पौधों में मौजूद सूक्ष्म नलिकाएं, फोटो : आईआईटी गुवाहटी 
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

आईआईटी गुवाहटी का अध्ययन: जानिए सूखे में पौधे कैसे बचाते हैं अपना पानी

पौधों में मौजूद सूक्ष्म नलिकाएं करती हैं मदद

Vivek Mishra

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते सूखे और पानी की कमी के बीच पौधे किस तरह अपने भीतर पानी के परिवहन तंत्र में बदलाव करते हैं, इसे समझने में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के एक अध्ययन से नई जानकारी मिली है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, पानी की कमी होने पर पौधों के तने में मौजूद जल परिवहन नलिकाओं की संरचना बदल जाती है। यह बदलाव पानी के प्रवाह को प्रभावित करता है और पौधे को कठिन परिस्थितियों में अपना जल संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है।

यह अध्ययन भविष्य में सूखा सहन करने वाली फसल किस्मों के विकास और पानी के अधिक कुशल इस्तेमाल की रणनीतियां तैयार करने में उपयोगी हो सकता है। हालांकि, इसके आधार पर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि किसानों के लिए सूखा प्रतिरोधी फसलें तुरंत विकसित हो जाएंगी।

पानी की कमी बदल देती है आंतरिक संरचना

पौधों के तने में जाइलम नामक सूक्ष्म नलिकाएं होती हैं, जो जड़ों से पानी और उसमें घुले खनिजों को पत्तियों तथा पौधे के अन्य हिस्सों तक पहुंचाती हैं। इन नलिकाओं के बीच छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें पिट्स कहा जाता है। ये छिद्र पौधे के भीतर पानी के आवागमन में अहम भूमिका निभाते हैं।

अब तक जाइलम के व्यवहार को समझने के लिए किए गए कई कंप्यूटर आधारित अध्ययनों में इन नलिकाओं को कठोर पाइप की तरह माना गया था। लेकिन वास्तविक पौधों की संरचना परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है। इसलिए कठोर नलिकाओं पर आधारित मॉडल सूखे के दौरान पौधों में होने वाले बदलावों को पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं थे।

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने इसी कमी को दूर करने के लिए प्रयोगों और वास्तविक संरचना पर आधारित त्रिआयामी (3D) कंप्यूटर सिमुलेशन का सहारा लिया।

सरसों के पौधों पर किया गया अध्ययन

आईआईटी गुवाहाटी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रणब कुमार मंडल के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने भारतीय सरसों के पौधों के तनों का अध्ययन किया। इसमें उन्नत इमेजिंग तकनीक, सूक्ष्म स्तर पर बल मापने की विधियों और रासायनिक ट्रैकिंग का इस्तेमाल किया गया।

प्रोफेसर प्रणब कुमार मंडल समेत आईआईटी गुवाहटी शोधकर्ताओं की टीम

शोधकर्ताओं ने यह मापा कि पानी की कमी के दौरान जाइलम की नलिकाओं के आकार, उनकी दीवारों की लोच और यांत्रिक मजबूती में किस तरह बदलाव आता है। साथ ही, नलिकाओं के बीच मौजूद पिट्स के आकार में होने वाले बदलावों का भी विश्लेषण किया गया। इन प्रयोगों से मिले आंकड़ों के आधार पर पौधों की आंतरिक संरचना के वास्तविक स्वरूप के करीब 3डी मॉडल तैयार किए गए।

प्रोफेसर मंडल के मुताबिक, इन मॉडलों से यह समझने में मदद मिली कि सूखे के दौरान जाइलम की संरचना और उसमें पानी के प्रवाह का व्यवहार किस तरह बदलता है।

नलिकाएं सिकुड़ने से बढ़ता है प्रतिरोध

अध्ययन के अनुसार, पानी की गंभीर कमी के दौरान पौधों की जाइलम नलिकाएं संकरी हो जाती हैं और उनके बीच के पिट्स का आकार भी घट जाता है। इससे नलिकाओं के भीतर पानी के प्रवाह में प्रतिरोध बढ़ता है और पानी का ऊपर की ओर जाना कठिन हो जाता है।

यह बदलाव पौधे के भीतर पानी के परिवहन को सीमित करता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे पत्तियों के जरिए वाष्पोत्सर्जन के रूप में होने वाले पानी के नुकसान को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि इस प्रक्रिया के दौरान पानी का प्रवाह पिट्स के रास्ते नलिकाओं के बीच बगल की दिशा में होने लगता है। इससे पौधे के भीतर पानी का वितरण और संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है तथा जल परिवहन नलिकाओं के पूरे नेटवर्क के बाधित होने का जोखिम कम हो सकता है।

इस तरह पौधे की आंतरिक जल परिवहन प्रणाली केवल पानी पहुंचाने का काम नहीं करती, बल्कि पानी की कमी जैसी परिस्थितियों में उसकी संरचना में होने वाले बदलाव भी पौधे की प्रतिक्रिया का हिस्सा होते हैं।

दुनिया के कई कृषि क्षेत्र अनियमित बारिश, बढ़ते तापमान और लंबे सूखे के कारण पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग पौधे सीमित पानी में कैसे जीवित रहते हैं और उनकी आंतरिक संरचना किस तरह प्रतिक्रिया करती है।

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं का मानना है कि इस अध्ययन से प्राप्त जानकारी भविष्य में ऐसी फसल किस्मों के विकास में मदद कर सकती है, जो कम पानी में भी बेहतर ढंग से जीवित रह सकें। इसके अलावा, पौधों की जल परिवहन प्रणाली को समझने के लिए विकसित किए गए कंप्यूटर मॉडल वैज्ञानिकों को पर्यावरणीय तनाव के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं।

हालांकि, प्रयोगशाला में प्राप्त निष्कर्षों को अलग-अलग फसलों, मिट्टी, मौसम और खेतों की वास्तविक परिस्थितियों में परखना जरूरी होगा। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस जानकारी का उपयोग खेती में किस हद तक किया जा सकता है।

यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एप्लाइड फिजिक्स रीव्यूज में प्रकाशित हुआ है। इसके सह-लेखकों में आईआईटी गुवाहाटी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के शोधार्थी जिन्मय कलिता, एएनआरएफ-नेशनल पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो डॉ. सुमित कुमार मेहता और संस्थान के पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो डॉ. सूरज पंजा शामिल हैं।

यह अध्ययन भौतिकी और पादप विज्ञान को एक साथ जोड़कर पौधों की जल परिवहन प्रणाली को समझने का प्रयास है। जलवायु परिवर्तन के दौर में जब कृषि को कम पानी में अधिक उत्पादन की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, तब इस तरह का शोध भविष्य में जल संरक्षण और फसल की सहनशीलता बढ़ाने के वैज्ञानिक प्रयासों के लिए उपयोगी आधार तैयार कर सकता है।