सौर मंडल 
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

पहली बार सौर मंडल के बाहर एक ग्रह से मिले रेडियो संकेत, जानिए वहां जीवन को लेकर क्या पता चला?

बीटा पिक्टोरिस बी एक विशाल गैस दानव ग्रह है, जो पृथ्वी से करीब 63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित बीटा पिक्टोरिस तारे की परिक्रमा करता है

Vivek Mishra

दक्षिण अफ्रीका के मीरकैट रेडियो टेलीस्कोप से करीब 63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित गैस दानव ग्रह बीटा पिक्टोरिस बी से रेडियो संकेत दर्ज किए गए हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह पहली बार है जब किसी एक एक्सोप्लैनेट से आने वाले रेडियो उत्सर्जन की पुष्टि की गई है।

यह खोज एलियन जीवन मिलने का संकेत नहीं है। लेकिन यह एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्र को समझने का एक नया रास्ता जरूर खोलती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इसी तरह के रेडियो संकेतों के अध्ययन से यह समझने में मदद मिल सकती है कि दूसरे ग्रह अपने वायुमंडल को तारकीय विकिरण से किस हद तक बचा पाते हैं और किन ग्रहों में जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।

अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों की टीम ने दक्षिण अफ्रीका स्थित मीरकैट रेडियो टेलीस्कोप ऐरे के 64 डिशों वाले नेटवर्क से बीटा पिक्टोरिस तंत्र का अध्ययन किया। इस दौरान ग्रह बीटा पिक्टोरिस बी से आने वाले बदलते हुए रेडियो उत्सर्जन का पता चला।

रेडियो तरंगों की खोज क्यों महत्वपूर्ण है?

सौर मंडल में बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून जैसे विशाल गैस दानव ग्रह रेडियो तरंगें उत्सर्जित करते हैं। इनमें बृहस्पति हमारे सौर मंडल का सबसे शक्तिशाली ऑरोरल रेडियो स्रोत है।

इन ग्रहों से आने वाले रेडियो संकेतों का अध्ययन वैज्ञानिकों को उनके चुंबकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी देता है। साथ ही इससे यह समझने में मदद मिलती है कि ग्रहों के ध्रुवीय क्षेत्रों में ऑरोरा यानी ध्रुवीय ज्योति कैसे बनती है।

इसी तरह की प्रक्रिया बीटा पिक्टोरिस बी में भी रेडियो उत्सर्जन पैदा कर रही है।

जब किसी तारे से ऊर्जावान आवेशित कण निकलते हैं, तो वे ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र से प्रभावित होते हैं। चुंबकीय क्षेत्र इन कणों को अपनी क्षेत्र रेखाओं के साथ ग्रह के ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर ले जा सकता है। वहां ये कण ग्रह के वायुमंडल के कणों से टकराते हैं। इसी प्रक्रिया से पृथ्वी पर उत्तरी और दक्षिणी रोशनी यानी ऑरोरा दिखाई देती है।

इसी दौरान रेडियो उत्सर्जन भी पैदा हो सकता है।

यह जानकारी "डिसक्वरी ऑफ रेडियो इमिशन फ्रॉम एक्सोप्लैनेट बीटा पिक्टोरिस बी" शोधपत्र में सामने आई है। यह शोधपत्र फिलहाल वैज्ञानिक शोधपत्रों के एक प्रिपिंट सर्वर अर्काइव (एआरएक्सआईवी) पर मौजूद है,जो कि पीयर रीव्यूड जर्नल में प्रकाशित नहीं हुआ है। यानी वैज्ञानिकों की समीक्षा अभी बाकी है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह एलियन जीवन या किसी दूसरी सभ्यता से संपर्क का संकेत नहीं है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, रेडियो उत्सर्जन का संबंध ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र से पैदा होने वाली ऑरोरल गतिविधि से है। लेकिन यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार किसी एक्सोप्लैनेट यानी सौर मंडल के बाहर मौजूद ग्रह के रेडियो संकेत को उसके तारे से अलग करके सीधे उसी ग्रह से जोड़ा गया है।

रेडियो तरंगों का यह वृत्तीय ध्रुवीकरण महत्वपूर्ण था। शोधकर्ताओं के मुताबिक, संकेतों की ये विशेषताएं इलेक्ट्रॉन साइक्लोट्रॉन मेजर अस्थिरता से पैदा होने वाले रेडियो उत्सर्जन से मेल खाती हैं। यह वही भौतिक प्रक्रिया है जिसे हमारे सौर मंडल के ग्रहों और कुछ अल्ट्राकूल बौने तारों में ऑरोरल रेडियो उत्सर्जन से जोड़ा जाता है।

लेकिन यह कैसे पता चला कि संकेत ग्रह से ही आया?

यही इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

किसी दूर के तारा-ग्रह तंत्र से रेडियो संकेत मिलने पर यह तय करना आसान नहीं होता कि संकेत ग्रह से आया है या उसके तारे से। इससे पहले एक्सोप्लैनेट प्रणालियों से रेडियो उत्सर्जन के संकेत मिले थे, लेकिन वैज्ञानिक उन्हें निश्चित रूप से किसी एक ग्रह से नहीं जोड़ पाए थे।

बीटा पिक्टोरिस तंत्र में भी शुरुआत में यही सवाल था। शोधकर्ताओं ने रेडियो तस्वीरों में स्रोत की स्थिति को सटीक रूप से निर्धारित करने के लिए बहुत दूर स्थित पृष्ठभूमि के क्वासरों को संदर्भ बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया। इन स्थिर खगोलीय स्रोतों की मदद से रेडियो स्रोत की स्थिति को खगोलीय संदर्भ तंत्र के साथ मिलाया गया।

इसके बाद रेडियो स्रोत की स्थिति की तुलना बीटा पिक्टोरिस तारे और उसके ग्रहों की ज्ञात स्थिति से की गई।

नतीजा यह निकला कि रेडियो स्रोत की स्थिति बीटा पिक्टोरिस बी से मेल खाती थी, जबकि वह अपने केंद्रीय तारे या दूसरे ग्रह बीटा पिक्टोरिस सी की स्थिति से मेल नहीं खाती थी। शोधपत्र में रेडियो स्रोत और बीटा पिक्टोरिस बी के बीच इस मेल को सांख्यिकीय रूप से भी दर्ज किया गया है।

यही वह प्रमाण है जिसके आधार पर वैज्ञानिकों ने रेडियो उत्सर्जन को पहली बार किसी एक एक्सोप्लैनेट से सीधे जोड़ा।

बीटा पिक्टोरिस बी कैसा ग्रह है?

बीटा पिक्टोरिस बी एक विशाल गैस दानव ग्रह है, जो पृथ्वी से करीब 63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित बीटा पिक्टोरिस तारे की परिक्रमा करता है।

इसका द्रव्यमान बृहस्पति से करीब 10 से 12 गुना है। यह अपेक्षाकृत युवा ग्रह भी है और अपने निर्माण से बची गर्मी के कारण अभी भी काफी गर्म है।

बीटा पिक्टोरिस तंत्र हाल के वर्षों में एक्सोप्लैनेट अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण रहा है। जुलाई 2026 में इसी तंत्र के दूसरे ग्रह बीटा पिक्टोरिस डी की प्रत्यक्ष तस्वीर भी खगोलविदों ने हासिल की थी। बीबीसी स्काई एट नाइट के अनुसार, उस समय इसे पृथ्वी से सीधे इमेज किया गया सबसे धुंधला एक्सोप्लैनेट बताया गया था।

बीटा पिक्टोरिस बी, बीटा पिक्टोरिस नाम के तारे की परिक्रमा करता है। यह तारा पृथ्वी से करीब 63 प्रकाश वर्ष दूर है।

इस ग्रह को रेडियो अध्ययन के लिए चुनने की एक खास वजह उसका केंद्रीय तारा भी है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, बीटा पिक्टोरिस अपेक्षाकृत चुंबकीय रूप से शांत तारा है। यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी एक्सोप्लैनेट से आने वाले बेहद कमजोर रेडियो संकेत को उसके तारे से आने वाले रेडियो उत्सर्जन से अलग करना बेहद मुश्किल होता है।

आम तौर पर तारे का संकेत इतना मजबूत हो सकता है कि उसके सामने ग्रह का रेडियो उत्सर्जन दब जाए।

बीटा पिक्टोरिस के मामले में अपेक्षाकृत शांत तारे ने वैज्ञानिकों को ग्रह से आने वाले संकेत को अलग करने में मदद की।


हजारों गुना मजबूत हो सकता है चुंबकीय क्षेत्र

रेडियो उत्सर्जन का अध्ययन करके वैज्ञानिकों ने बीटा पिक्टोरिस बी के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत का भी अनुमान लगाया।

अध्ययन के मुताबिक, इस ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी से हजारों गुना अधिक मजबूत है।

किसी दूर के ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र की यह जानकारी सिर्फ उस ग्रह की भौतिक विशेषताओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। इसका संबंध ग्रह के वायुमंडल की सुरक्षा से भी हो सकता है।

तारों से लगातार ऊर्जावान आवेशित कण निकलते रहते हैं, जिन्हें तारकीय हवा कहा जाता है। ये कण ग्रहों के वायुमंडल को प्रभावित कर सकते हैं। मजबूत चुंबकीय क्षेत्र ऐसे कणों से ग्रह के वातावरण को कुछ हद तक बचाने में भूमिका निभा सकता है।

पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र भी सूर्य से आने वाले आवेशित कणों के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यही कारण है कि दूसरे ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों को समझना वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण है।

क्या इसका मतलब वहां जीवन है?

नहीं।

बीटा पिक्टोरिस बी से रेडियो संकेत मिलने को जीवन के प्रमाण के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह ग्रह एक विशाल गैस दानव है और इसकी परिस्थितियां पृथ्वी जैसी नहीं हैं।

इस खोज का महत्व दूसरे स्तर पर है।

अगर किसी ग्रह का मजबूत चुंबकीय क्षेत्र उसके वायुमंडल को तारकीय हवा के प्रभाव से बचाने में मदद करता है, तो यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि दूसरे ग्रहों में ऐसे चुंबकीय क्षेत्र कितने आम हैं।

यह जानकारी भविष्य में छोटे, चट्टानी और संभावित रूप से रहने योग्य ग्रहों का अध्ययन करते समय उपयोगी हो सकती है।

किसी ग्रह के रहने योग्य होने के लिए हालांकि केवल चुंबकीय क्षेत्र पर्याप्त नहीं है। उसके तापमान, वायुमंडल, पानी की उपलब्धता, अपने तारे से दूरी और कई अन्य परिस्थितियों को भी देखना होगा।

बीटा पिक्टोरिस तंत्र पहले भी रहा है चर्चा में

बीटा पिक्टोरिस तंत्र 2026 में पहले भी खगोल विज्ञान की बड़ी खोजों में शामिल रहा है।

जुलाई 2026 में वैज्ञानिकों ने इसी तंत्र में मौजूद एक दूसरे ग्रह बीटा पिक्टोरिस डी की प्रत्यक्ष तस्वीर हासिल की थी। उस समय इसे पृथ्वी से सीधे इमेज किए गए सबसे धुंधले एक्सोप्लैनेट के रूप में रिपोर्ट किया गया था।

अब इसी तंत्र के बीटा पिक्टोरिस बी से रेडियो संकेतों की पुष्टि ने इस युवा ग्रह प्रणाली को एक्सोप्लैनेट अनुसंधान के लिए और महत्वपूर्ण बना दिया है।

आगे और ग्रहों की हो सकती है तलाश

वैज्ञानिकों के लिए अगला सवाल यह है कि क्या इसी तरह के रेडियो संकेत दूसरे गैस दानव एक्सोप्लैनेट से भी पकड़े जा सकते हैं।

अधिक शक्तिशाली और संवेदनशील रेडियो वेधशालाओं के आने से ऐसी खोजों की संख्या बढ़ सकती है। वैज्ञानिक दूसरे तारों के आसपास मौजूद बृहस्पति जैसे ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन कर सकते हैं और देख सकते हैं कि उनके तारे से आने वाली ऊर्जा के साथ उनका किस तरह का संबंध है।

इससे आकाशगंगा में मौजूद ग्रहों की विविधता को समझने के साथ-साथ यह भी पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कौन-सी परिस्थितियां किसी ग्रह को लंबे समय तक अपना वायुमंडल बनाए रखने में सक्षम बनाती हैं।

इस लिहाज से बीटा पिक्टोरिस बी से मिले रेडियो संकेत जीवन की खोज का सीधा प्रमाण नहीं, बल्कि उन भौतिक परिस्थितियों को समझने का नया माध्यम हैं जो भविष्य में रहने योग्य दुनिया की तलाश को अधिक वैज्ञानिक और व्यापक बना सकते हैं।