एक तरफ जहां जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दे पर हमारे अधिकांश वैश्विक प्रयास सहमति नहीं बन पाने के कारण नाकाफी साबित हो रहे हैं, वहीं एक सामूहिक प्रयास वैश्विक स्तर पर सफल भी हुआ है। ओजोन परत के संरक्षण की कहानी उन्हीं कुछ गिनी-चुनी कहानियों में से एक है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) के अनुसार, 2025 में अंटार्कटिका के ऊपर बना ओजोन होल पिछले कई दशकों के सबसे कम गंभीर ओजोन होल में रहा। यह केवल एक साल की अच्छी खबर नहीं है। इसके पीछे लंबे समय से चल रहे वैश्विक प्रयासों का परिणाम है। इसका सबसे बड़ा कारण मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों (ओडीएस) के उत्पादन और उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने का वैश्विक प्रयास रहा है।
यह वैश्विक पर्यावरणीय कूटनीति की असाधारण सफलता है। कभी रेफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग और दूसरे औद्योगिक कार्यों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) जैसे रसायनों ने वायुमंडल के स्ट्रेटोस्फियर में मौजूद ओजोन परत को गंभीर नुकसान पहुंचाया था।
वैज्ञानिकों ने इस खतरे को सत्तर के दशक में पहचाना और बाद में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के इस्तेमाल को समयबद्ध तरीके से कम करने के लिए व्यापक कार्ययोजना बनाई गई। लगभग पूरी दुनिया ने इसे स्वीकार किया और उद्योग जगत ने भी नए और अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्पों को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज इसका परिणाम सामने है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और उपयोग को चरणबद्ध तरीके से लगभग समाप्त करने की दिशा में दुनिया ने असाधारण प्रगति की है। लेकिन इस सकारात्मक बदलाव को यह मान लेना कि ओजोन की कहानी खत्म हो गई है, ठीक नहीं होगा।
डब्लूएमओ का नया आकलन बताता है कि मौजूदा नीतियां जारी रहीं तो ओजोन परत के 1980 के स्तरों तक वापस आने का अनुमान दुनिया के अधिकांश हिस्सों में लगभग 2040, आर्कटिक में 2045 और अंटार्कटिका में 2066 के आसपास है। लेकिन ओजोन की यह वापसी हर साल एक जैसी नहीं होती। मौसम और वायुमंडलीय प्रवाह जैसे प्राकृतिक कारक साल-दर-साल ओजोन होल के आकार और तीव्रता को प्रभावित करते हैं। इसलिए दीर्घकालिक सुधार के बावजूद लगातार निगरानी जरूरी है।
हम आम तौर पर स्ट्रेटोस्फियर की ओजोन परत को पृथ्वी के सुरक्षा-कवच के रूप में जानते हैं, जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोखती है। लेकिन पृथ्वी की सतह के पास भी ओजोन बनती है। यह सीधे किसी कारखाने की चिमनी से नहीं निकलती, बल्कि नाइट्रोजन ऑक्साइड (नॉक्स), वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (वीओसी) और दूसरे प्रदूषकों की सूर्य के प्रकाश और अनुकूल मौसमीय परिस्थितियों में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनती है।
डब्लूएमओ की नई रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ता तापमान, स्थिर वायुमंडलीय परिस्थितियां और तेज धूप जमीन के पास ओजोन बनने की प्रक्रिया को बढ़ा सकती हैं। रासायनिक रूप से यह वही ओजोन अणु है, लेकिन उसका स्थान और संदर्भ बदलते ही उसका पर्यावरणीय अर्थ बदल जाता है। ऊपर स्ट्रेटोस्फियर में ओजोन जीवन को हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से बचाती है, जबकि जमीन के पास मौजूद अधिक मात्रा की ओजोन मानव स्वास्थ्य, कृषि और पारिस्थितिक तंत्रों के लिए नुकसानदेह हो सकती है।
हीटवेव के दौरान जमीन के पास ओजोन बनने की समस्या दक्षिण-पूर्वी अमेरिका, यूरोप और चीन सहित दुनिया के कई हिस्सों में देखी गई है। भारत में भी यह चिंता अब केवल कुछ गर्मियों के दिनों तक सीमित नहीं रह गई है।
सीएसई के 2021–2026 के 25 भारतीय शहरों के विश्लेषण में सतह पर बनने वाली ओजोन को कई क्षेत्रों में फैलती, बहु-मौसमी और क्षेत्रीय समस्या के रूप में सामने रखा गया है। मार्च से मई 2026 के दौरान 25 में से 15 शहरों में आठ घंटे की औसत ओजोन का स्तर 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के राष्ट्रीय मानक से अधिक रही। अध्ययन में यह भी सामने आया कि समस्या केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है; मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे दक्षिणी और तटीय शहर भी इससे प्रभावित हैं।
इसलिए सतही ओजोन को केवल किसी एक शहर की समस्या मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक क्षेत्रीय एयरशेड की समस्या बन सकती है। ओजोन एक सेकेंडरी प्रदूषक है। वीओसी और नॉक्स जैसे प्राथमिक प्रदूषक सूर्य के प्रकाश और अनुकूल मौसमीय परिस्थितियों में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के जरिए ओजोन बनाते हैं। इसलिए इसका समाधान भी केवल उस शहर में उत्सर्जन घटाने से नहीं होगा जहां ओजोन मापी जा रही है; पूरे क्षेत्रीय एयरशेड को ध्यान में रखना होगा।
जैसे-जैसे धरती गर्म हो रही है, एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर की जरूरत भी बढ़ रही है। दूसरी ओर, बढ़ता तापमान, तेज धूप और कई बार हवा का स्थिर रहना जमीन के पास ओजोन बनने की प्रक्रिया को भी बढ़ा सकता है। यानी बढ़ती गर्मी हमारे सामने एक साथ दो अलग-अलग चुनौतियां खड़ी कर रही है; एक ओर गर्मी से राहत के लिए कूलिंग की बढ़ती जरूरत और दूसरी ओर वायु प्रदूषण के रूप में सतही ओजोन का बढ़ता खतरा।
कूलिंग उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली कुछ गैसें ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुंचातीं, लेकिन वे शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं और उनके बढ़ते इस्तेमाल से ग्लोबल वार्मिंग पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए चुनौती केवल अधिक एयर कंडीशनर उपलब्ध कराने की नहीं है, बल्कि ऐसी कूलिंग व्यवस्था विकसित करने की है जो लोगों को बढ़ती गर्मी से राहत दे और साथ ही जलवायु पर अतिरिक्त दबाव न डाले।
ओजोन, गर्मी और कूलिंग की ये चुनौतियां एक जैसी नहीं हैं, लेकिन बदलते वातावरण में अब इन्हें पूरी तरह अलग-अलग करके देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। यही वजह है कि इस साल विश्व ओजोन दिवस की थीम ‘एक ठंडे ग्रह के लिए वैश्विक प्रयास’ रखी गई है।
ओजोन परत को बचाने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत ओजोन-क्षयकारी पदार्थों की जगह ऐसे विकल्प अपनाए गए जो ओजोन परत के लिए सुरक्षित थे। लेकिन इनमें से कुछ विकल्प, विशेष रूप से एचएफसी, ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुंचाते हुए भी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं। कुछ एचएफसी का ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में हजारों गुना अधिक हो सकता है।
इसी चुनौती को देखते हुए 2016 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में किगाली संशोधन किया गया। इसका उद्देश्य एचएफसी के उत्पादन और उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करना है, ताकि कम ग्रीन हाउस प्रभाव वाले शीतलकों और अधिक ऊर्जा-सक्षम कूलिंग तकनीकों की ओर बढ़ा जा सके। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, अगर किगाली संशोधन के लक्ष्यों को पूरी तरह लागू किया जाता है, तो इस सदी के अंत तक लगभग 0.5°C तक की वार्मिंग को टाला जा सकता है।
आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस भयंकर होती गर्मी में कूलिंग के ऐसे तरीके अपनाए जाएं जो न केवल ओजोन परत को सुरक्षित रखें, बल्कि धरती के तापमान पर भी अतिरिक्त दबाव न डालें। यह चुनौती सिर्फ बाजार में एक बेहतर मॉडल का एयर कंडीशनर लाने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती यह है कि दुनिया भर के अरबों लोगों को भीषण गर्मी से राहत मिले और इस पूरी प्रक्रिया में हमारी धरती और अधिक गर्म न हो।
भीषण गर्मी अब केवल उष्णकटिबंधीय और विकासशील देशों की समस्या मानकर टाली नहीं जा सकती। यूरोप और अमेरिका भी लगातार अधिक गंभीर गर्मी और उससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का सामना कर रहे हैं।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की कामयाबी केवल एक समझौते की जीत नहीं, बल्कि वैश्विक पर्यावरणीय कूटनीति की एक बेहतरीन मिसाल है। इसने दिखाया कि जब विज्ञान किसी खतरे की चेतावनी देता है, तो नीतियां बदली जा सकती हैं, उद्योग नए रास्ते खोज सकते हैं और दुनिया मिलकर कार्रवाई कर सकती है। सत्तर के दशक में ओजोन परत के खतरे को पहचाना गया और जब दुनिया ने मिलकर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल लागू किया, तो आज उसका सुखद परिणाम हमारे सामने है, ओजोन परत धीरे-धीरे ठीक होने की दिशा में है।
लेकिन जलवायु परिवर्तन की कहानी कहीं अधिक जटिल है। हर दिन हमारे पास नए वैज्ञानिक आंकड़े और भविष्य के आकलन आ रहे हैं, मगर जमीन पर ठोस कार्रवाई की गति अभी भी चुनौती बनी हुई है।
ओजोन की यह कहानी हमें एक और महत्वपूर्ण सीख देती है: किसी एक पर्यावरणीय संकट की दिशा बदल देना यह सुनिश्चित नहीं करता कि बाकी पर्यावरणीय समस्याएं अपने आप खत्म हो जाएंगी। बल्कि कई बार किसी समस्या का समाधान हमें दूसरी जुड़ी हुई चुनौतियों पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर करता है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने स्ट्रेटोस्फियर में ओजोन क्षरण को पीछे धकेलने में सफलता हासिल की है, लेकिन आज जमीन के पास बढ़ता ओजोन प्रदूषण, बढ़ती गर्मी और उससे बचने के लिए बढ़ती कूलिंग की जरूरत हमें एक नई चुनौती के सामने खड़ी कर रही है।
आज जरूरत उसी वैज्ञानिक समझ और वैश्विक इच्छाशक्ति की है जिसने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को सफल बनाया था—लेकिन इस बार चुनौती केवल ओजोन परत की नहीं है। हमें वायु प्रदूषण, बढ़ती गर्मी और सतत कूलिंग को एक-दूसरे से जुड़े मुद्दों के रूप में समझते हुए समाधान तलाशने होंगे।
इसलिए विश्व ओजोन दिवस को केवल इस बात की सफलता के रूप में नहीं देखना चाहिए कि “हमने ओजोन बचा ली।” इसे इस बात की याद के रूप में देखना अधिक जरूरी है कि जब विज्ञान, नीति और वैश्विक सहयोग एक दिशा में काम करते हैं, तो पर्यावरणीय संकट की दिशा बदली जा सकती है। ओजोन की सफलता हमारी मंजिल नहीं, बल्कि अगली पर्यावरणीय परीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है।