सरकार का कहना है कि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से बुंदेलखंड का जल संकट काफी हद तक खत्म हो जाएगा। इस दावे में कितना दम है? आपको इस परियोजना का वास्तविक उद्देश्य क्या दिखाई देता है?
आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, यह परियोजना मूलतः बुंदेलखंड का पानी बुंदेलखंड के बाहर पहुंचाने की योजना है। सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (सीईएसी) की रिपोर्ट में भी विस्तार से बताया गया है कि यह परियोजना पहले हुई अन्य बड़ी योजना संबंधी गलती को सुधारने के बजाय, एक नई गलती को जन्म देती है। पहले राजघाट, माताटीला और अन्य बांधों की जो योजना बनाई गई, उसके कारण बेतवा बेसिन में जल प्रबंधन की समस्या पैदा हुई। अब उस समस्या के समाधान के लिए केन नदी का पानी बेतवा में स्थानांतरित किया जा रहा है, ताकि ऊपरी बेतवा क्षेत्र में नए बांध बनाए जा सकें।
जहां तक बुंदेलखंड का सवाल है, उस समय पन्ना के तत्कालीन कलेक्टर ने योजना आयोग और मध्य प्रदेश जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव को लिखे पत्र में कहा था कि अपर केन बेसिन में अभी पानी का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है, इसलिए ऐसा कृत्रिम रूप से प्रतीत होता है कि केन नदी में अधिशेष (सरप्लस) पानी उपलब्ध है। उन्होंने यह भी लिखा था कि यदि 1983 की केन मल्टीपर्पज परियोजना को पूरी तरह लागू कर दिया जाए, तो केन नदी में अतिरिक्त पानी नहीं बचेगा। वह पानी पन्ना, छतरपुर और केन बेसिन के अन्य क्षेत्रों की सिंचाई और पेयजल में ही इस्तेमाल हो जाएगा। जब मूल केन-बेतवा परियोजना तैयार की गई थी, तब पन्ना जिले का लाभार्थियों की सूची में नाम तक नहीं था। बाद में जब यह सवाल उठा कि पन्ना को इस परियोजना से क्या मिलेगा, तब उसमें संशोधन कर कुछ लाभ पन्ना के लिए भी जोड़ दिए गए। मूल समझौते के अनुसार, ढोढन बांध के नीचे बरियारपुर और गंगऊ बैराजों के माध्यम से पानी का जो डायवर्जन मध्य प्रदेश में होना था, यदि वह पूरी तरह लागू होता, तब भी केन नदी में कोई वास्तविक अधिशेष पानी नहीं बचता। मेरा मानना है कि ऐतिहासिक रूप से बुंदेलखंड के पानी का उपयोग बुंदेलखंड के भीतर, बुंदेलखंड के लिए होना चाहिए था और होना भी चाहिए। इसके बजाय अब उसी पानी को क्षेत्र के बाहर ले जाने की योजना बनाई जा रही है। इसके बदले बुंदेलखंड को क्या मिलेगा? मेरे विचार से उसे सबसे बड़ा नुकसान झेलना पड़ेगा। इसके अलावा, डाउनस्ट्रीम में बहने वाली केन नदी का प्राकृतिक प्रवाह गंभीर रूप से प्रभावित होगा, जबकि अपस्ट्रीम क्षेत्र एक विशाल जलाशय में बदल जाएगा। इतने बड़े पैमाने पर वन कटाई और नदी तंत्र में हस्तक्षेप के दीर्घकालिक पर्यावरणीय परिणाम होंगे, जिनका गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए।
दूसरी बात, इसे नदी जोड़ (रिवर लिंकिंग) परियोजना कहा जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से यह वास्तव में एक जल स्थानांतरण (वाटर ट्रांसफर) और लिफ्ट परियोजना है। केन नदी का पानी नहर के माध्यम से बेतवा नदी तक पहुंचाया जाएगा। चूंकि बेतवा का स्तर ऊंचा है, इसलिए पानी को लिफ्ट (पंप करके ऊपर उठाकर) करके पहुंचाना पड़ेगा।
ढोढन बांध के नीचे महोबा, बांदा और छतरपुर के सैकड़ों गांव हैं। यहां पेयजल, सिंचाई और खेती पर प्रोजेक्ट का क्या प्रभाव पड़ेगा?
बांदा शहर और उसके आसपास के क्षेत्र अपनी जल आवश्यकताओं के लिए काफी हद तक केन नदी पर निर्भर हैं। यही स्थिति डाउनस्ट्रीम के गांवों की भी है। चाहे खेती की सिंचाई हो, पीने का पानी हो या भूजल का पुनर्भरण, हर दृष्टि से केन नदी इन क्षेत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरह से यह पूरे इलाके के लिए वरदान है। यदि नदी का प्राकृतिक प्रवाह कम हो गया, तो इसका सीधा असर इन सभी गतिविधियों पर पड़ेगा। आप पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) या अन्य उपलब्ध अध्ययन देख लीजिए, कहीं भी यह स्पष्ट विश्लेषण नहीं मिलेगा कि डाउनस्ट्रीम के गांवों, उनकी जल उपलब्धता, कृषि और पारिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसी तरह पर्यावरणीय प्रवाह का भी कोई वैज्ञानिक आकलन प्रस्तुत नहीं किया गया है कि नदी को जीवित बनाए रखने के लिए पूरे वर्ष कितना पानी छोड़ा जाना आवश्यक है। जबकि यह केवल तकनीकी नहीं, बल्कि कानूनी शर्त भी है। वन स्वीकृति (फॉरेस्ट क्लियरेंस) के स्टेज-I और स्टेज-II, तथा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) की स्वीकृतियों में स्पष्ट शर्त रखी गई है कि केन नदी के डाउनस्ट्रीम हिस्से में जहां वह यमुना से मिलती है, वहां तक पूरे वर्ष पर्याप्त जल प्रवाह बना रहना चाहिए। इसके लिए आवश्यक पानी का पहले से आरक्षण किया जाना चाहिए। विशेष रूप से गैर-मॉनसून अवधि में जलाशय में जितना पानी आए, वह पूरा पानी डाउनस्ट्रीम में छोड़ा जाना चाहिए। मेरी जानकारी में इन शर्तों का पालन नहीं किया जा रहा है। इस परियोजना में पर्यावरणीय और वन स्वीकृतियों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण शर्तों का उल्लंघन हो रहा है।
परियोजना की लगभग हर स्वीकृति प्रक्रिया में गंभीर प्रक्रियागत प्रश्न और कानूनी आपत्तियां मौजूद हैं
पर्यावरणीय दृष्टि से प्रोजेक्ट में आपको सबसे बड़ी कमियां क्या दिखाई देती हैं? किन पहलुओं की सबसे अधिक अनदेखी हुई है?
सबसे पहले, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और उसके तहत होने वाली पर्यावरणीय प्रभाव आकलन तथा पर्यावरण स्वीकृति की प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया है। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट की गुणवत्ता भी बेहद खराब है। उदाहरण के लिए, उसमें यह तक लिखा गया है कि इस परियोजना से केन नदी की मछलियों को यमुना तक पहुंचने के लिए शॉर्टकट मिल जाएगा, मानो यह परियोजना उनके लिए लाभकारी हो। इतना ही नहीं, रिपोर्ट में कुछ ऐसी वनस्पति और जीव जंतुओं की प्रजातियों का उल्लेख है जो केवल मणिपुर में पाई जाती हैं। मेरा मानना है कि यह सामग्री पहले मणिपुर की टिपाईमुख बांध परियोजना की रिपोर्ट से कॉपी-पेस्ट की गई और प्रजातियों के नाम तक बदले नहीं गए। इसी तरह पन्ना टाइगर रिजर्व पर पड़ने वाले प्रभाव, बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, बाघों, गिद्धों, घड़ियालों, महसीर मछली, डाउनस्ट्रीम नदी तंत्र, जल विज्ञान और पर्यावरणीय प्रवाह जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर पर्याप्त और संतोषजनक विश्लेषण नहीं मिलता। परियोजना के विकल्पों का भी समुचित मूल्यांकन नहीं हुआ।
मैं लगभग 15 वर्ष पहले जल संसाधन मंत्रालय की रिवर लिंकिंग विशेषज्ञ समिति का सदस्य रहा हूं। उस समय भी यही परामर्शदाता इस परियोजना से जुड़े अध्ययन तैयार कर रहा था। हमने विशेषज्ञ समिति में आग्रह किया कि उन्हें बुलाकर उनके अध्ययन की गुणवत्ता पर सवाल किए जाएं। जब प्रस्तुति के दौरान हमने तकनीकी प्रश्न उठाए तो वे उनका संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। इसके बावजूद उसी अध्ययन के आधार पर पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ती रही।
इसी रिपोर्ट के आधार पर जनसुनवाई आयोजित की गई। जनसुनवाई के दौरान लोगों को खुलकर सवाल पूछने का अवसर नहीं दिया गया और आपत्तियां प्रभावी ढंग से दर्ज नहीं होने दी गईं। बाद में जब परियोजना पर्यावरण स्वीकृति के लिए एक्सपर्ट अप्रैजल कमिटी (ईएसी) के सामने आई, तो हमने कई पत्र लिखकर इस परियोजना की खामियों, जनसुनवाई की कमियों और पर्यावरणीय मुद्दों की ओर ध्यान दिलाया। इन आपत्तियों के बाद ईएसी ने लगातार चार बैठकों तक कई गंभीर सवाल उठाए।
समिति ने पूछा कि 2016 की गंगा बेसिन अधिसूचना के अनुसार, इस परियोजना को पहले संबंधित समिति के पास क्यों नहीं भेजा गया। उसने यह भी कहा कि भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) द्वारा किया जा रहा लैंडस्केप इम्पैक्ट असेसमेंट अभी पूरा नहीं हुआ है, जबकि वह पर्यावरण प्रबंधन योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समिति ने यह भी सवाल उठाया कि जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषय का परियोजना दस्तावेजों में पर्याप्त उल्लेख क्यों नहीं है।
मेरे अनुसार, इन्हीं सवालों के बीच तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि अगली बैठक में परियोजना को स्वीकृति नहीं दी गई तो वह विशेषज्ञ समिति के खिलाफ धरने पर बैठेंगी। इसके बाद भी जब स्वीकृति नहीं मिली, तो पूरी ईएसी को भंग कर दिया गया और नई समिति गठित की गई। नई समिति के अध्यक्ष तीन महीने बाद राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (एनडब्ल्यूडीए) के महानिदेशक बने, जो स्वयं इस परियोजना को विकसित करने वाली संस्था है। नई समिति ने अपनी पहली ही बैठक में पिछली समिति द्वारा उठाए गए लगभग सभी प्रश्नों को दरकिनार करते हुए परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी।
इसी प्रकार यदि आप वन स्वीकृति, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्वीकृति, सीईसी की रिपोर्ट और राज्य व केंद्र स्तर की अन्य स्वीकृतियों को देखें, तो मुझे लगता है कि हर स्तर पर गंभीर प्रक्रियागत अनियमितताएं हुई हैं। इस परियोजना की स्वीकृति प्रक्रिया में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, वन (संरक्षण) अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम तथा संबंधित अधिसूचनाओं की भावना और प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है। इसलिए मेरा मानना है कि परियोजना की लगभग हर स्वीकृति प्रक्रिया में गंभीर प्रक्रियागत प्रश्न और कानूनी आपत्तियां मौजूद हैं।
इस परियोजना के स्थान पर बुंदेलखंड में जल संकट के समाधान के लिए आप कौन से विकल्प सुझाएंगे?
देखिए, सबसे पहले यह समझना होगा कि बुंदेलखंड में औसतन लगभग 900 मिलीमीटर वर्षा होती है। यह कोई कम वर्षा नहीं है। राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों, मराठवाड़ा, उत्तर कर्नाटक, कच्छ-सौराष्ट्र और तमिलनाडु के कई हिस्सों की तुलना में बुंदेलखंड में अधिक वर्षा होती है। इसलिए समस्या वर्षा की मात्रा की नहीं, बल्कि उस पानी के संरक्षण और उपयोग की व्यवस्था की है। चंदेल शासकों ने इसी आवश्यकता को समझते हुए तालाबों, जलाशयों और अन्य पारंपरिक जल संरचनाओं का एक व्यापक तंत्र विकसित किया था। यही स्थानीय जल प्रबंधन प्रणाली बुंदेलखंड की सबसे बड़ी ताकत थी।
मेरे विचार से यदि इन पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन किया जाए, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जलग्रहण क्षेत्र विकास को प्राथमिकता दी जाए, तो अपेक्षाकृत कम लागत में जल संकट का कहीं अधिक टिकाऊ समाधान बहुत जल्द और बिना किसी व्यापक प्रभाव के संभव है। यही कारण है कि मैं बड़े और महंगे अंतर-नदी जोड़ परियोजनाओं की बजाय स्थानीय, विकेंद्रीकृत और पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों को अधिक प्रभावी विकल्प मानता हूं।