ब्लड शुगर सामान्य होने से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा हुआ काफी कम, शोध ने दी नई उम्मीद। फोटो साभार: आईस्टॉक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

बूढ़ा दिल, जवान बदन: क्या नया शरीर बदल सकता है प्रत्यारोपित हृदय की जैविक उम्र

चूहों में मजबूत आणविक प्रमाण, 11 मानव नमूनों में भी मिला संकेत, लेकिन पुराने डोनर हृदयों की सुरक्षा अभी साबित नहीं 

Vivek Mishra

क्या किसी हृदय की उम्र उसके डोनर की उम्र से ही तय होती है? या फिर किसी दूसरे शरीर में पहुंचने के बाद वह उस शरीर के हिसाब से बदलने लगता है? हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और ब्रिघम एंड विमेंस अस्पताल के शोधकर्ताओं के नए अध्ययन ने इस सवाल पर एक दिलचस्प संकेत दिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रत्यारोपित हृदय की जैविक उम्र नए शरीर की उम्र की ओर बढ़ सकती है।

यह अध्ययन 17 सितंबर 2026 को बायोआरक्सिव पर प्रीप्रिंट के रूप में प्रकाशित हुआ। इस अध्ययन का शीर्षक  “ट्रांसप्लांटेड हार्ट्स असिमिलेट द रिसिपिएंट्स बायोलॉजिकल एज” है। इसे जेसी आर. पोगानिक, वादिम एन. ग्लैडिशेव और उनके सहयोगियों ने तैयार किया है।  

यह ध्यान देने लायक है कि इस शोध का अभी विशेषज्ञों ने स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन नहीं किया है। इस शोध में जैविक उम्र से आशय केवल जन्म के बाद बीते वर्षों से नहीं, बल्कि कोशिकाओं में जमा होने वाले उम्र संबंधी आणविक बदलावों से है। इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने डीएनए मिथाइलेशन के पैटर्न का इस्तेमाल किया। डीएनए पर होने वाले इन रासायनिक बदलावों को पढ़कर वैज्ञानिक यह अनुमान लगा सकते हैं कि किसी ऊतक की जैविक उम्र कितनी है। 

चूहों में उम्र बदली 

शोधकर्ताओं ने अलग-अलग उम्र के चूहों के बीच हृदय प्रत्यारोपित किए। युवा, मध्यम उम्र और बुजुर्ग चूहों के हृदय दूसरे उम्र वर्ग के चूहों में लगाए गए। प्राप्तकर्ता का अपना हृदय शरीर में बना रहा, जबकि अतिरिक्त डोनर हृदय को गर्दन की रक्त वाहिकाओं से जोड़ा गया। इससे प्रत्यारोपित और मूल हृदय की सीधी तुलना संभव हुई। प्रत्यारोपण के चार से छह महीने बाद करीब 3.2 लाख डीएनए क्षेत्रों में मिथाइलेशन की जांच की गई। तीन अलग-अलग एपिजेनेटिक क्लॉक से जैविक उम्र का अनुमान लगाया गया। यह ऐसी आणविक घड़ी है, जो डीएनए पर होने वाले रासायनिक बदलावों, खासकर डीएनए मिथाइलेशन के पैटर्न, के आधार पर किसी ऊतक की जैविक उम्र का अनुमान लगाती है।

तीनों मापों में एक समान दिशा दिखाई दी। युवा हृदय जब बुजुर्ग चूहे में लगाया गया तो उसमें उम्र बढ़ने से जुड़े आणविक संकेत बढ़ गए। इसके उलट, बुजुर्ग हृदय युवा चूहे में लगाए जाने पर कुछ मामलों में युवा होने की दिशा में बढ़ा। जीन की सक्रियता की जांच में भी यही रुझान दिखाई दिया। खासकर माइटोकॉन्ड्रिया से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव स्पष्ट था। माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पादन से जुड़ी महत्वपूर्ण संरचनाएं हैं। लेकिन इसका असर पूरे शरीर पर नहीं दिखा। प्राप्तकर्ता के मूल हृदय, लिवर और रक्त में प्रत्यारोपित हृदय की उम्र के अनुरूप ऐसा बदलाव नहीं मिला। इससे संकेत मिलता है कि उम्र में यह बदलाव मुख्य रूप से प्रत्यारोपित अंग तक सीमित था।

इंसानों में सिर्फ 11 नमूने 

मानवों में तस्वीर अभी बहुत छोटी है। शोधकर्ताओं ने अस्पताल में हुए 407 हृदय प्रत्यारोपणों के अभिलेखों में से ऐसे मरीजों को चुना, जिनके पुराने हृदय के बायोप्सी नमूने उपलब्ध थे और डोनर तथा प्राप्तकर्ता की उम्र में पर्याप्त अंतर था। इनमें केवल 11 मरीजों के नमूनों का आणविक विश्लेषण किया गया। पांच मरीजों को अपेक्षाकृत पुराने डोनर का हृदय मिला था, जबकि छह को युवा डोनर का। पुराने डोनर वाले मामलों में डोनर और प्राप्तकर्ता की उम्र का अंतर 8 से 24 साल था। युवा डोनर वाले मामलों में यह अंतर 38 से 50 साल था। तीन एपिजेनेटिक क्लॉक में से दो ने दोनों समूहों के बीच सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण अंतर दिखाया। तीसरी क्लॉक भी उसी दिशा में गई, लेकिन उसका अंतर सांख्यिकीय महत्व तक नहीं पहुंचा। यानी इंसानों में भी शुरुआती संकेत यही है कि प्रत्यारोपित हृदय की आणविक उम्र उसके डोनर की उम्र की बजाय प्राप्तकर्ता की उम्र से अधिक प्रभावित हो सकती है। लेकिन केवल 11 नमूनों के आधार पर इसे स्थापित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। 

क्या हृदय की कार्यक्षमता भी बदलती है? 

शोधकर्ताओं ने इसके बाद सैकड़ों प्रत्यारोपण मरीजों के चिकित्सा अभिलेखों का विश्लेषण किया। कुछ माप, जैसे हृदय गति, हृदय के पंपिंग कक्ष की पिछली दीवार की मोटाई और व्यायाम क्षमता, प्राप्तकर्ता की उम्र से जुड़े पाए गए। लेकिन सभी मापों में ऐसा संबंध नहीं मिला। उदाहरण के लिए, इजेक्शन फ्रैक्शन यानी हर धड़कन में बाएं वेंट्रिकल से बाहर निकलने वाले रक्त के अनुपात का संबंध उम्र से सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था। इसलिए अध्ययन यह साबित नहीं करता कि किसी पुराने हृदय को युवा शरीर में लगाने से वह कार्यात्मक रूप से युवा हृदय बन जाता है।

शोध की सीमा

पुराने हृदयों के लिए अभी खुला सवाल यहीं इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण सीमा सामने आती है। किसी अंग की एपिजेनेटिक उम्र में बदलाव का अर्थ यह नहीं है कि उसमें पहले से मौजूद संरचनात्मक या रक्त वाहिका संबंधी क्षति भी खत्म हो गई। अध्ययन के लेखक जेसी पोगानिक ने नेचर से बातचीत में कहा कि कुछ बदलाव संभवतः अपरिवर्तनीय होते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी माना है कि प्रत्यारोपित हृदय पर लंबे समय तक होने वाली प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और रक्त वाहिकाओं की क्षति जैसे प्रभावों को समझने के लिए और अध्ययन की जरूरत है। 

भारत में भी यह सवाल महत्वपूर्ण है। नेशनल ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (नोटो) के अनुसार 2024 में देश में 253 हृदय प्रत्यारोपण हुए। वहीं मृत डोनरों की कुल संख्या 1,128 थी, लेकिन इसमें सभी अंगों के डोनर शामिल हैं, इसलिए इसे हृदय डोनरों की संख्या नहीं माना जा सकता। नोटो के हृदय डोनर चयन प्रोटोकॉल में 65 वर्ष से कम उम्र को एक मानदंड के रूप में रखा गया है। हालांकि केवल उम्र के आधार पर हृदय स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया जाता। डोनर के हृदय की स्थिति, बीमारी, रक्त संचार और अन्य चिकित्सकीय मानकों को भी देखा जाता है। नया अध्ययन इन मानदंडों को बदलने का आधार नहीं देता। फिलहाल इसका महत्व इस सवाल में है कि क्या किसी अंग की जैविक उम्र उसके डोनर के साथ स्थायी रूप से तय हो जाती है, या नया शरीर उस उम्र को बदल सकता है।

इसका जवाब पाने के लिए बड़े मानव अध्ययनों, अधिक नमूनों, लंबे समय तक मरीजों की निगरानी और विशेषज्ञ समीक्षा की जरूरत होगी। अभी उपलब्ध प्रमाण इतना ही बताते हैं कि प्रत्यारोपित हृदय अपने नए शरीर के जैविक वातावरण से प्रभावित होता है। 

सिर्फ उम्र नहीं, शरीर का माहौल भी

इस शोध का मतलब यह नहीं है कि प्रत्यारोपित हृदय अपनी उम्र को पूरी तरह पीछे छोड़ देता है। शोधकर्ताओं ने मुख्य रूप से यह देखा कि हृदय की कोशिकाओं में उम्र से जुड़े कुछ आणविक संकेत नए शरीर के वातावरण के साथ बदलते हैं। यानी किसी हृदय की जैविक उम्र पूरी तरह स्थिर नहीं हो सकती। वह उस शरीर से मिलने वाले संकेतों से प्रभावित हो सकती है, जिसमें उसे प्रत्यारोपित किया गया है।

इस बदलाव के पीछे क्या होता है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। शोधकर्ताओं ने प्रतिरक्षा कोशिकाओं और शरीर में मौजूद दूसरे जैविक संकेतों को संभावित कारणों में माना है। लेकिन यह भी संभव है कि अलग-अलग ऊतकों में उम्र से जुड़े कुछ बदलाव स्थायी हों और नए शरीर का प्रभाव उन्हें उलट न सके। इसलिए पुराने हृदय का कुछ आणविक रूप से युवा दिखना यह साबित नहीं करता कि उसमें पहले से मौजूद संरचनात्मक या रक्त वाहिका संबंधी क्षति भी ठीक हो गई।