प्लास्टिक कचरा फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स, डाईंग रिजीम
स्वच्छता

कचरा संकट के खिलाफ संघर्ष: एक अंतहीन यात्रा की कहानी

कचरे की समस्या से जूझते हुए बिताया गया एक दशक भी अब बहुत छोटा महसूस होता है

Vishal Kumar

अभी कुछ समय पहले की बात है, वेस्ट वॉरियर्स सोसाइटी में मेरी टीम का एक सदस्य मेरे पास आया, उसका चेहरा लाल था, वह पसीने से तर-बतर था और उसने कहा कि उसके सीने में दर्द हो रहा है। साथ ही उसने बताया कि उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही है। वह कार्बन उत्सर्जन और उनके प्रभावों के बारे में पढ़ रहा था और यह भी कि पूरे अस्तित्वगत संकट को कम करने में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कितनी नगण्य भूमिका निभाएगा। इस बात ने उसे अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में हमारे कार्य के अर्थ और प्रभाव पर सवाल उठाने के लिए मजबूर कर दिया और विचारों के इसी चक्र के कारण उसे “पैनिक अटैक” आ गया।

मैं उस बेचैनी और डर से अनजान नहीं हूं जो दुनिया के पर्यावरण की स्थिति को समझने पर महसूस होता है। यह वह घबराहट थी जिसे मैंने पहली बार 2012 में महसूस किया था। चेन्नई से वाराणसी तक की 40 घंटे की ट्रेन यात्रा के दौरान जब मैंने दरवाजे और खिड़की से देश के बदलते परिदृश्य को देखा तो मेरी आंखें रेल की पटरियों पर बिखरे कचरे के कभी न खत्म होने वाले सिलसिले पर टिक गईं। वाराणसी में अपने सुंदर कॉलेज परिसर में घूमते हुए मैंने हर तरफ गंदगी देखी। यहां तक कि जंगलों की सैर या किसी पर्यटन स्थल का हाल भी वैसा ही था।

जिज्ञासा जगी और मैंने यह समझने के लिए विभिन्न शहरों में अनौपचारिक लैंडफिल साइटों (कचरा डंप करने की जगह) का दौरा करना शुरू किया कि सारा कचरा आखिर जाता कहां है और यह जानकर मैं हतप्रभ रह गया कि वह बस वहीं पड़ा रहता है। मैंने इस विषय पर और अधिक पढ़ना और वीडियो देखना शुरू किया। अमेरिका की एक पर्यावरण कार्यकर्ता एनी लियोनार्ड की 20 मिनट की एनिमेटेड डॉक्यूमेंट्री, “द स्टोरी ऑफ स्टफ” ने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला।

अपनी पढ़ाई के बाद मैंने अपशिष्ट प्रबंधन को ही अपना करियर बनाया। मैंने अपने तत्कालीन घर बेंगलुरु और उसके आसपास (प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे दोनों के लिए) औपचारिक और अनौपचारिक रीसाइक्लिंग इकाइयां स्थापित कीं, सामुदायिक जागरुकता और व्यवहार परिवर्तन के तंत्र बनाए, सरकारी विभागों और कॉर्पोरेट जगत के अगुवाओं की कार्यप्रणालियों के साथ-साथ “ग्रीनवाशिंग” को भी करीब से देखा। पिछले एक दशक में मैंने कचरा संकट को कम करने के लिए लगातार काम किया है।

फिर भी समस्या के पैमाने की तुलना में यह सब बहुत तुच्छ और अप्रासंगिक महसूस होता है। पिछले साल ही एक प्रोजेक्ट साइट की ओर जाते समय जहां हम वर्षों से सक्रिय थे, मैंने सड़क के किनारे हर तरफ कचरा बिखरा हुआ देखा। ऐसा लगा जैसे मैं कभी न खत्म होने वाली एक कठिन लड़ाई लड़ रहा हूं और हार रहा हूं।

मुझे पहले भी कई बार और उसके बाद भी ऐसा महसूस हुआ है। फिर भी मैं इसे यूं ही छोड़कर नहीं जा सकता। अलमित्रा पटेल जैसी कार्यकर्ता और संरक्षणवादी विल्मा रोड्रिग्स जैसे लोग जिन्होंने दशकों तक पर्यावरणीय कार्यों के लिए खुद को समर्पित किया है और मेरे उत्साही सहयोगियों से मिलने वाली प्रेरणा मुझे शक्ति और आशा देती है। मेरा काम मुझे प्रकृति में समय बिताने, हिमालय के ग्रामीण गांवों को देखने, पहाड़ों पर चढ़ने, पक्षियों को सुनने या बस पेड़ों के बीच रहकर उस जुड़ाव को महसूस करने के भरपूर अवसर देता है।

मुझे अहसास हुआ है कि यह यात्रा केवल बाहरी बदलाव लाने के बारे में नहीं है, बल्कि यह स्वयं की खोज भी है। जब मैं शांति और संतोष महसूस करता हूं तो मैं कम अस्वास्थ्यकर पैकेटबंद भोजन का सेवन करता हूं और इसलिए कम कचरा पैदा करता हूं। जब मैं चिंतित या तनाव में होता हूं तो मेरी इच्छाशक्ति गायब हो जाती है। मैंने दूसरों में भी इस पैटर्न को नोटिस करना शुरू किया। धीरे-धीरे मुझ पर यह बात स्पष्ट हो गई है कि जो मेरे लिए अच्छा है, वही पर्यावरण के लिए भी अच्छा है। इसलिए मुझे केवल बाहरी जलवायु संकट या पर्यावरणीय चुनौतियों को हल करने की तलाश नहीं करनी है, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर एक अच्छा जीवन भी जीना है।