गंगा में मिलता प्रदूषण, प्रतीकात्मक तस्वीर; फोटो: विकास चौधरी 
नदी

गंगा में सीवेज प्रदूषण की रोकथाम के लिए स्वीकृत परियोजनाओं में 40 फीसदी का काम बाकी

218 सीवेज परियोजनाओं पर 35,000 करोड़ खर्च के बावजूद उत्तर प्रदेश और बिहार में बीओडी मानक पूरे नहीं, कई प्रदूषित खंड अब भी बने हुए हैं

Vivek Mishra

केंद्र सरकार भले ही नमामि गंगे कार्यक्रम को गंगा की सफाई में “महत्वपूर्ण सफलता” के तौर पर पेश कर रही हो, लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि नदी की जल गुणवत्ता में सुधार असमान और आंशिक रहा है। विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) अब भी तय मानकों से अधिक पाई गई है।

जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) वह मात्रा है जो जल में मौजूद जैविक पदार्थों को अपघटित करने के लिए सूक्ष्मजीवों द्वारा आवश्यक घुलित ऑक्सीजन को दर्शाती है।

जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत अब तक 35,698 करोड़ रुपये की लागत से 218 सीवरेज अवसंरचना परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इनमें से 6,610 एमएलडी क्षमता के सीवेज शोधन संयंत्रों (एसटीपी) की योजना है, लेकिन अब तक केवल 3,977 एमएलडी क्षमता वाले 138 एसटीपी ही चालू हो पाए हैं। यानी लगभग 40 प्रतिशत क्षमता अभी भी कागजों या निर्माणाधीन स्थिति में है।

यह सूचना 2 फरवरी, 2026 को जल शक्ति राज्यमंत्री राज भूषण चौधरी द्वारा राज्यसभा में लिखित प्रश्न के उत्तर में प्रदान की गई है।

2018 से 2025: सुधार के साथ चेतावनी भी

सूचना के मुताबिक, सीपीसीबी की 2018 और 2025 की रिपोर्टों की तुलना के अनुसार, गंगा के मुख्य प्रवाह में प्रदूषित नदी खंडों (पीआरएस) की संख्या कुछ राज्यों में घटी है। उत्तराखंड में हरिद्वार से सुल्तानपुर तक के प्रदूषित खंड हटाए गए हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में त्रिवेणी से डायमंड हार्बर के हिस्से में सुधार दर्ज किया गया है।

हालांकि, उत्तर प्रदेश में कन्नौज से वाराणसी तक का प्रदूषित खंड 2018 में जहां प्राथमिकता-IV में था, 2025 में यह बिजनौर से तारीघाट तक फैलकर प्राथमिकता-IV/V में दर्ज किया गया है, जिसे सरकार खुद “आंशिक सुधार” मानती है।

वहीं, बिहार में बक्सर से भागलपुर का हिस्सा अब भी प्रदूषण की श्रेणी में बना हुआ है, जहां केवल “मामूली सुधार” दर्ज किया गया है।

बीओडी: सबसे बड़ी कमजोर कड़ी

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025 (जनवरी–अगस्त) के दौरान गंगा के सभी निगरानी स्थलों पर पीएच और घुलित ऑक्सीजन (डीओ) स्नान मानकों के अनुरूप पाए गए। लेकिन बीओडी, जो जैविक प्रदूषण का सबसे अहम संकेतक है, उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद से कानपुर, रायबरेली, मिर्जापुर और गाजीपुर जैसे इलाकों में तय मानकों से बाहर रहा।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक बीओडी नियंत्रित नहीं होती, तब तक नदी के “स्वस्थ” होने के दावे अधूरे रहेंगे, क्योंकि यही संकेतक बताता है कि नदी में जैविक कचरा कितना मौजूद है।

जैव निगरानी में भी ‘अच्छी’ से ‘मध्यम’ तक सीमित

वर्ष 2024-25 में गंगा और उसकी सहायक नदियों के 50 स्थानों पर की गई जैव निगरानी में जैविक जल गुणवत्ता ‘अच्छी’ से ‘मध्यम’ के बीच आंकी गई। नदियों या झीलों के तट से जुड़े रहने वाले बेंथिक मैक्रो-इनवर्टेब्रेट प्रजातियों यानी रीढ़-रहित जलीय जीव (कीटों के लार्वा, घोंघे, केंचुए और छोटे क्रस्टेशियन) की मौजूदगी को सकारात्मक संकेत बताया गया है, लेकिन यह भी दर्शाता है कि नदी की पारिस्थितिकी अभी पूरी तरह बहाल नहीं हुई है।

सरकार ने एक बार फिर दोहराया है कि नदियों की सफाई की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और उद्योगों की है। केंद्र सरकार वित्तीय और तकनीकी सहायता तक सीमित है। यही कारण है कि एक समान राष्ट्रीय कार्यक्रम के बावजूद परिणाम राज्यों में अलग-अलग दिखाई देते हैं। नमामि गंगे और राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के तहत जन जागरूकता अभियानों, गंगा उत्सव, रन और सोशल मीडिया अभियानों पर जोर दिया गया है। लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि बिना सीवेज प्रबंधन, औद्योगिक निगरानी और दंडात्मक कार्रवाई के, जागरूकता अभियानों का असर सीमित रहेगा।