The Ganga river flowed above the danger mark for many days in August in Rishikesh. Photo: iStock 
नदी

32 फीसदी एसटीपी गंगा में छोड़ रहे गैर शोधित सीवेज, उत्तराखंड में करीब 1000 करोड़ रुपए खर्च के बावजूद देवप्रयाग से हरिद्वार तक प्रदूषित  

करोड़ों खर्च कर बनाए गए सांकेतिक एसटीपी, महज 3 से 4 फीसदी क्षमता पर कर रहे काम

Vivek Mishra

एक कहावत है ज्यों-ज्यों दवा की त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया। गंगा के मामले में यह बात सौ फीसद सटीक बैठती है। या यूं कहें कि मर्ज जानने के बाद भी कभी सही दवा की ही नहीं गई। 1985 से करीब 40 साल गंगा की सफाई अभियान को बीत चुके हैं लेकिन गंगा साफ होने के बजाए और प्रदूषित होती जा रही हैं। उत्तराखंड जहां गंगा नदी की पहली धारा मौजूद है, वही उसे गंभीर घरेलू प्रदूषण झेलना पड़ रहा है। उत्तराखंड में 44 में से 12 एसटीपी यानी 32 फीसदी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) अपर्याप्त क्षमता और नालों के ठीक से न जुड़ने के कारण गंगा और उसकी सहायक नदियों में अनुपचारित सीवेज छोड़ रहे हैं।

उत्तराखंड में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट उन सभी दावों की पोल खोलती है जिन्हें गंगा सफाई के नाम पर दिखावे के लिए किया गया। सीएजी की ताजा रिपोर्ट में 2018 से 2023 की अवधि में उत्तराखंड में जमीन पर उतारी गई परियोजनाओं की परफॉरमेंस ऑडिट की है। इस रिपोर्ट को हाल ही में विधानसभा सत्र में टेबल किया गया था। इस रिपोर्ट का डाउन टू अर्थ ने विश्लेषण किया है।

ऑडिट के मुताबिक, फिजिकल इंसपेक्शन में पाया गया कि जिन 12 एसटीपी के द्वारा गंगा में अनुपचारित सीवेज छोड़ रहे थे दरअसल इसके पीछे अलग-अलग तकनीकी व संचालन संबंधी कारण थे। ऋषिकेश के चंद्रेश्वर नगर/ढालवाला स्थित 7.50 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) क्षमता वाले एसटीपी में उपचार क्षमता कम होने के कारण सीवेज सीधे छोड़ा जा रहा था। कीर्तिनगर के 10 किलोलीटर प्रतिदिन (केएलडी) एसटीपी में भी यही समस्या रही। रुद्रप्रयाग के बेलनी रोड स्थित 50 केएलडी एसटीपी में बारिश के दौरान नाला टैपिंग के नष्ट हो जाने से, एसबीआई के पास स्थित 100 केएलडी एसटीपी में नाला टैपिंग टूटने से, बस स्टैंड के पास 75 केएलडी एसटीपी में अतिरिक्त ग्रे वाटर आने और क्षमता कम होने से तथा स्टील ब्रिज के पास 125 केएलडी एसटीपी में भी अपर्याप्त क्षमता के कारण सीवेज बिना उपचार के बहता रहा। श्रीकोट के 75 केएलडी एसटीपी में भी क्षमता की कमी सामने आई। गोपेश्वर के पोखरी बेंड स्थित 1.25 एमएलडी एसटीपी में पापड़ियाना नाले की टैपिंग बारिश में पूरी तरह नष्ट हो गई, जिसे संचालन एजेंसी ने ठीक नहीं किया। कर्णप्रयाग में भी कई एसटीपी प्रभावित रहे, जहां पुराने पुल के पास 100 केएलडी एसटीपी में आसपास के घरों से ग्रे वाटर का टैपिंग नहीं हो सका, वार्ड नंबर 1 और 3 के 100 केएलडी तथा नए पुल के पास 50 केएलडी एसटीपी में नाला टैपिंग में लीकेज रहा, जबकि पुलिस चौकी के पास 50 केएलडी एसटीपी में नाला टैपिंग जाम हो गया। इन सभी मामलों से स्पष्ट होता है कि तकनीकी खामियों, रखरखाव की कमी और खराब योजना के कारण बड़ी संख्या में एसटीपी गंगा में गंदा पानी जाने से रोकने में विफल रहे।

ऑडिट में पाया गया कि एसटीपी के रखरखाव के लिए जिम्मेदार ठेकेदार ने जानबूझकर कलेक्शन टैंक से कच्चा सीवेज सीधे गंगा में छोड़ दिया, जिसे 9 फरवरी 2023 को एक आकस्मिक निरीक्षण के दौरान पकड़ा गया। इसके बावजूद विभाग ने न तो ठेकेदार के खिलाफ और न ही जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की।

वहीं, सीवेज संयंत्रों के ढांचे की हालत इतनी खराब थी कि 44 में से 18 एसटीपी को रखरखाव एजेंसी ने अपने जिम्मे लेने से ही इनकार कर दिया। एजेंसी ने निर्माण, संचालन और सुरक्षा से जुड़ी गंभीर खामियों—जैसे सीवेज का ओवरफ्लो, मानकों का पालन न होना और असुरक्षित निर्माण का हवाला दिया है और कई मामलों में हैंडओवर पांच साल तक लंबित रहा। नतीजा यह हुआ कि एसटीपी के संचालन और निगरानी की पूरी व्यवस्था ही चरमरा गई।

रिपोर्ट के  अनुसार जनवरी से मार्च 2023 के बीच जांचे गए 44 एसटीपी में से केवल 5 ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के मानकों पर खरे उतरे, जबकि 35 असफल रहे। अगस्त से नवंबर 2023 के बीच स्थिति और बिगड़ी, जब केवल तीन एसटीपी ही मानकों का पालन कर पाए और 36 असफल रहे, वहीं 33 संयंत्र पर्यावरण मंत्रालय के मानकों पर भी खरे नहीं उतरे।

खराब जलगुणवत्ता : न प्रयोगशाला की जांच और न ही सही आंकड़े

इसी अवधि में पानी की गुणवत्ता के आंकड़े बेहद चिंताजनक रहे। ऑडिट के अनुसार, फीकल कोलिफॉर्म यानी पानी में मल से होने वाले बैक्टीरिया के संकेतक का सुरक्षित स्तर 1000 मोस्ट प्रॉबेबल नंबर (एमपीएन) प्रति 100 मिलीलीटर से कम होना चाहिए। लेकिन जांच में यह स्तर 1700 से बढ़कर 24 × 10¹¹ तक पहुंच गया। इसका मतलब है कि पानी में गंदगी और मलजनित प्रदूषण खतरनाक स्तर तक बढ़ चुका था, जो सीधे तौर पर सीवेज के मिलान और अपर्याप्त उपचार को दिखाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, हरिद्वार में गंगा जल की गुणवत्ता पूरे ऑडिट काल में ‘बी’ श्रेणी में ही बनी रही, जबकि ऋषिकेश में 2019 से 2023 के बीच यह ‘बी’ श्रेणी में रही और केवल कोविड-19 के दौरान 2020-21 में अस्थायी रूप से ‘ए’ श्रेणी तक सुधरी।

देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच मात्र 93 किलोमीटर की दूरी में टोटल कोलिफॉर्म का स्तर 32 गुना तक बढ़ गया, जो प्रदूषण के बढ़ते दबाव को स्पष्ट करता है।

इतना ही नहीं उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एनएबीएल मान्यता के लिए 16.21 करोड़ रुपये दिए गए, लेकिन पांच वर्षों में केवल 5.55 करोड़ रुपये यानी 34 प्रतिशत ही खर्च किए गए और इस दौरान किसी भी प्रयोगशाला के लिए मान्यता के लिए आवेदन तक नहीं किया गया। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड और राज्य बोर्ड के आंकड़ों में बड़ा अंतर था। मार्च 2023 में जहां राज्य बोर्ड ने फीकल कोलिफॉर्म 58 दर्ज किया, वहीं केंद्रीय बोर्ड ने उसी के लिए 14 × 10³ दर्ज किया, जो निगरानी प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।

नहीं जोड़े गए सीवेज नेटवर्क से घर

यह ऑडिट रिपोर्ट गंगा सफाई के जमीनी काम पर सवाल उठाती है। रिपोर्ट के मुताबिक नमामि गंगे प्रोग्राम के तहत 2014 से 2023 के बीच 14,260 करोड़ रुपए  जारी किए गए। इसमें 2018 से 2023 के बीच उत्तराखंड के लिए 1149 करोड़ रुपए स्वीकृत हुए और राज्य को 985.98 करोड़ रुपए दिए गए। उत्तराखंड ने छह सालों में कुल 873.17 करोड़ रुपए खर्च किया लेकिन घरेलू सीवेज प्रदूषण को गंगा में जाने से रोकने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और घरों को सीवेज नेटवर्क से जोड़ने का काम नहीं पूरा किया जा सका।

इतना ही नहीं “सांकेतिक एसटीपी” बनाए गए। रिपोर्ट के मुताबिक सात कस्बों में 21 एसटीपी बनाए गए लेकिन वह एक भी घर से नहीं जोड़े गए। सीएजी ने इने कहा कि यह प्रकृति में सांकेतिक है। इनमें नंदप्रयाग में दो एसटीपी, कर्णप्रयाग में पांच एसटीपी, रुद्रप्रयाग में छह एसटीपी, कीर्तिनगर में दो एसटीपी, चमोली में एक एसटीपी, श्रीनगर और श्रीकोट में तीन एसटीपी तथा जोशीमठ में दो एसटीपी शामिल हैं।

महज 3 से 4 फीसदी क्षमता पर काम कर रहे एसटीपी

सीएजी ने जोशीमठ में एसटीपी की स्थिति को लेकर रिपोर्ट में कहा, “2010 और 2017 की योजनाओं के तहत  42.73 करोड़ रुपए खर्च कर विकसित किया गया बुनियादी ढांचा किसी भी घर को सीवेज कनेक्शन देने में शामिल नहीं था।” यानी करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद वास्तविक सीवर कनेक्शन ही नहीं हुआ। इसके अलावा एसटीपी अपग्रेड के नाम पर एक करोड़ रुपए की अनियमितता भी सीएजी ने पाई है।

रिपोर्ट में हरिद्वार स्थित 68 मिलियन लीटर प्रति दिन ( एमएलडी) क्षमता वाले एसटीपी के बारे में बताया गया है कि मार्च 2023 में यह संयंत्र औसतन 71 एमएलडी सीवेज का उपचार कर रहा था, जबकि एक दिन में अधिकतम 84 एमएलडी तक इनफ्लो दर्ज किया गया। इसका मतलब यह हुआ कि इस एसटीपी की निर्धारित क्षमता वर्ष 2023 में ही पूरी तरह भर गई, जबकि इसे 2028 तक के लिए डिजाइन किया गया था।

ऋषिकेश के 5 एमएलडी एसटीपी का उल्लेख है, जहां सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) की टीम ने 20 जून 2023 को निरीक्षण के दौरान पाया कि इस संयंत्र पर 17 एमएलडी सीवेज पहुंच रहा था, जो इसकी क्षमता से कई गुना अधिक है।

वहीं, देवप्रयाग के एसटीपी की स्थिति बिल्कुल उलट सामने आती है, जहां अपर्याप्त सीवेज इनफ्लो के कारण संयंत्र अपनी क्षमता के केवल 3-4 प्रतिशत पर ही संचालित हो रहा है। यह स्थिति दिखाती है कि कहीं क्षमता से अधिक दबाव है तो कहीं बुनियादी ढांचा लगभग बेकार पड़ा है।

सीवर नेटवर्क से बाहर कई घर

सीवर नेटवर्क की स्थिति भी बेहद कमजोर रही। चमोली-गोपेश्वर में कुल 5,510 घरों में से केवल 354 घरों (6.42%) को ही कनेक्शन मिला। उत्तरकाशी में 6,089 घरों में से 572 (9.39%) और श्रीनगर में 6,523 घरों में से 797 (12.22%) घर ही जुड़े। अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति ऋषिकेश की रही, जहां 34,756 घरों में से 9,966 (28.67%) को कनेक्शन दिया गया। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि अधिकांश शहरों में बड़ी संख्या में घर अब भी सीवरेज नेटवर्क से बाहर हैं।

13 साल बीते लेकिन नहीं बनाया नदी बेसिन प्रबंधन योजना

रिपोर्ट की शुरुआत ही योजना निर्माण की बुनियादी खामी से होती है, जिसमें कहा गया है कि राज्य स्तर पर नदी प्रबंधन का कोई ठोस खाका तैयार नहीं किया गया। ऑडिट में दर्ज है: “ऑडिट में पाया गया कि एसएमसीजी ने अपनी स्थापना के 13 साल बाद भी राज्य स्तर का नदी बेसिन प्रबंधन योजना तैयार नहीं किया।” साथ ही जिला स्तर पर भी स्थिति समान रही: “जिला गंगा समितियों (डीजीसी) ने भी किसी भी जिले में जिला स्तर की नदी बेसिन प्रबंधन योजना तैयार नहीं की…।” इसका सीधा मतलब यह है कि बिना समग्र, नदी आधारित योजना के करोड़ों रुपये की परियोजनाएं आगे बढ़ाई गईं।

स्थानीय भागीदारी की कमी भी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से सामने आती है। इसमें कहा गया: “राज्य गंगा समिति, एसएमसीजी और क्रियान्वयन एजेंसियों ने नमामि गंगे के ढांचे की योजना बनाने में स्थानीय लोगों को शामिल नहीं किया।”

सामाजिक ऑडिट के हवाले से यह भी जोड़ा गया कि “लोग नमामि गंगे के तहत बनाए गए सीवरेज ढांचे से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि एसएमसीजी ने योजना और क्रियान्वयन में स्थानीय लोगों को शामिल नहीं किया और अनुपयुक्त ढांचा तैयार किया।” यह दर्शाता है कि योजनाएं ऊपर से थोपी गईं और स्थानीय जरूरतों से मेल नहीं खाती थीं।

राज्य सरकार की भूमिका पर भी रिपोर्ट में सीधी टिप्पणी की गई है। ऑडिट में दर्ज है: “राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से 16 गंगा फ्रंट कस्बों में एक भी एसटीपी या अन्य स्वच्छता ढांचा नहीं बनाया।” इसका परिणाम यह हुआ कि पूरा ढांचा केंद्रीय योजना पर निर्भर रहा और राज्य स्तर पर निवेश लगभग नगण्य रहा।

खराब जगहों पर एसटीपी

रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि गंगा सफाई के नाम पर तैयार किया गया ढांचा कई जगह खुद जोखिम और विफलता का कारण बन गया। 44 में से 17 एसटीपी ऐसे स्थानों पर बनाए गए थे जो खड़ी ढलानों या नदी तल के पास स्थित हैं, जिससे उनके भौतिक रूप से क्षतिग्रस्त होने का खतरा बना हुआ है। इसी संदर्भ में एक मामले में 88 लाख की लागत से बना एसटीपी भूस्खलन में पूरी तरह नष्ट हो गया और उपयोग के लायक नहीं बचा।

रिपोर्ट में एक गंभीर हादसे का भी जिक्र है, जिसमें चमोली के एक एसटीपी में करंट लगने से 28 लोग प्रभावित हुए और 16 लोगों की मौत हो गई। यह घटना न केवल सुरक्षा मानकों की अनदेखी को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि गंगा सफाई के नाम पर बनाए गए ढांचे कई जगह खुद ही जोखिम का कारण बन गए हैं।

किसानों को बांटा गया एसटीपी का खतरनाक स्लज

सीवेज ट्रीटमेंट के बाद निकलने वाले कीचड़ (स्लज) के प्रबंधन में भी गंभीर लापरवाही सामने आई है। हरिद्वार के तीन एसटीपी से 64,292 घन मीटर स्लज पैदा हुआ, जिसमें से 51,071 घन मीटर किसानों में बांट दिया गया।

इस कच्चे स्लज में जिंक 2,730 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम और कैडमियम 18.51 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक पाया गया, जो निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक है। इसके बावजूद इस खतरनाक सामग्री को खेतों में उपयोग के लिए दे दिया गया। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 4.93 करोड़ रुपए की लागत से बना स्लज प्रबंधन संयंत्र शुरू होने के बाद भी कभी चलाया ही नहीं गया, जबकि ठेकेदार को पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया था।

स्वप्न है गंगा की वानिकी

पर्यावरणीय उपायों के नाम पर खर्च की स्थिति भी बेहद कमजोर रही। रिपोर्ट के अनुसार वनीकरण के लिए निर्धारित ₹885.91 करोड़ में से केवल ₹144.27 करोड़ यानी करीब 16 प्रतिशत ही खर्च किए गए। वहीं, 11 श्मशानों में से 10 का उपयोग ही नहीं हुआ और एक का उपयोग भी बेहद कम रहा, जबकि इनमें से किसी के लिए स्थानीय लोगों की मांग तक नहीं थी। ठोस कचरा प्रबंधन की स्थिति और भी खराब रही, सात वर्षों (2017-18 से 2022-23) में एक भी शहरी निकाय को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए अधिकृत नहीं किया गया।

वित्तीय प्रबंधन में भी गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। ठेकेदारों से ₹20.59 करोड़ की लिक्विडेटेड डैमेज वसूली जानी थी, लेकिन केवल ₹0.89 करोड़ ही वसूले गए, जिससे ₹19.70 करोड़ की कमी रह गई। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी रूड़की द्वारा सुझाए गए सख्त मानकों जहां फीकल कोलिफॉर्म का स्तर शून्य होना चाहिए था वहां टेंडर प्रक्रिया के दौरान ढीला कर 100 एमपीएन प्रति 100 मि.ली. कर दिया गया।

बहरहाल तेजी से बढ़ती आबादी, जीवन स्तर में वृद्धि और औद्योगीकरण व शहरीकरण के तीव्र विस्तार ने गंगा नदी को प्रदूषण के गंभीर खतरे में डाल दिया है लेकिन सरकारी कामकाज इसे मृत बना देना चाहती है। गंगा की पवित्रता को बनाए रखने के लिए सरकार का हस्तक्षेप चार दशक से भी पुराना है। नदी में प्रदूषण नियंत्रित करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 1985 में गंगा एक्शन प्लान फेज वन  शुरू किया, जिसके तहत तीन राज्यों, उत्तर प्रदेश (तत्कालीन उत्तराखंड सहित), बिहार और पश्चिम बंगाल के 25 क्लास-1 शहरों (एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों) में उत्पन्न अपशिष्ट जल को रोकने, मोड़ने और उपचारित करने का लक्ष्य रखा गया।

इसके बाद 1993 में गंगा एक्शन प्लान फेज II शुरू किया गया, जिसे बाद में इसकी सहायक नदियों जैसे यमुना नदी, दामोदर नदी औऱ गोमती नदी तक विस्तारित किया गया। गंगा एक्शन प्लान की मुख्य योजनाएं इंटरसेप्शन और डायवर्जन तथा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से जुड़ी थीं।

जीएपी का मुख्य फोकस शहरी अपशिष्ट जल पर था, लेकिन योजना और क्रियान्वयन की कई कमियों के कारण यह अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। 2009 में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी  की स्थापना गंगा की सफाई की दिशा में एक और कदम था। इसके बाद 2014 में एक समेकित गंगा संरक्षण मिशन के रूप में नमामि गंगे प्रोग्राम की शुरुआत की गई। जिसमें अब एक बार फिर कामकाज पर सीएजी ने सवाल उठाए हैं।