नदी

बूढ़ी गंडक पर पुल बनाने के दौरान फेंकी गई निर्माण सामग्री तुरंत हटाई जाए: एनजीटी

एनजीटी ने प्रशासन की इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया कि नदी का प्रवाह प्रभावित नहीं हुआ और पानी बहता रहा, इसलिए किसी कार्रवाई की जरूरत नहीं थी

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने बूढ़ी गंडक नदी में पुल निर्माण के दौरान डाले गए जियो-बैग और कचरे को तुरंत हटाने का आदेश दिया है।

  • एनजीटी ने कहा कि निर्माण सामग्री हटाने में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और संबंधित एजेंसियों को दो महीने के भीतर सफाई कार्य पूरा करना होगा।

  • एनजीटी ने प्रशासन की इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया कि नदी का प्रवाह प्रभावित नहीं हुआ और पानी बहता रहा, इसलिए किसी कार्रवाई की जरूरत नहीं थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ इतना कि बूढ़ी गंडक नदी बाधाओं के बीच से बह रही है, इसका मतलब यह नहीं कि निर्माण सामग्री को हटाने की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है।

क्या बूढ़ी गंडक नदी में पुल निर्माण के दौरान डाले गए रेत से भरे जियो-बैग और अन्य निर्माण सम्बन्धी कचरे को हटाना जरूरी था और यह काम पुल बनने के तुरंत बाद किया जाना चाहिए था। यह सवाल उठाते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी ने 9 जनवरी 2026 को साफ कहा कि इसका एक ही जवाब है—हां, इन सभी जियो-बैगों और कचरे को हटाया जाना अनिवार्य था।

अधिकरण ने कहा कि यदि पुल निर्माण के दौरान नदी में डाले गए जियो-बैग और अन्य कचरे को काम पूरा होने के बाद नहीं हटाया गया, तो बिना समय गंवाए इसे हटाने के लिए तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके लिए अदालत के निर्देशों का इंतजार करना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

एनजीटी ने प्रशासन की इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया कि नदी का प्रवाह प्रभावित नहीं हुआ और पानी बहता रहा, इसलिए किसी कार्रवाई की जरूरत नहीं थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ इतना कि बूढ़ी गंडक नदी बाधाओं के बीच से बह रही है, इसका मतलब यह नहीं कि निर्माण सामग्री को हटाने की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है।

जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं सरकारी एजेंसियां

आदेश में यह भी कहा गया कि मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी और बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (बीएसपीसीबी) की ओर से दाखिल जवाबों में राज्य और उसकी एजेंसियों के संवैधानिक दायित्वों की अनदेखी की गई है।

एनजीटी ने सभी संबंधित पक्षों को निर्देश दिया कि वे दो महीने के भीतर नदी में मौजूद रेत या मिट्टी से भरे सभी जियो-बैग, पुल के खंभों के आसपास बनी टापूनुमा संरचनाएं, उन पर उगी घास-झाड़ियां और नदी तल में पड़े सभी प्लास्टिक कचरे को हटाने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।

हालांकि, अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि सफाई के दौरान पुल के खंभों की संरचनात्मक सुरक्षा से कोई समझौता न हो और नदी के तल में मौजूद प्राकृतिक तलछट (सेडिमेंट) को नुकसान न पहुंचे।

9 जनवरी 2026 को अधिकरण ने इस मामले को उठाने वाले याचिकाकर्ताओं विकास कुमार पाठक और देवव्रत कुमार साहनी के प्रयासों की सराहना की और पर्यावरण संरक्षण के लिए उनकी ओर से लगाए गए समय, ऊर्जा और खर्च को भी स्वीकार किया।

इस आदेश के साथ एनजीटी ने साफ संदेश दिया है कि विकास कार्यों की आड़ में नदियों के साथ लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और पर्यावरण संरक्षण राज्य व उसकी एजेंसियों की अनिवार्य जिम्मेदारी है, जिसे टाला नहीं जा सकता।