धीरे उसी आँगन या बरामदे में इकट्ठा होने लगते। जमीन पर बोरी, दरी या चटाई बिछ जाती; जगह कम पड़ती तो कोई खिड़की के बाहर खड़े होकर भी देख लेता। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि साथ बैठने, साथ हंसने और साथ प्रतिक्रिया देने का एक साझा अनुभव था। उस समय देखने की क्रिया समाज में व्यक्ति और समूह के बीच एक सहज संतुलन बनाती थी; जो आज की व्यक्तिगत स्क्रीन संस्कृति में धीरे-धीरे धुंधला पड़ता जा रहा है।

आज जब ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और स्मार्टफोन ने मनोरंजन को पूरी तरह व्यक्तिगत बना दिया है, तब यह पुराने अनुभव और भी मूल्यवान लगते हैं। आज भले ही हमारे पास ओटीटी, नेटफ्लिक्स, यूट्यूब, मोबाइल स्क्रीनें, एक जीबी डाटा प्रतिदिन, और अनगिनत विकल्प हों, लेकिन उस समय की सामूहिकता, साझापन, और मानवीय जुड़ाव आज की किसी भी तकनीक से बड़ा ‘मनोरंजन’ था।

आज ओटीटी प्लेटफॉर्म ने इस परंपरा को बदल दिया है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी पसंद के अनुसार किसी भी समय कंटेंट देख सकता है। इस सुविधा ने मनोरंजन को व्यक्तिगत बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही पारिवारिक और सामूहिक अनुभवों की कमी भी बढ़ गई है। ओटीटी प्लेटफॉर्म इसी बदलाव का प्रतीक हैं। गांव और कस्बों में लोग अब अपनी स्क्रीन पर अपने अनुसार मनोरंजन का चयन करते हैं, जिससे पारंपरिक सामूहिकता का स्थान व्यक्तिगत अनुभव ने ले लिया है।

एक कथन है कि “मीडिया ही संदेश है।” अर्थात ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म दर्शकों को वैश्विक कंटेंट तक सीधे पहुंच प्रदान करता है- कोरियाई ड्रामा, अमेरिकी वेब सीरीज, यूरोपीय डॉक्यूमेंट्री और भारतीय स्थानीय सामग्री। यह सांस्कृतिक विविधता की दृष्टि से समृद्ध है, लेकिन पारंपरिक मनोरंजन और स्थानीय सांस्कृतिक प्रथाओं पर इसका प्रभाव भी स्पष्ट है। पहले जो सामूहिक अनुभव एक घर के आंगन या बरामदे में साझा भावनाओं के माध्यम से बनता था, अब वह डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की निजी दुनिया में सीमित हो गया है।

देखा जाये तो ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म उपभोग की संस्कृति को बढ़ावा देता है। युवा पीढ़ी अपनी पसंद के अनुसार कंटेंट का चयन करती है, जिससे मनोरंजन न केवल देखना बल्कि पहचान, प्राथमिकता और जीवनशैली की अभिव्यक्ति बन गया है। तथा आधुनिक समाज में व्यक्तिगतता और सामाजिक दूरी बढ़ती है। ओटीटी इस दूरी को और अधिक बढ़ाता है, क्योंकि लोग पारिवारिक या पड़ोसी संवाद की बजाय अपने कमरों और निजी स्क्रीन में खो जाते हैं।

फिर भी, ओटीटी का सकारात्मक पहलू यह है कि नई प्रकार की डिजिटल सामूहिकता का अवसर प्रदान होता है। सोशल-मीडिया, ऑनलाइन फोरम और कमेंट सेक्शन के माध्यम से लोग अपने अनुभव साझा करते हैं और वैश्विक समुदाय का हिस्सा बनते हैं।

सामाजिक दृष्टि से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म का प्रभाव द्विविध प्रकृति का है। एक ओर यह ज्ञान, वैश्विक दृष्टि और व्यक्तिगत स्वतंत्रता बढ़ाता है; दूसरी ओर यह पारंपरिक सामूहिक अनुभव, पारिवारिक संवाद और स्थानीय सांस्कृतिक प्रथाओं को कमजोर कर रहा है।

कस्टमाइजेशन और दर्शक की पसंद के अनुसार सामग्री की सिफ़ारिश ओटीटी का सबसे बड़ा आकर्षण बन गई है। परिणामस्वरूप, दर्शक जल्दी से जल्दी अच्छा कंटेंट देख पाते हैं, अधिक सामग्री का उपभोग करते हैं, और फिल्म देखने का अनुभव नए तरीकों से परिभाषित होता है। अब न केवल साप्ताहिक बल्कि रोज़ाना या दैनिक रिलीज़ भी आम हो गई हैं, जिससे मनोरंजन का निरंतर प्रवाह बनता है।

देखा जाये तो ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने मनोरंजन को व्यक्तिगत, सहज और वैश्विक बना दिया है। यह दर्शकों को अपनी पसंद और जीवनशैली के अनुसार अनुभव चुनने का अवसर देता है। साथ ही, यह मीडिया उद्योग और संस्कृति उद्योग के विस्तार तथा नए बाजारों तक पहुँचने की संभावनाओं को भी बढ़ाता है। इस तरह, ओटीटी केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि समाज के मनोरंजन, संस्कृति और व्यवहार को नया आकार देने वाला एक शक्तिशाली माध्यम बन गया है।

[लेखक: अरुण कुमार गोंड, समाजशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में शोध छात्र हैं। इनका शोध ग्रामीण समाज में सोशल-मीडिया के प्रभावों पर केंद्रित है।]