कानून के पालन, उचित मुआवजे और पुनर्वास की मांग कर रहे आदिवासियों ने 3 जुलाई से दूसरी बार चिता आंदोलन शुरू किया जिसे प्रशासन ने 19 जुलाई को जबरन उठा दिया (सभी फोटो: ध्रुवल पारेख / सीएसई)
नदी

“लग रहा है गुलाम देश में रह रहे हैं”: केन-बेतवा से प्रभावित आदिवासी और किसानों का जबरन विस्थापन, अधूरा पुनर्वास और टूटे घर, यह है देश के पहले रिवर लिंक प्रोजेक्ट की हकीकत

विकास के नाम पर शुरू हुआ केन-बेतवा लिंक प्राेजेक्ट आदिवासियों के असंतोष, विस्थापन और पर्यावरण विनाश का पर्याय बन गया है

Bhagirath

पलकोहा गांव में तनावभरी शांति है। गांव में गुस्से और डर का माहौल है। ग्रामीण बात तो कर रहे हैं लेकिन कैमरे पर आने से डर रहे हैं। वे नहीं चाहते कि उनका नाम भी मीडिया में आए। एक ग्रामीण ने वजह पूछने पर इतना ही कहा, “अगर उन्हें पता लग गओ तो कल मैं इते न मिलहों।” ग्रामीण के लिए “उन्हें” से तात्पर्य पुलिस और प्रशासन से था। यह डर बेवजह नहीं है। एक ग्रामीण ने डाउन टू अर्थ को बताया कि कुछ दिन पहले एक युवक ने पुलिस-प्रशासन से केवल इतना पूछा था कि तुम बिना मुआवजे के हमारा घर क्यों तोड़ रहे हो तो पुलिस ने उसे कसकर तमाचा जड़ दिया। इसलिए अब कोई बोलने से भी डर रहा है।

पलकोहा भारत की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट प्रभावित गांवों में शामिल है जो संभवत: इस साल डूब जाएगा। 2 जुलाई 2026 को डाउन टू अर्थ की टीम बड़ी मुश्किलों से गांव में पहुंची। गांव से कई किलोमीटर पहले भुसौर बैरियर से आगे किसी अपरिचित शख्स के जाने की अनुमति नहीं थी।

हमें बैरियर पर करीब आधे घंटे रोककर रखा गया। बाद में एक ग्रामीण से बात कराने पर आगे जाने की इजाजत मिली, वह भी इस हिदायत के साथ कि “कहीं और नहीं जाना।” आखिरकार, ऊबड़खाबड़ और पथरीले कच्चे रास्ते से करीब 40 मिनट बाद जब हम पलकोहा पहुंचे, तब वहां बुलडोजर चल रहा था। मौके पर पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद थे। यहां बाबा अहिरवार का घर हमारे पहुंचने से कुछ मिनट पहले ही ध्वस्त हुआ था। वह अपने टूटे घर से काम का सामान उठा रहे थे। उन्होंने कहा कि अधिकारी और पुलिस कर्मचारी जल्दबाजी में थे। उन्होंने घर से सामान निकालने का भी मौका नहीं दिया और हमारे सामने ही घर गिरा दिया। उनके घर से थोड़ा आगे पहुंचे तो एक पक्के घर को तोड़ा जा रहा था। मौके पर मौजूद एसडीएम (सब डिवीजनल मैजिस्ट्रेट) विजय द्विवेदी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि लोगों को पर्याप्त समय दिया गया है। वह बताते हैं कि ढोढन गांव में बांध का निर्माण कार्य चल रहा है। इस बरसात तीन गांव (पलकोहा, ढोढन और खरयानी) में पानी भरने की संभावना है। इसलिए हम पिछले डेढ़-दो महीने से गांव को खाली कराने का कार्य कर रहे हैं। वह बताते हैं कि लोग इसमें सहयोग कर रहे हैं और उनकी सहमति से यह कार्रवाई चल रही है।

प्रशासन से उलट ग्रामीणों का कहना है कि यह जबरन बेदखली है। लोगों का कोटे से मिलने वाला राशन भी बंद कर दिया गया है ताकि वे जल्द गांव छोड़ दें। पलकोहा के ग्रामीणों की शिकायत है कि करीब 550 लोगों को अब तक पैकेज राशि (12.5 लाख रुपए प्रति व्यक्ति) नहीं मिली है और कई घरों का मुआवजा भी नहीं आया है। आरोप है कि करीब 20-25 बाहरी लोगों को पात्रता सूची में शामिल किया गया है जबकि गांव के कई वास्तविक पात्रों को बाहर कर दिया गया है।

“लग रहा है, गुलाम देश में रह रहे हैं”

इस तरह की शिकायतें मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना के उन गांवों में आम हैं जो केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से प्रभावित हैं। इस परियोजना के तहत ढोढन गांव में 77 मीटर ऊंचे बांध का निर्माण कार्य तेजी से जारी है। ढोढन में मई से तोड़फोड़ चल रही है। करीब 600 परिवार वाले ढोढन में लगभग 450 परिवार गांव छोड़कर जा चुके हैं जबकि 150 परिवार अब भी गांव में मौजूद हैं। बहुत से परिवार ऐसे हैं जिनके घर की दीवार ढहा दी गई है, लेकिन वे घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

गांव में रह रहे एक ऐसे ही युवा भागचंद यादव ने डाउन टू अर्थ को बताया कि 13 मई को गांव में पहली बार जेसीबी आई और बिना नोटिस और बिना सूचना दिए एक घर गिरा दिया गया। उस समय घर के अंदर लोग भी मौजूद थे। उनका कहना है कि गांव के 60-65 प्रतिशत घर पूरी तरह तोड़े जा चुके हैं। जबकि शेष घरों को आंशिक रूप से तोड़ दिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कलेक्टर से निवेदन किया था कि उन्हें कम से कम 4-5 महीने का समय दिया जाए ताकि वे कहीं और रहने की व्यवस्था कर लें लेकिन उन्हें समय नहीं मिला और भरी बरसात में उनके घर गिरा दिए। ढोढन के निवासियों का कहना है कि 250-300 लोगों को अब तक पैकेज राशि नहीं मिली है, लेकिन उन्हें गांव छोड़ने को मजबूर किया जा रहा है।

भागचंद के अनुसार, गांव में 90 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं, इसलिए अधिकांश लोग पैकेज राशि पर ही पूरी तरह निर्भर हैं। वह कहते हैं, “ग्रामीणों के साथ बहुत अन्याय हो रहा है। विरोध करने पर प्रशासनिक अधिकारी धमकाते हैं और जलील भी करते हैं।” गुस्से से भरे भागचंद का दर्द यह कहते हुए छलक गया, “ऐसा लग रहा है कि जैसे हम गुलाम देश में रह रहे हों।”

उनका कहना है कि अप्रैल में उनके आंदोलन के दौरान कुछ लोगों ने पत्थरबाजी कर दी थी, जिसके बाद पुलिस ने 18 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। इनमें ढोढन के 14 और पलकोहा के 4 लोग शामिल थे। उनका आरोप है कि पुलिस ने कई ऐसे लोगों के नाम भी प्राथमिकी में दर्ज कर लिए जो उस वक्त गांव में थे ही नहीं। उस घटना की आड़ में पुलिस ने लोगों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। वह बताते हैं कि अब हमने विरोध करना भी बंद कर दिया है। ढोढन में टूटे घर में परिवार के साथ रह रहीं कलाबाई आदिवासी गुस्से में कहती हैं, “सरकार को लोगों को एक जगह बिठाकर बम से उड़ा देना चाहिए, ताकि उनकी आंखों में खटक रहे हम लोग एक झटके में साफ हो जाएं।”

कलाबाई और उनके एक बेटे को पैकेज राशि मिली है और उनके दो घरों के एवज में 1.80 लाख और 2.5 लाख का मुआवजा प्राप्त हुआ है। उनका एक बेटा अब भी पैकेज राशि के इंतजार में है। प्रशासन ने पुनर्वास के लिए उन्हें करौंदेया में 1,000 वर्ग फीट का प्लॉट दिया है जो अब तक बन नहीं पाया है और उनका घर ढहा दिया गया है। कलाबाई का परिवार जंगल की जमीन पर खेती करता था लेकिन उसका पट्टा उनके नाम पर नहीं था, इसलिए खेत के मुआवजे (5 लाख रुपए प्रति एकड़) की हकदार वह नहीं बन पाईं। कलाबाई जैसे सैकड़ों आदिवासी आजीविका और अपने भरण पोषण के लिए जंगल की वनोपज पर निर्भर थे। अब सारे विस्थापित आदिवासी परिवार इससे वंचित हो गए हैं।

ढाेढन बांध का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। यहां 77 मीटर ऊंचा बांध बनाकर पानी को 221 किलोमीटर की नहर के जरिए बेतवा नदी में पहुंचाया जाएगा

छतरपुर जिले के कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने डाउन टू अर्थ को बताया कि सभी गांवों को जल्द विस्थापित कराने का लक्ष्य है। शासन की तरफ से बारिश से पहले गांवों को खाली कराने की समयसीमा मिली थी। उन्हें छह से सात गांवों का कब्जा पन्ना टाइगर रिजर्व को देना है क्योंकि वह जमीन वन में जाएगी। इन गांवों को देने की प्रक्रिया भी जारी है। जैसवाल का कहना है कि प्रभावितों के पास पुनर्वास पैकेज में दो विकल्प थे। एक विकल्प 12.5 लाख रुपए एकमुश्त प्राप्त करने का था और दूसरा विकल्प 7.5 लाख रुपए और प्लॉट का था। 100 प्रतिशत लोगों ने पैकेज में 12.5 लाख रुपए के एकमुश्त पैकेज का विकल्प चुनाा। उनका कहना है कि हमने पहले सर्वे में 3,000 लोगों को पैकेज की सुविधा उपलब्ध कराई थी। करीब 360 करोड़ रुपए के पैकेज का वितरण किया गया था। कुछ शिकायतें मिलने के बाद हमने दोबारा सर्वे कराया और उसमें करीब 600 छूटे हुए लोग मिले। उनके पैकेज का आदेश जारी कर दिया गया और भुगतान की प्रक्रिया जारी है। जैसवाल कहते हैं कि परियोजना प्रभावितों को पैकेज वितरण की कार्रवाई पिछले वर्ष बरसात के बाद शुरू हो गई थी। उनका कहना है कि इस साल जनवरी से हम गांवों में जाकर लोगों को गांव खाली करने के संबंध में समझा रहे हैं। वह कहते हैं कि लोगों को पर्याप्त समय दिया है। बजट की कोई समस्या नहीं है।

पन्ना का दर्द

परियोजना से विस्थापित हो रहे पन्ना जिले के गांवों की शिकायतों की भी लंबी फेहरिस्त है। यहां के गहदरा गांव में 12 मई को घर टूटने शुरू हुए थे और चार दिन के भीतर पूरा गांव मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। यह गांव पूरी तरह उजड़ चुका है और एक भी परिवार या घर यहां नहीं है। अधिकांश लोग यहां से करीब 20 किलोमीटर दूर तारा गांव में बसे हैं। गहदरा के पूर्व सरपंच बबलू यादव के अनुसार, लगभग 2,500 पुलिस बल की मौजूदगी में घर तोड़े गए ताकि कोई विरोध न कर सके। जिस वक्त यह कार्रवाई हुई, तब तक 272 लोगों को पैकेज राशि नहीं मिली थी। साथ ही करीब 600 परिवार वाले इस गांव में 68 मकानों का मुआवजा और 11 भूस्वामी पट्टेदारों का मुआवजा बाकी था।

बबलू यादव पैकेज राशि में पात्रता की एक तकनीकी खामी की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि छतरपुर जिले में 16 फरवरी 2024 और पन्ना में 21 जनवरी 2022 की कट ऑफ डेट रखी गई है। दोनों जिलों में करीब 2 साल का अंतर है। इसका अर्थ यह है कि इस अवधि में जो लोग 18 वर्ष के होंगे, वही पैकेज राशि के लिए पात्र हैं। बबलू यादव के अनुसार, पन्ना जिले में कम कट ऑफ डेट के कारण 298 लोग पैकेज से वंचित रह गए हैं। उनके अनुसार, 24 मई को पन्ना के परियोजना प्रभावित सभी आठ गांवों के लोग समान कट ऑफ डेट की मांग को लेकर मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने गए थे। मुख्यमंत्री ने तब समान कट ऑफ का आश्वासन दिया था लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ। बबलू यह भी बताते हैं कि 2022 में एसडीएम ने आश्वासन दिया था कि पुनर्वास के लिए बस्ती बनाकर दी जाएगी। इस पर भी अमल नहीं हुआ। उनका कहना है कि पिछले पांच महीने से (मार्च से) ग्रामीणों का राशन बंद है। डाउन टू अर्थ ने पन्ना के तारा सहित कल्याणपुर और पटी बजरिया गांव में पहुंचकर पुनर्वास स्थलों का दौरा किया और पाया कि ये सभी स्थान जंगल से दूर हैं और यहां पानी, स्कूल, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है।

कल्याणपुर में एक महीने से अस्थायी झुग्गी बनाकर रह रहीं मीराबाई आदिवासी ने बताया वह छतरपुर के खरयानी गांव से विस्थापित हुई हैं। उन्होंने 12.5 लाख रुपए की पैकेज राशि से 6 लाख रुपए का कल्याणपुर में प्लॉट खरीदा है और शेष राशि से घर बनवा रही हैं। वह मानती हैं कि इतनी राशि से घर बनना मुश्किल है, इसलिए घर बनाने में पूरा परिवार जुटा है ताकि कम से कम मजदूरी के पैसे बच सकें। उनका कहना है कि यहां मकान बनवाने के लिए 800 रुपए में पानी का एक टैंकर खरीदना पड़ रहा है। इस जगह बिजली की भी व्यवस्था नहीं है। उन्हें खरयानी गांव से जबरन विस्थापित किया गया है। उनका आधा गांव खाली करवा दिया गया है। ज्यादातर लोग किशनगढ़, बमीठा, छतरपुर और तारा जैसी जगहों पर जाकर अस्थायी तौर पर बसे हैं।

कोनी गांव से विस्थापित होकर कल्याणपुर आने वाले एक अन्य आदिवासी हरप्रसाद कहते हैं कि विस्थापित होने वाला कोई भी व्यक्ति खुश नहीं है। वह कहते हैं, “गांव में हम मालिक थे, यहां मजदूर बन गए हैं।” विस्थापित होने वाले अधिकांश परिवार यह सोचकर परेशान हैं कि इतने कम पैसों में परिवार का गुजर बसर कैसे होगा। मंझौली गांव से विस्थापित हुए जगदीश आदिवासी कहते हैं कि जब पहली बार सर्वेक्षण हुआ था तब महुआ आदि वनोपज से होने वाली आमदनी का भुगतान करने का वादा किया गया था लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कल्याणपुर के पास ही पटी बजरिया में कोनी गांव के कई विस्थापित परिवार खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं। यहां मकान बनवा रहे राजू सिंह मानते हैं कि अपना गांव, अपनी जमीन ज्यादा अच्छी थी। वहां महुआ, आंवला, चरवा, तेंदुपत्ता आमदनी के साधन थे। यहां कुछ नहीं है। कोनी के एक अन्य विस्थापित दयाराम के अनुसार, “गांव में जंगल से पेट भरता था। खेती न होने पर भी भूखा नहीं रहना पड़ता था। अब हमारा सब कुछ छिन गया है।”

पन्ना में गैर लाभकारी संगठन लास्ट वाइडरनेस फाउंडेशन जुड़े और पर्यावरण संरक्षण का काम कर रहे इंद्रभान बुंदेला कहते हैं कि लिंक प्रोजेक्ट से पर्यावरण को भारी क्षति पहुंच रही है, लेकिन कम से कम मानवीय क्षति से बचना चाहिए था। वह कहते हैं कि विस्थापित आदिवासी परिवारों को औसतन 10-15 लाख रुपए मिले हैं। इतने पैसे में घर बनाना चांद पर घर बनाने जैसा है। ये ऐसे लोग हैं कि जिनका वित्तीय प्रबंधन शून्य है। पैसे देते ही उन्हें लूटने का षड्यंत्र भी शुरू हो गया। सबसे पहले गांव में शराब की दुकानें खुलीं, जुए का खेल शुरू हुआ और मोटरसाइकल-ट्रैक्टर की एजेंसी वाले उन्हें ललचाने लगे। इंद्रभान के अनुसार, कई लोग इनके झांसे में आए। उन्होंने वाहन खरीदे और हादसे में मारे गए।

चिता आंदोलन

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट प्रभावित किसानों और आदिवासियों ने अपनी शिकायतों का समाधान न होने और मुआवजे व पुनर्वास में बरती जा रही अनियमितताओं के खिलाफ ढोढन बांध निर्माण स्थल पर 5-16 अप्रैल 2026 के दौरान पहली बार चिता आंदोलन शुरू किया। उस वक्त प्रशासन के आश्वासन पर उन्होंने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया था लेकिन शिकायतों पर कार्रवाई न होते देख 3 जुलाई 2026 को एक बार फिर छतरपुर के कुपी गांव में बराना नदी के पास अनशन पर बैठ गए। लोगों का आरोप है कि पहले चिता आंदोलन के बाद लोगों का दमन शुरू हो गया ताकि वे आवाज भी न उठा सकें। इसलिए उन्हें फिर से चिता आंदोलन पर बैठना पड़ा। हालांकि प्रशासन इन आरोपों से इनकार करता है। प्रशासन ने चिता आंदोलन के 17वें दिन यानी 19 जुलाई की सुबह लोगों की उनकी सुरक्षा का हवाला देकर आंदोलनकारियों को उनके नेता अमित भटनागर सहित उठा लिया। आंदोलनकारियों में शामिल दिव्या अहिरवार ने डाउन टू अर्थ को बताया कि सुबह-सुबह 150-200 गाड़ियों में करीब 2,000-3,000 की संख्या में पुलिस बल आया और लोगों पर उठाना शुरू कर दिया। लोगों के विरोध करने पर लाठीचार्ज भी किया गया। उस वक्त आंदोलन स्थल पर 600-700 ग्रामीण-आदिवासी मौजूद थे। अधिकारियों ने आंदोलनकारियों की मांगों पर कोई बात नहीं की। उन्होंने हटने को कहा और मना करने पर सीधा उठाना शुरू कर दिया। दिव्या ने बताया कि अमित भटनागर केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट में 400 करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार को मीडिया के सामने खोलने जा रहे थे। इससे ठीक पहले सभी को आंदोलन स्थल से उठा लिया गया।

आंदोलन की अगुवाई कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता और जय किसान संगठन से जुड़े अमित भटनागर ने आंदोलन के पहले दिन 3 जुलाई को डाउन टू अर्थ को बताया था कि किसान कानून के पालन और न्याय की मांग कर रहे हैं। उनका कहना था कि प्रशासन के भ्रष्ट व तानाशाही पूर्ण रवैये के कारण 50 हजार लोग बेघर हो गए हैं। लोग अपने जल जंगल, जमीन, आजीविका और संस्कृति से उजाड़ गए हैं। उन्होंने भू अर्जन कानून के उल्लंघन, भारी भ्रष्टाचार और अपात्रों को मुआवजा बांटने का आरोप भी लगाया। साथ ही परियोजना के कारण 46 लाख पेड़ कटने, पन्ना टाइगर रिजर्व को नुकसान होने और केन नदी के विनाश को अपूरणीय क्षति बताते हुए चिंता व्यक्त की। छतरपुर जिला प्रशासन का कहना है कि आंदोलन के जरिए परियोजना की छवि खराब करने का प्रयास किया जा रहा है जबकि यह परियोजना इस सम्पूर्ण क्षेत्र के समग्र विकास की आधारशिला बनेगी। प्रशासन के इस तर्क को कोई नहीं पचा पा रहा है।

छतरपुर के ढोढन गांव में अधिकांश परिवारों को विस्थापित कर दिया गया है लेकिन बहुत से परिवार अब भी टूटे हुए घरों में मौजूद हैं

हर चरण में खामियां

दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर की गई केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का मकसद केन नदी बेसिन से तथाकथित “अतिरिक्त” पानी को बेतवा नदी बेसिन में पहुंचाना है। सरकार का दावा है कि इससे मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले बुंदेलखंड के पानी की कमी वाले इलाकों में 62 लाख लोगों को पीने का पानी और 10.62 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के लिए पानी मिल सकेगा। इस परियोजना के पहले चरण का मुख्य हिस्सा ढोढन बांध है, जो केन नदी से “अतिरिक्त” पानी इकट्ठा करेगा और उसे 221 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए झांसी के पास बेतवा बेसिन में पहुंचाएगा। करीब 45,000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट से 46 लाख पेड़ कटेंगे और 9,000 हेक्टेयर क्षेत्र जलमग्न हो जाएगा। इसमें 5,258 हेक्टेयर का वन शामिल है जिसमें 4,141 हेक्टेयर जमीन पन्ना नेशनल पार्क की है। बांध के कारण छतरपुर जिले के 14 गांव में 5,288 परिवार और पन्ना जिले के आठ गांवों में 1,400 परिवार विस्थापित होंगे। परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को गंभीर बताते हुए विशेषज्ञ इसके औचित्य पर शुरू से ही प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं। उनका कहना है कि यह परियोजना बुंदेलखंड के जल संकट को दूर करने की बजाय उसे बढ़ाएगी। उनका मानना है कि यह प्रोजेक्ट रोजनेताओं और ठेकेदारों की लॉबी को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से लाया गया है।

कैंपेन टु डिफेंड नेचर एंड पीपल (सीडीएनपी) ने 14 जुलाई को बयान जारी कर प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग तक कर दी। सीडीएनपी के अनुसार, प्रक्रिया के हर चरण में खामियां थीं। हर चरण पर विशेषज्ञों ने गंभीर चिंताएं जताईं, जिन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उदाहरण के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी (सीईसी) ने कहा था कि नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की स्टैंडिंग कमिटी (एससी-एनबीडब्ल्यूएल) की ओर से दी गई वाइल्डलाइफ मंजूरी वन्यजीव संरक्षण कानून, 1972 के खिलाफ थी। इसलिए, यह साफ तौर पर एक गैर-कानूनी प्रोजेक्ट है।

सीडीएनपी के अनुसार, एससी-एनबीडब्ल्यूएल ने अपनी ही एक्सपर्ट कमिटी की अहम बातों को नजरअंदाज कर दिया जिसने कहा था कि किसी भी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट से देश में बचे हुए नाजुक इकोसिस्टम और बाघों के रहने की जगह बर्बाद नहीं होनी चाहिए। ऐसे जंगली इलाकों में जिन्हें सुरक्षित क्षेत्र का दर्जा मिला है, इन प्रोजेक्ट्स से बचना ही अच्छा होगा। कमिटी ने यह भी पाया था कि केन नदी के जल संसाधनों का उपयोग करके क्षेत्र की आजीविका और विकास संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नदी जोड़ो (इंटरलिंकिंग) परियोजना संभवतः सबसे उपयुक्त विकल्प नहीं हो सकती।

सीईसी ने कहा था, “नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) और एससी-एनबीडब्ल्यूएल ने जो बचाव के उपाय सुझाए हैं, वे केन नदी के दोनों किनारों पर मौजूद घाटियों, चट्टानी ढलानों और नदी के किनारे पनपने वाले खास और अनोखे इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) के नुकसान की भरपाई नहीं करते हैं। इस इकोसिस्टम में विकसित हुए सूक्ष्म जीव-जंतुओं और वनस्पतियों समेत तमाम वन्यजीव, इस प्रोजेक्ट के शुरू होने पर हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे।” सीईसी ने यह भी कहा था कि एससी-एनबीडब्ल्यूएल ने नदी के बहाव की दिशा में आगे मौजूद घड़ियाल अभयारण्य और गिद्धों के घोंसले बनाने की जगहों पर इस प्रोजेक्ट के असर की जांच नहीं की थी और न ही इसके लिए बचाव का कोई उपाय सुझाया था।

पन्ना में रहने वाले गिद्ध विशेषज्ञ प्रमीत अग्रवाल ने डाउन टू अर्थ को बताया कि पन्ना में 40-50 स्थानों पर गिद्ध निवास करते हैं। यहां पाई जाने वाली 7 प्रजातियों के गिद्धों में 3 प्रवासी और 4 स्थायी निवासी हैं। पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर धुंधवा सेहा नामक जगह पर 150-200 गिद्ध देखने को मिलते हैं। गिद्धों की गणना में पन्ना टाइगर रिजर्व में हमेशा उनकी स्वस्थ संख्या मिली है। यह पक्षी साल में केवल एक अंडा देता है, इसलिए इनका संरक्षण बहुत मुश्किल है। उनका कहना है कि लिंक प्रोजेक्ट के तहत बनने वाला बांध इन गिद्धों के आवास स्थलों को खत्म कर देगा।

छतरपुर के कुपी गांव में बराना नदी के पास चिता आंदोलन स्थल जहां पन्ना और छतरपुर के आदिवासी-किसान 17 दिन तक ''न्याय दो या मार दो'' के नारे के साथ आंदोलनरत रहे

पन्ना में केन रिवर लॉज चला रही भावना कुमारी कहती हैं कि यह प्रोजेक्ट पन्ना टाइगर रिजर्व को दो हिस्सों में बांट देगा, टाइगर कॉरिडोर खत्म कर देगा और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ाएगा। उनका कहना है कि यह प्रोजेक्ट फॉल्ट लाइन (अर्थक्वेक सिस्मिक लाइन) पर है जो पोखरा से आ रही है। अगर भविष्य में यहां भूकंप आया तो हम लोग पता नहीं कहां जाएंगे।

पन्ना के प्रकृतिवादी श्यामेंद्र सिंह मानते हैं कि यह प्रोजेक्ट ऐसी वैकल्पिक जगह लाया जाना चाहिए था जहां जंगल का विनाश न हो। वह कहते हैं कि अगर आप प्राकृतिक रूप से सूखे एरिया में अधिक पानी देंगे तो उसके भी नुकसान हैं। इस क्षेत्र में खेती की पद्धति अलग है। अधिक पानी से यहां खेती की पद्धति में बदलाव होगा और ऐसी बहुत सी बीमारियां फैलेंगी जिसे लोग हैंडल नहीं कर पाएंगे। वह कहते हैं कि सरकार धान और गेहूं को बढ़ावा देकर यहां मोटे अनाज की खेती को नुकसान पहुंचा रही है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर में रिसर्च फेलो रहे और विज्ञान शिक्षा केंद्र के संस्थापक भारतेंदु प्रकाश प्रोजेक्ट का सर्वप्रथम विरोध करने वाले लोगों में शामिल हैं। उनका मानना है कि यह इतना खराब और अवैज्ञानिक है कि मशहूर कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता नानाजी देशमुख ने विरोध किया था। इसे खराब मानते हुए ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने स्थगित कर दिया था। वह कहते हैं कि परियोजना केन नदी के डाउनस्ट्रीम में बसे गांवों पर गंभीर असर डालेगी, खासकर छतरपुर, महोबा और बांदा के सैकड़ों गांवों में पेयजल और सिंचाई का संकट खड़ा हो जाएगा। डाउनस्ट्रीम में बने बांधों में पानी सूख जाएगा और सिंचाई परियोजनाएं ठप पड़ जाएंगी।

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम, रिवर्स एंड पीपल (एसएएनडीआरपी) के संयोजक और पर्यावरणविद हिमांशु ठक्कर केे अनुसार, पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) या अन्य उपलब्ध अध्ययनों में कहीं भी यह स्पष्ट विश्लेषण नहीं मिलेगा कि डाउनस्ट्रीम के गांवों, उनकी जल उपलब्धता, कृषि और पारिस्थितिकी पर इस प्रोजेक्ट का क्या प्रभाव पड़ेगा। उनका कहना है कि इसे नदी जोड़ परियोजना कहा जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से यह वास्तव में जल स्थानांतरण (वाटर ट्रांसफर) और लिफ्ट परियोजना है। यहां नदियां स्वाभाविक रूप से नहीं जुड़ रही हैं। केन नदी का पानी नहर के माध्यम से बेतवा नदी तक पहुंचाया जाएगा। चूंकि बेतवा का स्तर ऊंचा है, इसलिए पानी को लिफ्ट (पंप करके ऊपर उठाकर) करके पहुंचाना पड़ेगा। इसलिए इसे पारंपरिक अर्थों में नदी जोड़ परियोजना कहना पूरी तरह सही नहीं होगा (देखें, परियोजना में पर्यावरणीय और वन स्वीकृतियों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण शर्तों का उल्लंघन,)।

हिमांशु इस प्रोजेक्ट के बजाय अन्य विकल्पों के हिमायती हैं। उनका मानना है, “यदि बुंदेलखंड की पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन किया जाए, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जलग्रहण क्षेत्र विकास को प्राथमिकता दी जाए तो अपेक्षाकृत कम लागत में जल संकट का कहीं अधिक टिकाऊ समाधान संभव है।”

तब से अब तक

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट शुरू से ही विवादों में रहा है। इसी वजह से 2011 में तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसे स्वीकृति नहीं दी थी

  • 1970 का दशक: केंद्रीय मंत्री केएल राव द्वारा नेशनल वाटर ग्रिड और कैप्टन दिनशॉ जे दस्तूर द्वारा गारलैंड कैनाल का प्रस्ताव आया। लेकिन यह आगे नहीं बढ़ पाया।

  • 1980: सिंचाई मंत्रालय ने देश में पानी के अंतर बेसिन स्थानांतरण के लिए नेशनल पर्सपैक्टिव प्लान (एनपीपी) बनाया।

  • 1982: एनपीपी के अध्ययन के लिए नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए) का गठन।

  • 1995: एनडब्ल्यूडीए ने फीजिबिलिटी स्टडी जारी की और केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को संभव बताया।

  • 1999: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रोजेक्ट को गति देने के लिए टास्ट फोर्स का गठन किया।

  • 2005: उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के तात्कालीन मुख्यमंत्री एवं केंद्र सरकार ने त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए।

  • 2010: एनडब्ल्यूडीए ने प्रोजेक्ट के पहले चरण की डीपीआर बनाई जो इस तथ्य पर आधारित थी कि केन में “अतिरिक्त” पानी है।

  • 2011: केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पर्यावरण को क्षति के मद्देनजर प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से इनकार किया।

  • 2016: जुलाई में प्रोजेक्ट को तकनीकी-आर्थिक सलाहकार समिति की स्वीकृति मिली। इसके बाद सितंबर में वन्यजीव संबंधी स्वीकृति स्वीकृति मिली।

  • 2017: जनवरी में जनजातीय कार्य मंत्रालय की स्वीकृति। मई 2017 में वन भूमि के डायवर्जन की मंजूरी मिली। अगस्त में पर्यावरण संबंधी स्वीकृति मिली।

  • 2021: मार्च त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसी साल दिसंबर में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रोजेक्ट को मंजूरी दी।

  • 2022: केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट अथॉरिटी के गठन के लिए गजट नोटिफिकेशन हुआ।

  • 2024: दिसंबर में प्रधानमंत्री ने प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया। इसके बाद ढोढन बांध का निर्माण शुरू हो गया।

स्रोत: एनडब्ल्यूडीए के दस्तावेज और मीडिया रिपोर्ट