बूढ़ी गंगा नदी का उद्गम कहां है और उसका पूरा प्रवाह मार्ग क्या है? इन सवालों को लेकर अब तकनीकी जांच की जाएगी। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को बताया है कि उसने नदी के उद्गम, ऐतिहासिक मार्ग और वर्तमान प्रवाह की पहचान के लिए एक तकनीकी समूह गठित किया है। समूह ऐतिहासिक नक्शों, उपग्रह चित्रों, राजस्व अभिलेखों और तकनीकी रिपोर्टों की जांच करेगा। इसके बाद चिह्नित स्थानों का संयुक्त निरीक्षण भी किया जाएगा।
16 अक्टूबर 2026 को एनजीटी में हुई सुनवाई में एनएमसीजी ने बताया कि आवेदक प्रियंक भारती ने नदी से संबंधित ऐतिहासिक नक्शे, भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अभिलेख और अन्य दस्तावेज सौंपे हैं। यह दस्तावेज राष्ट्रीय हरित अधिकरण के 3 अगस्त 2026 के आदेश के अनुपालन में जमा किए गए थे। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने की, जिसमें विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद भी शामिल थे।
एनएमसीजी के मुताबिक, तकनीकी समूह यह पता लगाएगा कि नदी का ऐतिहासिक और वर्तमान में पहचाना जा सकने वाला उद्गम स्थल कहां है, उसका पूरा प्रवाह मार्ग क्या रहा है और वर्तमान जलधारा का ऐतिहासिक मार्ग से कितना मेल है। जांच में यह भी देखा जाएगा कि बूढ़ी गंगा आखिर में गंगा नदी या उसकी किसी सहायक नदी में कहां जाकर मिलती है।
उद्गम को लेकर आवेदक ने उठाए थे सवाल
बूढ़ी गंगा का मामला वर्ष 2023 में एनजीटी पहुंचा था। प्रियंक भारती ने नदी के बाढ़ क्षेत्र में कथित अतिक्रमण और नदी की जमीन पर अवैध कब्जों का मुद्दा उठाया था। 21 अगस्त 2023 के आदेश में दर्ज याचिका के अनुसार, नदी मुजफ्फरनगर जिले के देवल गांव से निकलती है, मेरठ जिले के हस्तिनापुर से गुजरती है और हापुड़ जिले के गढ़मुक्तेश्वर के पास गंगा में मिलती है। आवेदक ने इसकी लंबाई करीब 93 किलोमीटर बताई थी। नदी की यह लंबाई याचिकाकर्ता के जरिए दावा किया गया है। तकनीकी जांच के बाद इस दावे की पुष्टि हो सकेगी।
नदी की जगह बताया जलधारा
15 जनवरी 2024 के एनजीटी आदेश में सिंचाई विभाग के अभिलेखों के हवाले से बूढ़ी गंगा को नदी के बजाय जलधारा बताया गया था। इसी आदेश में मेरठ के जिलाधिकारी ने जानकारी दी थी कि 59 गांवों में से 25 में नदी का क्षेत्र कम हुआ है और कुछ पट्टों को रद्द करने तथा अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया चल रही है। यह जानकारियां अधिकारियों की ओर से अधिकरण में दी गई थीं। बाद में नदी के उद्गम को लेकर भी मतभेद सामने आया। 3 अगस्त 2026 के आदेश में एनजीटी ने दर्ज किया कि आवेदक राज्य के अधिकारियों द्वारा बताए गए उद्गम स्थल को गलत बता रहे हैं। उन्होंने करीब 200 साल पुराना प्रामाणिक नक्शा उपलब्ध होने का दावा किया। अधिकरण ने उन्हें नक्शा और संबंधित सामग्री एनएमसीजी को सौंपने की अनुमति दी और मिशन को नदी के उद्गम से गंगा या उसकी किसी सहायक नदी में मिलने तक के पूरे मार्ग की जांच कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था।
बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन का काम भी जारी
यह मामला नदी की पहचान के साथ उसके बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन से भी जुड़ा है। 3 अगस्त 2026 के आदेश में उत्तर प्रदेश के सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट के आधार पर बताया गया कि नदी के 100 वर्ष की वापसी अवधि वाली बाढ़ सीमा के लिए कुल 1,157 सीमा स्तंभ लगाने की योजना है। इनमें मुजफ्फरनगर में 277 स्तंभ लगाने का काम पूरा बताया गया था, जबकि मेरठ और हापुड़ में काम जारी था। विभाग ने सभी चार हिस्सों में सीमा स्तंभ लगाने का काम 30 अगस्त 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य बताया था।
यह सीमांकन राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की की रिपोर्ट और गंगा कायाकल्प आदेश, 2016 के आधार पर किया जा रहा था। एनजीटी ने राज्य के अधिकारियों से काम की प्रगति पर आगे की रिपोर्ट भी मांगी थी।
अब एनएमसीजी के तकनीकी समूह में मिशन के विशेषज्ञों और अधिकारियों के साथ राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के निदेशक की ओर से नामित तकनीकी विशेषज्ञ भी शामिल हैं। एनएमसीजी के हलफनामे के अनुसार, समूह की 29 सितंबर 2026 को बैठक हुई थी। इसमें जांच की पद्धति और उपलब्ध सामग्री पर चर्चा की गई तथा राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान से मिले आंकड़ों की समीक्षा की गई। चिह्नित स्थलों के सत्यापन के लिए संयुक्त क्षेत्रीय दौरा निर्धारित किया गया है।
अंतिम निष्कर्ष आना बाकी
16 अक्टूबर की सुनवाई में एनजीटी ने एनएमसीजी की प्रस्तुतियों को दर्ज किया।अधिकरण ने अपने रजिस्ट्री कार्यालय को रिपोर्ट की जांच कर उसे अभिलेख पर रखने का निर्देश दिया है। आवेदक को इस रिपोर्ट पर जवाब या आपत्ति दाखिल करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया है।अब मामले की अगली सुनवाई 8 फरवरी 2027 को अंतिम सुनवाई के लिए निर्धारित की गई है।