कानपुर में एक नाले का पानी बिना ट्रीट किए गंगा में गिर रहा है। गंगा की सफाई के लिए 114 सीवेज इन्फ्रास्ट्रक्चर और एसटीपी प्रोजेक्ट स्वीकृत हुए हैं लेकिन केवल 27 ही पूरे हो पाए हैं (विकास चौधरी / सीएसई) 
नदी

बजट 2026-27 : गंगा पुनर्जीवन अब पर्यावरणीय मिशन से ज्यादा एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, विदेशी सहायता की आस

बजटीय प्राथमिकताएं संकेत देती हैं कि असली जोर अब भी इंजीनियरिंग आधारित प्रदूषण नियंत्रण पर है, न कि नदी के प्राकृतिक चरित्र को पुनर्स्थापित करने पर

Vivek Mishra

गंगा को बचाने का सरकारी वादा कागज पर अब भी मजबूत दिखता है, लेकिन बजट की बारीक पंक्तियां बताती हैं कि गंगा पुनर्जीवन अब पर्यावरणीय मिशन से ज्यादा एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बन चुका है। जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन विभाग के हालिया प्रावधानों में नेशनल गंगा प्लान (नमामि गंगे मिशन - 2) का शुद्ध आवंटन 2026-27 के लिए 3,100 करोड़ रुपये तय किया गया है। यह राशि बीते वित्त वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान 2,687 करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन उसी वर्ष के मूल बजट अनुमान 3,400 करोड़ रुपये से अब भी कम है। यानी बीते वित्त वर्ष में जितना खर्च किया जाना था, उतना काम जमीन पर नहीं हो पाया और जो बचा हुआ बजट है उसे फिर से वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में जोड़ दिया गया है।

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट भाषण में नदियों का कोई जिक्र तक नहीं किया गया और गंगा-यमुना की महात्वकांक्षी योजनाओं के बारे में भी कोई बात नहीं की गई। हालांकि, बजट का विश्लेषण यह बताता है कि मृतप्राय नदियों की मूल बीमारी का इलाज किए बिना उनके लक्षणों का निदान करते रहा जाए।

जल शक्ति मंत्रालय के अधीन डिपार्टमेंट ऑफ वाटर रिसोर्सेज, रिवर डेवलपमेंट एंड गंगा रीजन्वूयेशन के बजट प्रावधानों में प्रमुख योजना की संरचनाओं को देखें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। इस वित्त वर्ष डिपार्टमेंट का कुल अनुमानित बजट 19912.98 करोड़ रुपए है जो कि बीते वित्त वर्ष 18405.74 करोड़ रुपए था। हालांकि, यह उसी वित्त वर्ष 2025-26 के अनुमानित बजट 25276.83 से काफी कम है।

प्रमुख योजनाओं में गंगा मिशन के भीतर एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘ ईएपी कंपोनेंट’ है यानी एक्सटर्नली एडेड प्रोजेक्ट्स। इसके तहत वित्त वर्ष 2026-27 में 600 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान रखा गया है, जो बीते वित्त वर्ष 2025-26  के संशोधित बजट 450 करोड़ रुपये से अधिक हैं। 

ईएपी का अर्थ है वे परियोजनाएं जिन्हें विश्व बैंक, जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए) या एशियाई विकास बैंक जैसी बाहरी एजेंसियों से कर्ज या सहायता मिलती है। यह परियोजनाएं अक्सर बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, अपशिष्ट जल नेटवर्क और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर आधारित शहरी ढांचा तैयार करने पर केंद्रित होती हैं। 

बजट के इस प्रावधान से यह संकेत भी मिलता है कि गंगा की सफाई को मुख्य रूप से अपशिष्ट जल प्रबंधन की इंजीनियरिंग समस्या की तरह देखा जा रहा है।

इसके समानांतर ‘प्रोग्राम कंपोनेंट’, जो सामान्य बजटीय सहायता यानी जनरल बजट सपोर्ट से चलता है, वित्त वर्ष 2025-26 के मूल अनुमान 2900 करोड़ रुपये से घटकर संशोधित अनुमान में 2,237 करोड़ रुपये पर आ गया था और अब 2026-27 में 2,500 करोड़ रुपये रखा गया है। यह बीते वित्त वर्ष के संशोधित बजट से बढ़ोतरी जरूर है, लेकिन सरकार के पहले घोषित स्तर से अब भी नीचे है। इस हिस्से में प्रशासनिक खर्च, संस्थागत गतिविधियां, निगरानी और कुछ छोटे ढांचागत हस्तक्षेप आते हैं, हालांकि नदी की पारिस्थितिकी बहाली का कोई बड़ा या अलग से दिखाई देने वाला वित्तीय जोर नहीं दिखता।

गंगा के लिए किए गए जितने बजट का प्रावधान किया गया है यदि उसकी तुलना जल क्षेत्र की अन्य प्राथमिकताओं से की जाए तो सरकार की प्राथमिकता कहीं और नजर आती है। मिसाल के तौर पर आंध्र प्रदेश के पोलावरम सिंचाई प्रोजेक्ट के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में 3,320 करोड़ रुपये का प्रावधान है, जो अकेले गंगा मिशन के पूरे साल के नेट बजट से अधिक है। 

वहीं, नदियों के परस्पर जोड़ (इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर्स) के लिए भी 1906 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान है। वहीं, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत हजारों करोड़ रुपये पुराने सिंचाई प्रोजेक्टों और कर्ज सेवा में जा रहे हैं। 

यह तुलना बताती है कि राष्ट्रीय स्तर पर जल नीति का वित्तीय भार अब भी बड़े बांधों, नहरों और मेगा परियोजनाओं की ओर ज्यादा झुका हुआ है, जबकि नदी पुनर्जीवन अपेक्षाकृत सीमित दायरे में है।

गंगा मिशन की संरचना संबंधी बजट प्रावधान यह भी दिखाता है कि नदी को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र की बजाय एक शहरी अपशिष्ट जल समस्या के रूप में अधिक परिभाषित किया जा रहा है। बजट में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, पाइपलाइन नेटवर्क और अपशिष्ट जल ढांचे पर जोर है, लेकिन अविरल धारा, बाढ़ मैदानों की बहाली, रेत खनन नियंत्रण, या नदी से जुड़ी आजीविकाओं को सुदृढ़ करने जैसे पहलुओं के लिए अलग से कोई प्रमुख वित्तीय रेखा स्पष्ट नहीं दिखती।

नदी अब एक ‘प्रोजेक्ट साइट’ की तरह दिख रही है, जहां समस्या का समाधान पाइप, पंप और प्लांट के जरिए ढूंढा जा रहा है। बजटीय प्राथमिकताएं संकेत देती हैं कि असली जोर अब भी इंजीनियरिंग आधारित प्रदूषण नियंत्रण पर है, न कि नदी के प्राकृतिक चरित्र को पुनर्स्थापित करने पर। 

गंगा के अलावा भी हैं नदियां

गंगा के लिए अलग राष्ट्रीय मिशन, अलग पहचान और हजारों करोड़ रुपये का समर्पित ढांचा है, लेकिन देश की बाकी नदियां एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था के भरोसे हैं जिसका अपना बजट ही बेहद सीमित है। जल शक्ति मंत्रालय के प्रावधानों में नेशनल रिवर कंजर्वेशन डॉयक्टोरेट (एनआरसीडी) का जिक्र साफ दिखाता है कि “अन्य नदियों” की किस तरह देखभाल की जा रही है।

एनआरसीडी वह इकाई है जो नेशनल रिवर कंजर्वेशन प्लान (एनसीआरपी) को लागू करती है। इसका काम राज्यों और शहरी निकायों को वित्तीय सहायता देकर प्रदूषित नदी खंडों में प्रदूषण कम करने वाले ढांचे तैयार कराना है। यानी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, ड्रेनेज इंटरसेप्शन, अपशिष्ट जल प्रबंधन जैसी परियोजनाएं। लेकिन गंगा और उसकी सहायक नदियां इसके दायरे में नहीं आतीं , उनके लिए अलग नमामि गंगे मिशन है।

बजट के अनुसार 2026-27 में एनआरसीडी  का अपना संस्थागत व्यय लगभग 10 करोड़ रुपये के आसपास है। यह राशि किसी नदी सफाई कार्यक्रम की लागत नहीं, बल्कि दफ्तर, स्टाफ और प्रशासनिक ढांचे का खर्च है। असली योजना धन “ नेशनल रिवर कंजर्वेशन प्लान- अदर बेसिंस” शीर्ष में दिखता है, जिसके लिए वित्त वर्ष 2026-27 में लगभग 550 करोड़ रुपये रखे गए हैं। यही वह पूल है जिससे यमुना (गंगा बेसिन के बाहर वाले हिस्सों सहित), गोमती, दामोदर, साबरमती, महानदी जैसी नदियों के प्रदूषित हिस्सों में काम किए जाते हैं।

गंगा मिशन के लिए शुद्ध आवंटन 3,100 करोड़ रुपये है, जबकि “अन्य सभी नदियों” के लिए कुल 550 करोड़ रुपये का प्रावधान है। यानी एक नदी बनाम दर्जनों नदियां  और बजट अनुपात लगभग छह गुना से ज्यादा का अंतर दिखाता है। यहां भी बड़ा हिस्सा ईएपी यानी बाहर से परियोजनाओं के लिए आने वाले पैसे का है।  

एनआरसीडी की प्रकृति भी बताती है कि दृष्टिकोण क्या है। यह नदी पारिस्थितिकी बहाली एजेंसी नहीं, बल्कि प्रदूषण नियंत्रण इंफ्रास्ट्रक्चर को लागू कराने वाली तकनीकी इकाई है। इसके काम का केंद्र नदी की अविरल धारा, बाढ़ मैदान, जैव विविधता या नदी आधारित आजीविकाएं नहीं बल्कि शहरी अपशिष्ट जल को नदी में जाने से पहले ट्रीट करना है। यानी समस्या को पाइप, पंप और प्लांट के जरिए सुलझाने का मॉडल।

नदी को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र की तरह पुनर्जीवित करने की भाषा भले मौजूद हो, लेकिन बजटीय संरचना बताती है कि असली जोर अब भी इंजीनियरिंग आधारित सफाई पर है, न कि नदी के प्राकृतिक जीवन तंत्र को बहाल करने पर।