नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पश्चिम बंगाल के सुंदरबन डेल्टा क्षेत्र में स्थित घोरमार द्वीप के क्षरण को लेकर चिंता जाहिर की है। एनजीटी ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए एक समिति का गठन कर तीन महीने में रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है।
एनजीटी की प्रधान पीठ ने इस मामले का संज्ञान एक खबर के बाद लिया। 17 फरवरी को चेयरमैन और जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव व विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। पीठ ने सुंदरबन तट और विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के घोरमारा द्वीप पर गंभीर तटक्षरण के मुद्दे पर और आसपास के मैंग्रोव वन की सुरक्षा को लेकर गठित संयुक्त समिति से रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।
पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पर्यावरण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने 21 नवंबर, 2025 को अपने जवाबी हलफनामा में कहा था कि गंगा के मैदान वाले इलाके (डेल्टा) के तट तेजी से कट रहे हैं। साथ ही हलफनामे में सुंदरबन के द्वीपों की संवेदनशीलता और घोरमारा द्वीप पर क्षरण गतिविधियों के बारे में अध्ययन भी बताया था।
हलफनामे के मुताबिक गंगीय अलुवियल डेल्टा के तटों का क्षरण इसलिए हो रहा है क्योंकि बंगाल बेसिन का दक्षिण-पूर्व की ओर झुकाव और पीछे की ओर बढ़ता डेल्टिक स्थिति, लिटोरल ड्रिफ्ट और ट्रांसवर्स करंट्स के साथ मिलकर सुंदरबन द्वीपों के क्षरण को बढ़ाते हैं। दूसरा वैश्विक तापमान वृद्धि, समुद्र स्तर में वृद्धि, बंगाल की खाड़ी में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ना, अधिक बार और तीव्र चक्रवात, बांधों का टूटना, समुद्री जल प्रवेश आदि को जन्म देता है। और तीसरा मानवजनित कारण है यानी बांधों, लॉक गेट और स्लूइस के निर्माण से ना केवल ताजे पानी की आपूर्ति कम हो सकती है, बल्कि तलछट की मात्रा भी घट सकती है।
इसके अलावा दक्षिणी 24 परगना जिले के सीजेडएमपी-2019 ड्राफ्ट रिपोर्ट के तहत तूफानी ज्वार या बार-बार आने वाले चक्रवात, बांधों का टूटना और तटीय क्षेत्रों में लंबे समय तक बाढ़ भू-क्षरण या हाई वाटर लाइन के भीतर भूमि परिवर्तन का कारण बन सकते हैं।
वहीं, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की रिपोर्ट के मुताबिक प्राकृतिक और मानवजनित कारणों से सुंदरबन डेल्टा में तटक्षरण प्रभावित है। उनके अध्ययन के अनुसार 1969–2019 में सुंदरबन के द्वीपों ने कुल 250 वर्ग किलोमीटर भूमि खो दी। जबकि घोरमारा द्वीप का क्षेत्रफल 8.59 से 3.83 वर्ग किलोमीटर घटा।
एनजीटी ने संयुक्त समिति में भुवनेश्वर स्थित पर्यावरण मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय को इस समिति के समन्वय के लिए कहा है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल के वन अधिकारी को व्यापक योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। पीठ ने 3 महीनों मे रिपोर्ट मांगी है। 28 मई को अगली सुनवाई तय की गई है।