ऑस्ट्रिया के यूनिवर्सिटी ऑफ ग्राज की पर्यावरण विज्ञानी डॉ. विक्टोरिया मूलर 
नदी

“गंगा में पीएफएएस प्रदूषण हमारी कल्पना से कहीं बड़ा”

ऑस्ट्रिया के यूनिवर्सिटी ऑफ ग्राज की पर्यावरण विज्ञानी डॉ. विक्टोरिया मूलर ने विवेक मिश्रा से बातचीत में कहा कि पीएफएएस जैसे स्थायी रसायनों की निगरानी के लिए अब केवल पारंपरिक जांच पर्याप्त नहीं

Vivek Mishra

आपके अध्ययन में 40 ज्ञात पीएफएएस रसायनों की पहचान हुई, लेकिन वे कुल फ्लोरीनयुक्त प्रदूषण के एक प्रतिशत से भी कम निकले। आखिर बाकी 99 प्रतिशत क्या हैं?

यह बहुत जटिल प्रश्न है। लक्षित (टार्गेटेड) विश्लेषण के जरिए हम पीएफएएस के केवल कुछ वर्गों, जैसे कार्बोक्सिलिक अम्ल और सल्फोनिक अम्ल, की पहचान कर सकते हैं। लेकिन इसके अलावा पीएफएएस के और भी कई वर्ग हैं, जिन्हें मौजूदा रूटीन जांच तकनीकों से नहीं पहचाना जा सकता। ये अज्ञात पीएफएएस हो सकते हैं, पीएफएएस के प्रीकर्सर हो सकते हैं। यानी ऐसे रसायन जो आगे चलकर पीएफएएस में बदल सकते हैं। ऐसे औद्योगिक रसायन हो सकते हैं जो हमारी मौजूदा लक्ष्य सूची में शामिल ही नहीं हैं। इनमें फ्लोरीनयुक्त दवाएं, फ्लोरीनयुक्त कीटनाशक, फ्लोरीनयुक्त सूक्ष्म या नैनो कण, अथवा पॉलिमर के मोनोमर भी शामिल हो सकते हैं। संभावनाएं बहुत अधिक हैं। पीएफएएस विश्लेषण को अधिक व्यापक बनाने के लिए कुछ समग्र (बल्क) परीक्षण विधियां भी उपलब्ध हैं। इनमें किसी एक-एक रसायन की पहचान करने के बजाय नमूने में मौजूद कुल फ्लोरीनयुक्त कार्बनिक पदार्थों का आकलन किया जाता है। जोखिम का मूल्यांकन भी विभिन्न प्रकार की जांच पद्धतियों, जैसे लक्षित विश्लेषण और समग्र परीक्षण को साथ मिलाकर किया जा सकता है।

क्या आपके निष्कर्ष बताते हैं कि दुनिया भर में पीएफएएस प्रदूषण को अब तक वास्तविकता से कम आंका गया है?

जांच के लिए लिक्विड क्रोमैटोग्राफी-टैंडम मास स्पेक्ट्रोमेट्री (एलसी-एमएस/एमएस) एक उत्कृष्ट तकनीक है, लेकिन यह केवल उन्हीं रसायनों का पता लगा सकती है जिन्हें हम पहले से जानते हैं और जिनके लिए हमारे पास मानक उपलब्ध हैं। हमारा अध्ययन यह नहीं कहता कि लक्षित पीएफएएस निगरानी बेकार है, बल्कि यह दिखाता है कि वह अधूरी है।

ऐसा नहीं है कि दुनिया की हर नदी में पीएफएएस प्रदूषण को ठीक सौ गुना कम आंका गया है। यह अंतर प्रदूषण के स्रोतों, रसायनों की प्रकृति, तलछट की विशेषताओं और इस्तेमाल की गई विश्लेषण पद्धतियों पर निर्भर करता है। जहां निगरानी केवल सीमित लक्ष्य सूची पर आधारित है, वहां पीएफएएस प्रदूषण की वास्तविक मात्रा कम आंक जाने की संभावना है।

आपने पहली बार डायरेक्ट टोटल ऑक्सिडाइजेबल प्रीकर्सर असे (डीटीओपीए) तकनीक का उपयोग किया। इसने ऐसा क्या बताया जो सामान्य जांच से पता नहीं चलता?

डीटीओपीए एक अलग तरह का प्रश्न पूछती है। यह जांच केवल ये नहीं बताती कि अभी कौन-कौन से पीएफएएस मौजूद हैं, बल्कि यह भी बताती है कि ऐसे कितने प्रीकर्सर मौजूद हैं जो आगे चलकर मापे जा सकने वाले पीएफएएस में बदल सकते हैं।

हमारे अध्ययन में ऑक्सीकरण के बाद यह सामने आया कि कुछ स्थानों पर एक्सट्रैक्टेबल ऑर्गेनिक फ्लोरीन (ईओएफ) यानी यानी नमूने में मौजूद कुल फ्लोरीनयुक्त कार्बनिक रसायनों का समग्र माप का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा ऐसे प्रीकर्सर का था। हालांकि मैं इसे टाइम बम नहीं कहूंगी, क्योंकि पर्यावरण में इन रसायनों के रूपांतरण की गति सूर्य के प्रकाश, सूक्ष्मजीवों, ऑक्सीकरण-अपचयन (रेडॉक्स) परिस्थितियों, जल प्रवाह और तलछट में होने वाले बदलावों जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। ये एक दीर्घकालिक भंडार की तरह काम करते हैं। मूल स्रोत से इनका उत्सर्जन बंद हो जाने के बाद भी ये लगातार ऐसे स्थायी पीएफएएस उत्पन्न कर सकते हैं।

यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है। प्रीकर्सर पीएफएएस वे रसायन हैं, जो समय के साथ बदलकर अंतिम (टर्मिनल) पीएफएएस में परिवर्तित हो जाते हैं। ये अंतिम पीएफएएस अत्यंत स्थायी होते हैं और सामान्य पर्यावरणीय परिस्थितियों में आगे विघटित नहीं होते।

आपके अध्ययन में छोटे और अति-छोटे श्रृंखला वाले पीएफएएस सबसे अधिक मिले। इन्हें लंबे श्रृंखला वाले पीएफएएस, जैसे पीएफओएस और पीएफओए, के अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प के रूप में पेश किया जाता है। आपके निष्कर्ष क्या बताते हैं?

हमारे अध्ययन में छोटे और अति-छोटे श्रृंखला वाले पीएफएएस का प्रभुत्व मिला। इनमें ट्राइफ्लूरोएसेटिक अम्ल (टीएफए) और परफ्लूरोप्रोपियोनिक अम्ल (पीएफपीआरए) सभी नमूनों में पाए गए।इन रसायनों को अक्सर अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि लंबे श्रृंखला वाले पीएफएएस की तुलना में ये शरीर में कम मात्रा में जमा होते हैं। लेकिन ये अत्यधिक गतिशील हैं, लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं और इन्हें हटाना कठिन है। इनके विषैले प्रभावों पर अभी अपेक्षाकृत कम अध्ययन हुए हैं। इसलिए केवल पुराने पीएफएएस की जगह नए पीएफएएस का उपयोग शुरू कर देना कोई पूर्ण समाधान नहीं है। इससे एक प्रकार का जोखिम कम हो सकता है, लेकिन साथ ही दूसरा ऐसा जोखिम पैदा हो सकता है, जो अधिक व्यापक हो और जिस पर नियंत्रण पाना अधिक कठिन हो।

हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे आस्था के प्रमुख केंद्रों से लिए गए नमूनों के नतीजे आपको क्या बताते हैं?

यह वास्तव में एक कठिन प्रश्न है, क्योंकि इसके केंद्र में आर्थिक व्यवस्था और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच का तनाव है। उद्योगों का उद्देश्य लाभ कमाना होता है, जबकि पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की सफाई को अक्सर खर्चीला और सेंकेडरी माना जाता है। दुनिया के कई हिस्सों में आज भी एक ऐसी सोच मौजूद है कि प्रदूषण का समाधान उसे डाइल्यूट कर देना है या फिर जो नजर नहीं आता, वह मानो समस्या ही नहीं है। पर्यावरण प्रदूषण के प्रति समाज का रवैया कई बार इसी सोच से प्रभावित होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से हमारे निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि केवल किसी नदी का धार्मिक या आध्यात्मिक महत्व उसे औद्योगिक रसायनों से सुरक्षित नहीं रख सकता। मैं इसे विनम्रता के साथ कहना चाहूंगी कि विरोधाभास नदी में नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्थाओं में है। गंगा करोड़ों लोगों के लिए आस्था और संस्कृति का प्रतीक है, लेकिन हम अभी तक ऐसी व्यवस्थाएं विकसित नहीं कर पाए हैं जो उसे भौतिक और रासायनिक प्रदूषण से प्रभावी ढंग से बचा सकें।

यूरोप में पीएफएएस पर कड़े नियम लागू हैं, जबकि भारत जैसे देशों में अभी नियमन नहीं है। क्या यह वैश्विक नियामक असमानता का उदाहरण है?

यह स्पष्ट है कि नियामक ढांचे में असमानता मौजूद है। यूरोप और अमेरिका में पीएफएएस की निगरानी, कानूनी प्रावधानों और इन रसायनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने पर काफी अधिक काम हुआ है, जबकि भारत जैसे देशों में अभी व्यापक नियामक व्यवस्था विकसित नहीं हुई है। लेकिन मैं इसे केवल "प्रदूषण का निर्यात" या जानबूझकर प्रदूषण का बोझ दूसरे देशों पर डालने जैसी सरल कहानी के रूप में नहीं देखना चाहूंगी, क्योंकि इसके पीछे कहीं अधिक जटिल आर्थिक वास्तविकताएं हैं। इन रसायनों का उत्पादन या उपयोग करने वाले उद्योग रोजगार, आधारभूत ढांचा और आर्थिक अवसर भी पैदा करते हैं। विकासशील देशों के लिए अक्सर आर्थिक विकास, रोजगार और औद्योगिक विस्तार पहली प्राथमिकता होते हैं। ऐसे में अधिक सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ने के लिए नई तकनीक, निगरानी व्यवस्था और उत्पादन प्रणाली में बड़े निवेश की जरूरत होती है, जो अल्पकाल में हर देश के लिए आर्थिक रूप से संभव नहीं होता। इसलिए यह मुद्दा पूरी तरह व्हाइट एंड ब्लैक नहीं है। इसमें नियामक असमानता और पर्यावरणीय न्याय जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, लेकिन विकास, वहनीयता और वैश्विक आर्थिक ढांचे से जुड़े प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे बड़ी चुनौती ऐसा संतुलन स्थापित करना है, जहां आर्थिक प्रगति पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की कीमत पर न हो।

क्या मानसून के दौरान नदी की तलछट में जमा पीएफएएस दोबारा पानी में पहुंच सकते हैं?

पीएफएएस के स्तर में मौसमी बदलाव देखे गए हैं और इस संदर्भ में मानसून सबसे बड़ी अनिश्चितताओं में से एक है। तेज जल प्रवाह एक ओर प्रदूषकों की सांद्रता को कम कर सकता है, लेकिन दूसरी ओर वह प्रदूषित तलछट का कटाव कर उसे फिर से पानी में मिला सकता है। इससे तलछट से जुड़े पीएफएएस दोबारा नदी के जल में पहुंच सकते हैं। इसलिए यह संभव है कि अधिक जल प्रवाह के दौरान तलछट पीएफएएस का एक मौसमी स्रोत बन जाए। हालांकि इसे प्रमाणित करने के लिए कई वर्षों तक चलने वाली दीर्घकालिक निगरानी की आवश्यकता होगी, जिसमें मानसून से पहले, मानसून के दौरान और मानसून के बाद पानी तथा तलछट दोनों के नमूनों का नियमित विश्लेषण किया जाए।

अगर किसी आम व्यक्ति को यह समझाना हो कि सामान्य जांच में अधिकांश फ्लोरीनयुक्त प्रदूषण क्यों दिखाई नहीं देता, तो आप उसे कैसे समझाएंगी?

कल्पना कीजिए कि आपकी चाबियां अंधेरे में कहीं खो गई हैं, लेकिन आप उन्हें केवल वहीं खोज रहे हैं जहां रोशनी है। लक्षित (टार्गेटेड) विश्लेषण भी कुछ ऐसा ही है। हम केवल उन्हीं रसायनों की तलाश करते हैं, जिनके बारे में हमें पहले से पता है और जिनके लिए हमारे पास जांच की व्यवस्था है। इसी कारण कुल फ्लोरीनयुक्त प्रदूषण का बड़ा हिस्सा हमारी नजर से छूट जाता है। एक और तथ्य यह है कि अब तक 15,000 से अधिक अलग-अलग पीएफएएस रसायनों की पहचान की जा चुकी है, जबकि सामान्य जांच में आमतौर पर केवल 20 से 50 रसायनों की ही जांच होती है। बाकी का हिसाब आप स्वयं लगा सकते हैं।

क्या मौजूदा पीएफएएस निगरानी व्यवस्था पूरी तस्वीर दिखाती है या हमें अपनी जांच प्रणाली को बदलने की जरूरत है?

मैं इसे भ्रामक नहीं कहूंगी। लक्षित निगरानी उपयोगी है, उसके नतीजे दोहराए जा सकते हैं और जिन पीएफएएस रसायनों पर अभी नियम लागू हैं, उनके लिए यह बहुत प्रभावी भी है। लेकिन एक्सट्रैक्टेबल ऑर्गेनिक फ्लोरीन (ईओएफ ) का विश्लेषण हमें फ्लोरीनयुक्त प्रदूषण की कहीं अधिक व्यापक तस्वीर देता है। हालांकि इसकी भी अपनी सीमाएं हैं। उदाहरण के लिए, ईओएफ पद्धति की पहचान क्षमता (डिटेक्शन लिमिट) सामान्य तौर पर लक्षित एलसी-एमएस/एमएस विश्लेषण की तुलना में कम संवेदनशील होती है। यही कारण है कि मैं ईओएफ को पारंपरिक पीएफएएस विश्लेषण का विकल्प नहीं, बल्कि उसका पूरक मानती हूं। आदर्श स्थिति यह होगी कि दोनों तरीकों का एक साथ उपयोग किया जाए। एक हमें यह बताता है कि हम किन रसायनों की निश्चित पहचान कर सकते हैं, जबकि दूसरा यह संकेत देता है कि कुल फ्लोरीनयुक्त प्रदूषण का कितना हिस्सा अब भी हमारी पकड़ से बाहर है।