विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

पाषाण युग के डेंटिस्ट: 60,000 साल पहले निएंडरथल भी करते थे 'रूट कैनाल'

रूस की एक गुफा में मिले 59 हजार साल पुराने दांत ने साबित कर दिया है कि आधुनिक इंसानों से बहुत पहले निएंडरथल भी पत्थर के औजारों से सफल 'रूट कैनाल' जैसी जटिल सर्जरी कर रहे थे।

Lalit Maurya

  • साइबेरिया की चागिरस्काया गुफा से मिले 59 हजार साल पुराने एक दांत ने मानव इतिहास की एक पुरानी धारणा को बदल दिया है। नए अध्ययन से पता चला है कि निएंडरथल केवल शिकारी नहीं थे, बल्कि वे दर्द पहचानने और उसका इलाज करने की समझ भी रखते थे।

  • वैज्ञानिकों को मिले दांत पर ऐसा गहरा छेद मिला, जो प्राकृतिक सड़न नहीं, बल्कि पत्थर के नुकीले औजार से जानबूझकर किया गया उपचार था, कुछ वैसा ही जैसा आज ‘रूट कैनाल’ में किया जाता है।

  • शोधकर्ताओं ने आधुनिक इंसानों के दांतों पर प्रयोग कर इसकी पुष्टि की। पत्थर की नोक से बनाए गए निशान ठीक वैसे ही निकले जैसे उस प्राचीन दांत पर मिले थे। इससे साबित हुआ कि निएंडरथल संक्रमित हिस्सा हटाकर दर्द कम करने की कोशिश करते थे। हैरानी की बात यह है कि इलाज के बाद भी वह व्यक्ति कई साल जिंदा रहा और उस दांत का इस्तेमाल करता रहा।

  • यह खोज बताती है कि चिकित्सा की शुरुआत आधुनिक इंसानों से बहुत पहले हो चुकी थी। अब तक दांत के इलाज के सबसे पुराने प्रमाण 20 हजार साल पुराने माने जाते थे, लेकिन साइबेरिया की यह खोज इतिहास को 40 हजार साल पीछे ले गई है। 60 हजार साल पुराने इस दांत ने साबित कर दिया कि पाषाण युग में भी इंसान अपने शरीर की बीमारियां समझते थे और इलाज के लिए औजार बनाते थे।

क्या आप सोच सकते हैं कि आज से 60,000 साल पहले, बिना किसी आधुनिक मेडिकल कॉलेज, डॉक्टरों या एनेस्थीसिया के, कोई दांतों की सड़न ठीक करने के लिए 'रूट कैनाल' या सर्जरी कर सकता था? एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हजारों साल पहले पाषाण युग में निएंडरथल अपने दांतों का इलाज कर रहे थे।

साइबेरिया की एक गुफा से मिले 59 हजार साल पुराने दांत ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि हमारे विलुप्त पूर्वज पत्थर के नुकीले औजारों से संक्रमित दांत का हिस्सा निकालते थे, ठीक वैसे ही जैसे आज 'रूट कैनाल' के जरिए सड़े हिस्से को हटाया जाता है।

यह खोज दर्शाती है कि इंसानों में दर्द पहचानने और उसका इलाज करने की समझ हमारी कल्पना से हजारों साल पहले विकसित हो चुकी थी।

यह अध्ययन पीटर द ग्रेट म्यूजियम ऑफ एंथ्रोपोलॉजी एंड एथ्नोग्राफी और रशियन एकेडमी ऑफ साइंसेज से जुड़ी शोधकर्ता एलिसा जुबोवा और उनके सहयोगियों के द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे ओपन-एक्सेस जर्नल प्लोस वन में प्रकाशित हुए हैं।

59,000 साल पुराने दांत का सच

अध्ययन के मुताबिक, निएंडरथल के पास दर्द और दांतों के संक्रमण को पहचानने की जानकारी के साथ-साथ नुकसान को पत्थर की नुकीली नोक से ड्रिल करके ठीक करने की मोटर स्किल्स भी थीं। गौरतलब है कि निएंडरथल को इंसानों का पूर्वज माना जाता है, जो शिकारी थे। हालांकि अध्ययन से पता चला है कि वे शिकारी होने के साथ-साथ शरीर की बीमारी को समझने और उसका इलाज करने की क्षमता भी रखते थे।

वैज्ञानिकों को निएंडरथल की यह दाढ़ साइबेरिया (रूस) की चागिरस्काया गुफा से मिली है। यह दांत करीब 59,000 साल पुराना है। जांच के दौरान इस दांत के बीचों-बीच बने एक गहरे छेद ने शोधकर्ताओं को हैरान कर दिया।

यह छेद दांत की नस तक पहुंचा हुआ था। शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगा कि यह छेद प्राकृतिक सड़न के कारण हुआ होगा। लेकिन जब इसकी गहराई से जांच की गई तो पता चला कि यह यह प्राकृतिक घिसाव नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया उपचार था। दांत की सतह पर मौजूद महीन खरोंचों और छेद के आकार ने यह साफ किया कि किसी पत्थर के नुकीले औजार से दांत को ड्रिल किया गया था।

क्या निएंडरथल के पास थी बीमारी को पहचानने की अद्भुत समझ

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता एलिसा जुबोवा के मुताबिक, दांत की चबाने वाली सतह पर बना गड्ढा सामान्य कैविटी जैसा नहीं था। कंप्यूटेड माइक्रोटोमोग्राफी (एक तरह का एडवांस एक्स-रे) की मदद से की गई जांच में स्पष्ट खरोंच दिखीं, जो संकेत देती हैं कि यह किसी प्राकृतिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया था।

शोधकर्ताओं ने इसकी पुष्टि के लिए आधुनिक इंसानों के तीन दांतों पर प्रयोग किया। उन्होंने पत्थर की नोक से दांतों में छेद बनाए और पाया कि बने निशान बिल्कुल उसी तरह के थे जैसे निएंडरथल के दांत पर मिले। इससे साबित हुआ कि दांत की सड़न हटाने के लिए पत्थर का इस्तेमाल किया गया था। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह प्रक्रिया बेहद दर्दनाक रही होगी, लेकिन इससे संक्रमित हिस्सा निकल गया और दर्द में राहत मिली होगी।

यह इस बात का प्रमाण है कि निएंडरथल समझते थे कि दर्द कहां हो रहा है और उसका इलाज क्या है। साथ ही उनके हाथों में इतनी कुशलता थी कि उन्होंने बिना दांत को तोड़े सिर्फ सड़न वाले हिस्से को पत्थर से ड्रिल कर बाहर निकाल दिया।

खास बात यह है कि इलाज के बाद भी वह निएंडरथल सालों तक जीवित रहा और उस दांत का इस्तेमाल करता रहा, क्योंकि दांत पर बाद में घिसने के निशान भी मिले हैं।

आधुनिक इंसानों से पहले भी थी चिकित्सा की समझ

वैज्ञानिकों ने अध्ययन में जानकारी दी है कि ये निएंडरथल करीब 70 से 60 हजार साल पहले मध्य और पूर्वी यूरोप से पलायन करके अल्ताई क्षेत्र (साइबेरिया) पहुंचे थे। यह क्षेत्र जैवविविधता से भरपूर और मौसम उनके अनुकूल था। पत्थर के औजार बनाने के लिए कच्चा माल आसानी से मिलता था और उनके शिकार भेंसे (बाइसन) और घोड़े भी यहां पर्याप्त संख्या में मौजूद थे।

शायद इसी संघर्षपूर्ण जीवन ने उन्हें पत्थरों को सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि 'चिकित्सा उपकरण' बनाना भी सिखा दिया। गुफा से मिले पत्थर के औजारों और प्राचीन डीएनए के अध्ययन से पता चला है कि यहां निएंडरथल मिकोक्वियन संस्कृति से जुड़े लोगों के बेहद करीब थे। यही संस्कृति कॉकस क्षेत्र और क्रीमिया में भी पाई गई थी।

अब तक माना जाता था कि दांतों का इलाज करने की यह समझ सिर्फ हम आधुनिक इंसानों (होमो सेपियन्स) के पास ही थी। लेकिन इस खोज ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक दांत के उपचार के सबसे पुराने प्रमाण करीब 20 हजार साल पुराने माने जाते थे।

लेकिन साइबेरिया की यह खोज चिकित्सा के इतिहास को 40 हजार साल और पीछे ले जाती है। यानी आधुनिक इंसानों से बहुत पहले निएंडरथल दर्द दूर करने के लिए दांतों की सर्जरी कर रहे थे।

यह खोज एक और धारणा को तोड़ती है कि प्राचीन मानव केवल प्रकृति के भरोसे जीते थे। सच यह है कि वे अपने शरीर की समस्याओं, बीमारियों को समझते थे और इलाज के लिए औजार भी बनाते थे। 60 हजार साल पुराने इस दांत ने साबित कर दिया है कि चिकित्सा की शुरुआत हमारी कल्पना से कहीं पहले हो चुकी थी।