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प्रदूषण

प्लास्टिक कचरा प्रबंधन में पारदर्शिता जरूरी

अगर विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) व्यवस्था इतनी अच्छी तरह काम कर रही है, तो फिर हर जगह इतना प्लास्टिक कचरा क्यों दिखाई देता है?

Sunita Narain

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2022 में विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) व्यवस्था लागू होने के बाद से भारत ने 1.7 करोड़ टन प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे का पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) किया है।

प्लास्टिक रीसाइक्लिंग के इस कारोबार का अनुमानित मूल्य करीब 2,500 करोड़ रुपए है। इतनी राशि में चंद्रयान-3 जैसे चार चंद्र मिशनों का खर्च उठाया जा सकता है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुमान के अनुसार भारत में हर साल 38 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इस हिसाब से देखें तो 2022 से अब तक पुनर्चक्रित प्लास्टिक की मात्रा चार-पांच साल में पैदा होने वाले कुल प्लास्टिक कचरे के बराबर है।

अगर यह आंकड़ा सही है और जून 2026 के आधिकारिक दस्तावेज इसे सही भी बताते हैं तो फिर सवाल उठता है कि हमारे शहरों, गांवों और नदियों के किनारे आज भी प्लास्टिक कचरे के पहाड़ क्यों दिखाई देते हैं?

स्पष्ट है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है।

आइए जानते हैं कि आखिर ईपीआर यानी विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व क्या है? दरअसल ईपीआर दुनिया भर में कचरा प्रबंधन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक तंत्र है। इसके तहत प्लास्टिक कचरे को इकट्ठा करने और उसका पुनर्चक्रण कराने की जिम्मेदारी उसके निर्माताओं उत्पादकों, आयातकों या ब्रांड मालिकों पर होती है।

भारत में 2023-24 से इन कंपनियों के लिए अपने प्लास्टिक कचरे का 100 प्रतिशत इकट्ठा करना जरूरी है। यानी जितना प्लास्टिक कचरा वे पैदा करते हैं, उतना ही वापस इकट्ठा करना होगा। पिछले साल तक कंपनियों को इकट्ठा किए गए प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे का 40 से 60 प्रतिशत रीसाइकिल करना जरूरी था। 2026-27 के लिए यह लक्ष्य प्लास्टिक की श्रेणी के आधार पर बढ़ाकर 50-70 प्रतिशत तक कर दिया गया है।

मसलन, श्रेणी-2 के प्लास्टिक में चिप्स के पैकेट से लेकर शैंपू के सैशे तक, एकल परत और बहु-परत वाली पैकेजिंग शामिल होती है। इस श्रेणी के PIBOs के लिए इस साल अपने प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे का 100 प्रतिशत एकत्र करना और उसमें से 50 प्रतिशत का पुनर्चक्रण करना अनिवार्य है।

प्लास्टिक रीसाइकिल करने के लिए कंपनियां उन प्लास्टिक कचरा प्रोसेसिंग इकाइयों (पीडब्ल्यूपी) को काम देती हैं, जो सीपीसीबी में पंजीकृत होती हैं। देश में ऐसी 1,000 से ज्यादा इकाइयां हैं। सीपीसीबी ने इनके लिए अलग-अलग दरें तय की हैं। श्रेणी के तहत पीईटी (पॉलीइथिलीन टेरेफ्थालेट प्लास्टिक) बोतल जैसे प्लास्टिक के लिए 870 रुपए प्रति टन, पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले लचीले प्लास्टिक के लिए 1,500 रुपए और कंपोस्टेबल प्लास्टिक के लिए 2,500 रुपए प्रति टन दिए जाते हैं।

रीसाइकिल किए गए हर एक टन प्लास्टिक के बदले एक ईपीआर प्रमाणपत्र मिलता है। औसतन 1,500 रुपए प्रति टन की दर मानें तो 2022 से अब तक रीसाइकिल किए गए 1.7 करोड़ टन प्लास्टिक की कीमत करीब 2,500 करोड़ रुपए बैठती है।

अगर कंपनियां अपने रीसाइक्लिंग लक्ष्य पूरा नहीं करती हैं तो उन पर भारी पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जाता है। नियमों का पालन नहीं करने की लागत, नियमों का पालन करने की लागत से 2.5 गुना है। सीपीसीबी का अनुमान है कि प्लास्टिक कचरे को रीसाइकिल करने की लागत 4,000 रुपए प्रति टन है, जिसे वह नगर निकायों और उत्पादक कंपनियों के बीच बराबर बांटता है।

यानी औसतन 2,000 रुपए प्रति टन। अगर कंपनियां अपने लक्ष्य को पूरा करने में विफल रहती हैं, तो उदाहरण के लिए श्रेणी-2 के प्लास्टिक के लिए उन पर 5,000 रुपए प्रति टन का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जाता है।

यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है। वास्तव में, यह व्यवस्था इतनी अच्छी लगती है कि कहा जा रहा है कि सरकार इस व्यवस्था को शेयर बाजार तक ले जाने पर विचार कर रही है, ताकि ईपीआर प्रमाणपत्रों की खरीद-बिक्री की जा सके।

लेकिन फिर वही सवाल उठता है अगर यह व्यवस्था इतनी अच्छी तरह काम कर रही है, तो हमें हर जगह इतना प्लास्टिक क्यों दिखाई देता है?

मेरे सहयोगियों ने आगरा शहर की नालियों में मौजूद प्लास्टिक का ऑडिट किया और पाया कि कचरे में 70 प्रतिशत हिस्सा ब्रांडेड प्लास्टिक पैकेजिंग का था। फिर कंपनियां 100 प्रतिशत प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करने का दावा कैसे कर सकती हैं?

आइए देखें कि इस व्यवस्था में क्या-क्या गड़बड़ हो सकती है।

पहला सवाल है, क्या कंपनियों के लिए तय लक्ष्य पैदा होने वाले वास्तविक प्लास्टिक कचरे से कम हैं? 2024 में मेरे सहयोगियों ने आधिकारिक ईपीआर पोर्टल का विश्लेषण किया और पाया कि 41,544 कंपनियों ने पंजीकरण कराया था और उन्हें उनके द्वारा खुद बताए गए आंकड़ों के आधार पर रीसाइक्लिंग का लक्ष्य दिया गया था। इन आंकड़ों का सत्यापन कैसे किया गया, यह स्पष्ट नहीं है।

दूसरा सवाल यह है कि सीपीसीबी यह कैसे जांचता है कि कितना कचरा वास्तव में प्रोसेस और रीसाइकिल किया गया है? सीपीसीबी का कहना है कि वह ऑडिट और जमीनी स्तर पर जांच के जरिए इसकी पुष्टि करता है। 26 जून को सीपीसीबी ने अलग-अलग राज्यों को नियमों का पालन नहीं करने वाले पीब्ल्यूपी के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।

ऑडिट, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, से लगता है कि कई पीडब्ल्यूपी अपनी पंजीकृत क्षमता से ज्यादा के प्रमाणपत्र जारी कर रहे थे। इसके अलावा भी नियमों के उल्लंघन के मामले सामने आए।

समस्या इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि इस कारोबार में आंकड़ों पर भरोसा करना और उनका सत्यापन करना मुश्किल है। सीपीसीबी के मुताबिक, पीडब्ल्यूपी को तैयार रीसाइकिल उत्पाद की बिक्री के सबूत के तौर पर जीएसटी का बिल अपलोड करना होता है।

ज्यादातर मामलों में यह उत्पाद प्लास्टिक के दाने यानी प्लास्टिक पेलेट होते हैं, जिनका इस्तेमाल मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र की इकाइयां करती हैं। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि 18 प्रतिशत की ऊंची जीएसटी दर के कारण खुले तौर पर कारोबार करना मुश्किल हो जाता है।

तीसरी समस्या इससे भी ज्यादा बुनियादी है। अगर नियमों का पालन न करने पर कंपनियों को रीसाइक्लिंग की लागत से 2.5 गुना ज्यादा भुगतान करना पड़ता है, तो उन्हें पीडब्ल्यूपी को रीसाइक्लिंग के लिए भुगतान करने में रुचि होनी चाहिए। लेकिन यही व्यवस्था एक गलत प्रोत्साहन भी पैदा करती है। कंपनियां रीसाइक्लिंग कराने की बजाय सिर्फ ईपीआर प्रमाणपत्रों का “इंतजाम” करने लग सकती हैं।

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कई मामलों में तय दर पर वास्तव में रीसाइक्लिंग करना संभव नहीं है। हमारे शोध में पाया गया कि श्रेणी-2 के प्लास्टिक को रीसाइकिल करने की वास्तविक लागत 4,000 से 6,000 रुपए प्रति टन तक आती है। यह तय की गई 1,500 रुपए प्रति टन की दर से काफी ज्यादा है। इसके बावजूद, जांच और नियमों के पालन को बेहतर बनाने के लिए हमें सीखने और निगरानी के ज्यादा तरीकों की जरूरत है। लेकिन इसके उलट हो रहा है।

28 जून 2026 तक ईपीआर पोर्टल केवल सीमित और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए ही उपलब्ध था। यह तर्क दिया जा सकता है कि ईपीआर एक लाभदायक कारोबार है और निजी जानकारी को गोपनीय रखना जरूरी है। लेकिन पारदर्शिता की यह कमी स्थिति को और खराब ही करेगी।

यह न तो भविष्य के लिए सही शासन व्यवस्था है और न ही अतीत से कोई सीख लेने वाली व्यवस्था।