गंगा की तलछट से मिले नतीजों ने आपको कितना चौंकाया?
एक शोधकर्ता के रूप में हमें पता होता है कि प्रदूषक अपने स्रोत से दूर तक फैल सकते हैं, लेकिन जब यही बात उन स्थानों के आंकड़ों में दिखाई दे जिनसे हमारा रोज का जुड़ाव हो तो समस्या कहीं अधिक वास्तविक महसूस होती है। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और भावनाओं का प्रतीक है। यह जानना कि इतनी पूजनीय नदी तक भी नए तरह के रासायनिक प्रदूषक पहुंच रहे हैं दरअसल यह तेजी से बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिक विकास की पर्यावरणीय कीमत की याद दिलाता है। हमने नमूने लेने के लिए जिन स्थानों का चयन किया, वे उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता को ध्यान में रखकर चुने गए थे। मेरा मानना है कि सरकार को प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों की पहचान करनी चाहिए और इस पूरे क्षेत्र में पैदा होने वाले कचरे के बेहतर प्रबंधन के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
गंगा में मिले पीएफएएस प्रदूषण के लिए क्या किसी एक उद्योग को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
हमारे निष्कर्ष यह नहीं बताते कि ऊपरी गंगा और ऊपरी गंगा नहर में पीएफएएस प्रदूषण के लिए केवल दवा उद्योग जिम्मेदार है। पीएफएएस कई तरह के औद्योगिक और शहरी स्रोतों से आ सकते हैं। हमारा अध्ययन यह बताता है कि प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और व्यापक निगरानी की जरूरत है, ताकि दवा उद्योग सहित आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण की प्रभावी सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
भारत में पीने के पानी के लिए अभी तक पीएफएएस का कोई बाध्यकारी मानक नहीं है। क्या गंगा किनारे बसे शहरों का पेयजल अब खतरनाक हो चुका है?
हमारे अध्ययन के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अमेरिका जैसे देशों में लागू पेयजल के मानक यहां भी लागू करते ही गंगा किनारे स्थित शहरों के पेयजल मानकों पर खरे नहीं उतरेंगे। हमने पीने के पानी का नहीं, बल्कि नदी की तलछट का विश्लेषण किया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में अभी ऐसा व्यापक पीएफएएस निगरानी नेटवर्क नहीं है, जिसके आधार पर इस प्रश्न का भरोसेमंद उत्तर दिया जा सके। इसलिए ऐसे नेटवर्क की स्थापना अगला महत्वपूर्ण कदम होना चाहिए।
क्या अब नमामि गंगे जैसी पहलों में पीएफएएस जैसे उभरते रासायनिक प्रदूषकों को भी निगरानी और प्रबंधन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि किसी भी अपशिष्ट शोधन संयंत्र का उद्देश्य प्रदूषण को कम करना है ताकि गंगा सहित अन्य नदियों को स्वच्छ बनाया जा सके। हमारे अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि पीएफएएस जैसे रसायनों को भी दीर्घकालिक नदी निगरानी और प्रबंधन कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मानकों के अनुसार सभी तरह के अपशिष्ट का प्रभावी उपचार किया जाए। साथ ही, ऐसी तकनीकों का विकास भी किया जाए जो उभरते प्रदूषकों को हटाने में सक्षम हों लेकिन उनकी लागत इतनी अधिक न हो कि उनका व्यापक उपयोग ही कठिन हो जाए।
क्या कुंभ जैसे विशाल स्नान आयोजनों के दौरान भी पीएफएएस सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं?
हमारे अध्ययन के आधार पर कुंभ मेले में पीएफएएस के संपर्क से जुड़े जोखिमों पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। जहां तक कुंभ मेले का सवाल है। मैंने स्वयं बड़े धार्मिक स्नान आयोजनों के दौरान रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) से जुड़े प्रभावों पर काम किया है, यह अध्ययन अभी अप्रकाशित है। उसमें हमने पाया कि कुंभ के दौरान श्रद्धालुओं की अत्यधिक संख्या के कारण मौजूदा अपशिष्ट शोधन क्षमता पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।
भारत में पीएफएएस प्रदूषण का कोई ऐतिहासिक आधार उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इस खतरे की गंभीरता कैसे समझाई जाए?
पीएफएएस मानव-निर्मित रसायन हैं। स्वाभाविक रूप से इन्हें प्राकृतिक पर्यावरण में होना ही नहीं चाहिए। यह असल सवाल नहीं है कि यह इनकी मात्रा 200 साल पहले की तुलना में या प्री इंडस्ट्रियल एज से कितनी बढ़ी है। महत्वपूर्ण यह है कि क्या आज ये स्थायी रसायन पर्यावरण में मौजूद हैं? यदि हां, तो वह कहां से आ रहे हैं और क्या वे लंबे समय में जोखिम पैदा कर सकते हैं। हमारे निष्कर्ष स्पष्ट रूप से बताते हैं कि इन सवालों पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।