गंगा के पानी के नीचे एक ऐसा अदृश्य खतरा छिपा है, जिसे वैज्ञानिक अब जाकर समझना शुरू कर रहे हैं। यूरोप और भारत के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि मौजूदा वैज्ञानिक जांच पद्धतियां नदी की तलछट में मौजूद पीएफएएस (पर-एंड पॉलीफ्लुओरोएल्किल सब्सटेंसेज), जिन्हें फॉरएवर केमिकल्स भी कहा जाता है, उसका केवल एक प्रतिशत ही पहचान पा रही हैं। इससे उस नदी में प्रदूषण के वास्तविक स्तर को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं, जिस पर दुनिया की लगभग सात प्रतिशत आबादी निर्भर है।
पीएफएएस कृत्रिम रसायनों का एक समूह है, जो मुख्य रूप से कार्बन और फ्लोरीन से मिलकर बना होता है। इनका उपयोग नॉन-स्टिक बर्तनों, कपड़ों और खाद्य पैकेजिंग जैसी अनेक रोजमर्रा की वस्तुओं में किया जाता है। कार्बन और फ्लोरीन के बीच अत्यंत मजबूत रासायनिक बंधन होने के कारण ये रसायन उत्पादों के नष्ट हो जाने के बाद भी नदियों, मिट्टी और यहां तक कि मानव रक्त में लंबे समय तक बने रहते हैं। पीएफएएस के संपर्क को कैंसर, थायरॉयड संबंधी गड़बड़ियों, प्रतिरक्षा तंत्र के कमजोर होने तथा प्रजनन और भ्रूण के विकास संबंधी समस्याओं से जोड़ा गया है। जनवरी, 2026 में पत्रिका एनवायरमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित इस अध्ययन का उद्देश्य उत्तराखंड में ऋषिकेश और रुड़की के बीच गंगा के 58 किलोमीटर लंबे हिस्से के 14 स्थानों से एकत्र किए गए तलछट के नमूनों में पीएफएएस की जांच करना था।
शोधकर्ताओं ने चार पारंपरिक जांच विधियों का उपयोग किया। इनमें लक्षित (टार्गेटेड) और गैर-लक्षित (नॉन-टार्गेटेड) विश्लेषण के लिए विश्वभर में प्रचलित लिक्विड क्रोमैटोग्राफी-टैंडम मास स्पेक्ट्रोमेट्री (एलसी-एमएस/एमएस) तकनीक शामिल थी। इसके साथ ही उन्होंने नमूनों में मौजूद एक्सट्रैक्टेबल ऑर्गेनिक फ्लोरीन (ईओएफ) यानी कुल फ्लोरीनयुक्त कार्बनिक रसायनों का समग्र माप भी किया।
इसके बाद ईओएफ की कुल मात्रा की तुलना उन पीएफएएस रसायनों में मौजूद फ्लोरीन से की गई, जिनकी पहचान मौजूदा तकनीकों से संभव है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका और ऑस्ट्रिया के ग्राज विश्वविद्यालय की शोधकर्ता डॉ. विक्टोरिया मूलर कहती हैं कि नतीजों में दोनों के बीच चौंकाने वाला अंतर सामने आया। इसे वैज्ञानिक भाषा में “फ्लोरीन मास बैलेंस” का अंतर कहा जाता है।
डॉ. मूलर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि पारंपरिक लक्षित विश्लेषण से नमूनों में केवल 16 ज्ञात पीएफएएस की पहचान हो सकी। इनकी सांद्रता 0.02 से 5.3 नैनोग्राम प्रति ग्राम तलछट थी, जबकि कुल ईओएफ की मात्रा 180 से 780 नैनोग्राम प्रति ग्राम के बीच थी। गंगा की निचली धारा के कुछ स्थानों पर यह मात्रा ऋषिकेश के ऊपरी हिस्से की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक थी। इससे संकेत मिलता है कि तलछट में बड़ी मात्रा में ऐसे फ्लोरीनयुक्त रसायन मौजूद हैं, जिनकी पहचान मौजूदा जांच तकनीकें नहीं कर पा रही हैं।
अध्ययन कई गंभीर संकेत देता है। पहला, गंगा में मौजूद पीएफएएस के अधिकांश प्रकारों की पहचान आधुनिक जांच तकनीकों से नहीं हो पा रही है। इससे प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों का पता लगाना कठिन हो जाता है, हालांकि अध्ययन कुछ संकेत जरूर देता है।
उदाहरण के लिए, सिडकुल (स्टेट इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ऑफ उत्तराखंड लिमिटेड) औद्योगिक क्षेत्र के आसपास लिए गए नमूनों में फ्लोरीनयुक्त प्रदूषण का स्तर, गंगा की ऊपरी धारा की तुलना में लगभग दोगुना पाया गया। इस क्षेत्र में दवा, प्रसाधन सामग्री और अन्य विनिर्माण इकाइयां संचालित होती हैं। अध्ययन के अनुसार, बिना उपचार के छोड़ा गया शहरी कचरा और सीवेज भी इस प्रदूषण के संभावित स्रोत हो सकते हैं।
अध्ययन से दूसरी बड़ी चिंता पीएफएएस प्रीकर्सर रसायनों की मौजूदगी को लेकर सामने आई। डॉ. विक्टोरिया मूलर बताती हैं, प्रीकर्सर पीएफएएस ऐसे रसायन हैं, जो समय के साथ बदलकर अंतिम (टर्मिनल) पीएफएएस में परिवर्तित हो जाते हैं। ये अंतिम पीएफएएस अत्यंत स्थायी होते हैं और सामान्य पर्यावरणीय परिस्थितियों में आगे विघटित नहीं होते।
इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने डायरेक्ट टोटल ऑक्सिडाइजेबल प्रीकर्सर असे (डीटीओपीए) तकनीक का इस्तेमाल किया। इस विधि में रासायनिक ऑक्सीकरण के जरिए उन छिपे हुए प्रीकर्सर रसायनों को ऐसे पीएफएएस में बदला जाता है, जिन्हें मापा जा सके। नतीजों से पता चला कि कुछ नमूनों में ऑक्सीकरण के बाद सामने आए पीएफएएस, कुल फ्लोरीनयुक्त प्रदूषण का 26 प्रतिशत तक हिस्सा थे। हरिद्वार के पास स्थित एक नमूना स्थल (जी6) पर ऑक्सीकरण के बाद पहचाने जा सकने वाले पीएफएएस की मात्रा 308 नैनोग्राम प्रति ग्राम सूखी तलछट बढ़ गई।
अध्ययन की प्रमुख लेखिका डॉ. विक्टोरिया मूलर और सह-लेखक, आईआईटी रुड़की के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ता सौरभ दीक्षित ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इससे स्पष्ट होता है कि गंगा में पीएफएएस प्रदूषण केवल आज दिखाई देने वाले रसायनों तक सीमित नहीं है। तलछट में ऐसे रसायनों का एक छिपा हुआ भंडार भी मौजूद है, जो समय के साथ पीएफएएस में बदल सकता है।
उनके अनुसार, बाढ़, ड्रेजिंग, मानसून के दौरान तेज जल प्रवाह या तलछट में किसी भी तरह की हलचल के समय यह प्रदूषित तलछट दोबारा पानी में मिल सकती है। इससे प्रीकर्सर और उनसे बनने वाले पीएफएएस सिंचित कृषि क्षेत्रों, मत्स्य संसाधनों और बाढ़ प्रभावित मैदानों तक फैल सकते हैं। हालांकि यह बताना संभव नहीं है कि ये प्रीकर्सर कितनी तेजी से पीएफएएस में बदलेंगे। यह पूरी तरह पर्यावरणीय परिस्थितियों, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता, ऑक्सीजन की उपलब्धता, सूर्य के प्रकाश, तलछट में होने वाली हलचल और उसके दोबारा पानी में आने जैसी स्थितियों पर निर्भर करता है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि तलछट में ऐसे पीएफएएस रसायन जिनकी रासायनिक संरचना अपेक्षाकृत छोटी होती है यानी छोटे (शॉर्ट-चेन) और अत्यंत (अल्ट्राशॉर्ट-चेन) पीएफएएस का प्रभुत्व था। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे-श्रृंखला वाले पीएफएएस पर स्टॉकहोम कन्वेंशन ऑन पर्सिस्टेंट ऑर्गेनिक पॉल्यूटेंट्स जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत प्रतिबंध लगाए जाने के बाद इन्हीं छोटे-श्रृंखला वाले रसायनों को उनके विकल्प के रूप में अपनाया गया।आमतौर पर माना जाता है कि छोटे-श्रृंखला वाले पीएफएएस अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं, क्योंकि वे मानव शरीर में कम मात्रा में जमा होते हैं। लेकिन डॉ. मूलर चेतावनी देती हैं कि उनकी अत्यधिक गतिशीलता, लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहने की क्षमता और व्यापक फैलाव ऐसे नए पारिस्थितिक जोखिम पैदा कर सकते हैं, जिन्हें नियंत्रित करना कठिन हो और जिनमें से कुछ अपरिवर्तनीय भी हो सकते हैं।
अध्ययन से तीसरी बड़ी चिंता यह सामने आई कि तलछट में पीएफएएस की उल्लेखनीय मात्रा मिलने के बावजूद वैज्ञानिक अभी यह नहीं बता सकते कि यह प्रदूषण वास्तव में कितना गंभीर है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यूरोप और उत्तरी अमेरिका के विपरीत भारत में अभी पीएफएएस के लिए पीने के पानी, तलछट, मिट्टी या खाद्य पदार्थों में कोई निर्धारित मानक नहीं हैं। देश में पीएफएएस की निगरानी के लिए कोई समर्पित राष्ट्रीय कार्यक्रम भी नहीं है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि जब तक इन रसायनों की समुचित पहचान नहीं होगी और उनके लिए स्पष्ट मानक तय नहीं किए जाएंगे तब तक गंगा के पानी को सुरक्षित पेयजल के रूप में उपचारित करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, आईआईटी रुड़की के शोधकर्ता सौरभ दीक्षित ने डाउन टू अर्थ से कहा कि पेयजल उपचार का मुद्दा इस अध्ययन के दायरे से बाहर है। फिर भी उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गंगा में पीएफएएस की सुनियोजित और नियमित निगरानी, उनके प्रमुख स्रोतों की पहचान तथा इनकी जांच के लिए वैज्ञानिक और प्रयोगशाला क्षमता बढ़ाना समय की जरूरत है। डॉ. विक्टोरिया मूलर और सौरभ दीक्षित, दोनों का मानना है कि गंगा में पीएफएएस प्रदूषण की स्थिति अभी नियंत्रण से बाहर नहीं हुई है।
उनके अनुसार, मौजूदा तकनीक से पीएफएएस को पूरी तरह हटाना शायद संभव न हो, लेकिन इन रसायनों के नए उत्सर्जन को कम करना, प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों (हॉटस्पॉट) पर नियंत्रण करना और लोगों के संपर्क (एक्सपोजर) को सीमित करना पूरी तरह संभव है। उनका कहना है कि कार्रवाई जितनी जल्दी शुरू होगी, उसके प्रभावी होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।