देश में कचरे के पहाड़ तेजी से बढ़ रहे हैं और डंपिंग ग्राउंड पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे ही एक मामले में उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित भाउपुर कचरा डंपिंग ग्राउंड में लगी आग; फोटो: पुनीत तिवारी 
प्रदूषण

केरल पंचायत पर 18 साल पुराने कचरा डंपिंग मामले में एनजीटी की फटकार

पीठ ने कहा 60 लाख रुपए के पर्यावरणीय मुआवजे का उपयोग पर्यावरण पुनर्स्थापन में किया जाए

Vivek Mishra

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की दक्षिणी क्षेत्र की पीठ ने केरल के कासरगोड जिले के कुबानूर में लंबे समय से हो रहे अवैज्ञानिक कचरा निस्तारण पर कड़ी टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति पुष्पा सत्यनारायण और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. प्रशांत गर्ग की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पंचायत पर सख्त निर्देश जारी किए हैं।

यह मामला केरल उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.वी. रामकृष्ण पिल्लई की रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान के रूप में एनजीटी में आया था। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पिछले 18 वर्षों से कुबानूर में प्रतिदिन 15 से 20 टन कचरा बिना छंटाई के एक परित्यक्त खदान में डाला जा रहा था। यह ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 का स्पष्ट उल्लंघन है और इससे बारिश के समय जहरीला रिसाव आसपास के घरों तक पहुंचकर गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरे पैदा कर रहा था।

एनजीटी ने मंगलपाडी ग्राम पंचायत की लापरवाही को गंभीर माना और कहा कि यह उसके वैधानिक दायित्वों का उल्लंघन है। पहले ही केरल राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पंचायत पर 60 लाख रुपए का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया था।

हालांकि, अधिकरण ने यह भी देखा कि बायो-माइनिंग प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और लगभग 45 प्रतिशत कचरा हटाया जा चुका है। फिर भी काम में देरी और अग्नि सुरक्षा जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं की कमी पर चिंता जताई गई। एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया कि साइट के पुनर्स्थापन के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक योजना प्रस्तुत नहीं की गई है, जबकि विश्व स्तर पर इस तरह की खानों को पर्यावरण-अनुकूल परियोजनाओं में बदलने के उदाहरण मौजूद हैं।

अधिकरण ने पंचायत और संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि बायो-माइनिंग प्रक्रिया जल्द पूरी की जाए और साइट पर अग्नि सुरक्षा की व्यवस्था तुरंत स्थापित की जाए। 1 अप्रैल 2026 से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों का पूरी तरह पालन हो, अवैध डंपिंग रोकने के लिए निगरानी की जाए और 60 लाख रुपए के पर्यावरणीय मुआवजे का उपयोग पर्यावरण पुनर्स्थापन में किया जाए। इसके साथ ही तीन महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य किया गया है।

एनजीटी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण में किसी तरह की देरी अस्वीकार्य है और पंचायत को त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।