नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सामने पहुंचा नर्मदा नदी का एक मामला आस्था और पर्यावरण के टकराव को उजागर करता है। मध्य प्रदेश के सीहोर जिला में धार्मिक आयोजन के दौरान 11,000 लीटर दूध और 210 साड़ियां नदी की धारा में प्रवाहित करने का आरोप है।
इस घटना पर एनजीटी ने सख्त रुख अपनाते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मध्य प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से पूछा है कि क्या नदियों में ऐसी सामग्री प्रवाहित करने को लेकर कोई नियम मौजूद हैं, और यदि नहीं, तो क्या नए दिशा-निर्देश बनाए जाने चाहिए।
याचिका में चेताया गया है कि इतनी बड़ी मात्रा में दूध और कपड़े नदी में डालने से जल प्रदूषण बढ़ सकता है, जिससे जलीय जीवन, पारिस्थितिकी और नदी किनारे बसे गांवों के पेयजल व सिंचाई पर असर पड़ सकता है। अदालत ने वैज्ञानिक जांच कराने और विशेषज्ञों की रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
क्या आस्था के नाम पर नदियों में हजारों लीटर दूध और अन्य सामग्रियां विसर्जित करना सही है? इस गंभीर विषय पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है।
18 मई 2026 को ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और मध्य प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्या नदियों में दूध जैसी सामग्री प्रवाहित करने को लेकर कोई नियम या गाइडलाइंस हैं? और यदि नहीं हैं, तो क्या इसके लिए नए नियम बनाने की जरूरत है?
यह मामला नर्मदा नदी की एक सहायक धारा से जुड़ा है, जो मध्य प्रदेश के सीहोर जिले की नशरुल्लागंज तहसील के सतदेव और भेरूदा गांवों से होकर गुजरती है।
क्या है पूरा मामला?
आरोप है कि ग्राम पंचायत सतदेव द्वारा आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम में 11,000 लीटर दूध नदी में विसर्जित कर दिया गया। इसके साथ ही धारा में 210 साड़ियां के प्रवाहित किए जाने की बात भी सामने आई है।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह बड़ी मात्रा में दूध और वस्त्र नदी में डालने से पानी दूषित हो सकता है, जिससे नदी की पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ेगा। साथ ही इससे नीचे की ओर बसे गांवों के लोगों के पीने और सिंचाई के पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।
आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन की दरकार
मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने निर्देश दिया कि याचिका और संबंधित दस्तावेजों की एक प्रति केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के भोपाल क्षेत्रीय निदेशक और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण के सदस्य सचिव को भेजी जाए। साथ ही एनजीटी ने यह भी कहा कि वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर विशेषज्ञों से जांच कराई जाए और रिपोर्ट अदालत में पेश की जाए।
अदालत ने कहा है कि यदि इस तरह की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश जरूरी हों, तो संबंधित प्रक्रिया अपनाकर उसका प्रस्ताव भी अदालत के सामने रखा जाए। यह मामला आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर सवाल खड़ा करता है, क्या धार्मिक परंपराओं के नाम पर नदियों को दूषित करना स्वीकार किया जा सकता है?