विशेषज्ञों का मानना है कि सटीक भावनात्मक तकनीक निजी और पेशेवर जिंदगी के बीच की सीमाएं कमजोर कर सकती है। फोटो साभार: आईस्टॉक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

जब मशीनें पढ़ेंगी इंसान के भाव, फिर भी विश्वसनीयता पर बने रहेंगे सवाल

भावनाएं पहचानने वाली एआई तकनीक भविष्य में निजी जिंदगी और कामकाज को प्रभावित कर सकती है; विशेषज्ञ भावनात्मक निजता और इसके सामाजिक असर पर सावधानी बरतने की जरूरत बताते हैं।

Dayanidhi

  • एआई चेहरे, आवाज और शरीर के संकेतों से भावनाएं पहचानने की कोशिश कर रही है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता पर सवाल बने हुए हैं।

  • विशेषज्ञों का मानना है कि सटीक भावनात्मक तकनीक निजी और पेशेवर जिंदगी के बीच की सीमाएं कमजोर कर सकती है।

  • अस्पतालों में भावनाओं के आधार पर कर्मचारियों की क्षमता पर सवाल उठना, तकनीक के संभावित खतरों को दिखाता है।

  • सार्वजनिक माफी और व्यवहार को तकनीक के जरिए परखने से लोगों की भावनाओं और सामाजिक रिश्तों को लेकर सोच बदल सकती है।

  • शोधकर्ता भावनात्मक निजता की रक्षा और तकनीक के सही इस्तेमाल के लिए भविष्य में स्पष्ट नैतिक नियम बनाने की जरूरत बताते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई अब केवल शब्दों और तस्वीरों को समझने तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं, जो चेहरे के हाव-भाव, आवाज, शरीर की गतिविधियों और दूसरे शारीरिक संकेतों से किसी व्यक्ति की भावनाओं को पहचानने का दावा करती है। इसे इमोशन रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (ईआरटी) कहा जाता है। हालांकि आज ऐसी तकनीक की वैज्ञानिक विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, लेकिन इसके इस्तेमाल की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।

नीदरलैंड की लीडेन यूनिवर्सिटी के इस शोध के मुताबिक शोधकर्ता ने इस मुद्दे को एक अलग नजरिए से देखा है। उनका सवाल है कि अगर भविष्य में यह तकनीक पूरी तरह सही तरीके से काम करने लगे तो क्या होगा?

जब तकनीक लेने लगेगी फैसले

शोधकर्ता ने अपनी रिसर्च में भविष्य की कई संभावित स्थितियों की कल्पना की है। इनमें से एक उदाहरण अस्पताल का है। मान लीजिए एक महिला सर्जन किसी मरीज का ऑपरेशन करने अस्पताल पहुंचती है। ऑपरेशन से पहले ईआरटी सिस्टम उसके भावनात्मक संकेतों की जांच करता है और उसे भावनात्मक रूप से अस्थिर बताता है। अस्पताल प्रशासन उसे ऑपरेशन करने से रोक देता है।

शोध में सर्जन बताती है कि वह अपना काम पूरी तरह करने में सक्षम है। उसकी परेशानी का संबंध उसके काम से नहीं, बल्कि निजी जिंदगी से है। वह तलाक की प्रक्रिया से गुजर रही है और अपने बच्चे को लेकर चिंतित है। उसने अपनी निजी चिंताओं को काम से अलग रखने की कोशिश की थी, लेकिन तकनीक ने उसके चेहरे और व्यवहार से उसकी भावनात्मक स्थिति का अनुमान लगा लिया।

शोध के अनुसार, यहां समस्या केवल तकनीक की सटीकता नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति की निजी भावनाओं के आधार पर उसके पेशेवर जीवन के बारे में फैसला किया जाना चाहिए।

निजी और पेशेवर जिंदगी के बीच दीवार

हर व्यक्ति की जिंदगी में कई भूमिकाएं होती हैं। कोई डॉक्टर या इंजीनियर होने के साथ-साथ माता-पिता, पति-पत्नी, दोस्त या पड़ोसी भी होता है। सामान्य तौर पर व्यक्ति खुद तय करता है कि किसी खास जगह पर वह अपनी जिंदगी का कौन सा हिस्सा दूसरों के सामने रखेगा।

भावनाओं को पहचानने वाली तकनीक इस व्यवस्था को बदल सकती है। अगर मशीनें यह बताने लगें कि कोई व्यक्ति अंदर से क्या महसूस कर रहा है, तो उसके पास अपनी भावनाओं को निजी रखने का विकल्प कम हो सकता है।

ऐसी स्थिति में लोगों से अपनी भावनाओं का कारण बताने और उन्हें सही साबित करने की मांग भी बढ़ सकती है। यानी तकनीक केवल जानकारी नहीं देगी, बल्कि लोगों के बारे में फैसलों को भी प्रभावित कर सकती है।

क्या हर भावना दिखाई देना जरूरी है?

शोध के मुताबिक, इसका एक और उदाहरण सार्वजनिक माफी से जुड़ा दिया है। मान लीजिए किसी सरकारी प्रतिनिधि को किसी गंभीर घटना के बाद जनता से माफी मांगनी है। वह जिम्मेदारी स्वीकार करता है और दुख व्यक्त करता है, लेकिन ईआरटी सिस्टम बताता है कि उसके अंदर उतना दुख या पछतावा नहीं है, जितना वह अपने शब्दों में दिखा रहा है।

ऐसी स्थिति में लोगों का ध्यान माफी के उद्देश्य से हटकर इस बात पर जा सकता है कि नेता वास्तव में क्या महसूस कर रहा था।

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि हर सार्वजनिक माफी के समय व्यक्ति का उसी स्तर का भावनात्मक अनुभव करना जरूरी नहीं है। डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और नेता कई बार लगातार कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं। वे हर घटना की भावनाओं को बार-बार महसूस किए बिना भी जिम्मेदारी निभा सकते हैं।

भावनात्मक निजता का सवाल

यूरोपीय संघ का एआई कानून भावनाओं को पहचानने वाली तकनीक के कुछ इस्तेमालों पर पहले ही प्रतिबंध या सीमाएं लगाता है। हालांकि वर्तमान तकनीक की कम विश्वसनीयता भी इसका एक कारण है। शोधकर्ता इससे आगे का सवाल उठाती हैं। उनका मानना है कि अगर भविष्य में ईआरटी बहुत सटीक हो जाए, तब भी समाज को तय करना होगा कि इसका इस्तेमाल कहां उचित है और कहां नहीं।

तकनीक के फायदे भी हैं

शोधकर्ता ईआरटी को पूरी तरह नकारती नहीं हैं। ऐसी तकनीक भविष्य में कुछ न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की शुरुआती पहचान में मदद कर सकती है। कुछ लोगों को अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने में भी इससे सहायता मिल सकती है।

लेकिन तकनीक के संभावित फायदे उसके सामाजिक प्रभावों पर चर्चा को खत्म नहीं कर सकते। भावनात्मक निजता केवल व्यक्तिगत जानकारी को छिपाने का सवाल नहीं है। यह उस सामाजिक जगह की रक्षा का सवाल है, जहां व्यक्ति तय करता है कि वह दूसरों के सामने खुद को किस तरह पेश करेगा।

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि भविष्य में मशीनें हमारी भावनाओं को समझने में सक्षम हों, उससे पहले समाज को यह तय करना होगा कि क्या हर वह चीज, जिसे तकनीक जान सकती है, उसे जानने का अधिकार भी तकनीक को होना चाहिए।